रोजगार की भरमार से ही संभल सकती है आर्थिक व्यवस्था


सुरेश सेठ

आम आदमी के लिए पिछले डेढ़ बरसों में जीना दूभर होता जा रहा था। पिछले साल के प्रारंभिक महीनों से जिंदगी असामान्य हो गयी थी। कोरोना महामारी के प्रकोप और उसके नित्य बढ़ते विस्तार की दहशत तब इतनी थी कि इसका सामना पूर्णबंदी की घोषणा के साथ जीवन को किसी अन्धकूप में डाल देने की स्थिति के साथ हुआ। इसने देश की आर्थिकता पर वज्रपात-सा आघात किया। उत्पादन गतिविधियां बन्द, शिक्षा से लेकर खेल के मैदान तक सब निर्जीव, आदमी, आदमी की सांस से सहमता हुआ।

तब आर्थिक विकास दर जो स्वत: स्फूर्त हो जाने के सपने देख रही थी, शून्य से नीचे गिरकर नेगेटिव सात प्रतिशत तक चली गयी, वहीं सकल घरेलू उत्पादन ने भी तेईस प्रतिशत से भी अधिक की गिरावट दिखा दी। यह सही है कि कोरोना लहर के दबने के साथ इस वर्षान्त तक प्रतिबंध हटा, अपूर्णबन्दी के समझौतों के साथ निर्जीव अर्थव्यवस्था को उदार साख नीति और पहले रिकार्ड आर्थिक बूस्टर के साथ प्राण देने की कोशिश की गयी। लेकिन इससे पहले कि आशावादी आंकड़ा शास्त्रियों की ‘अच्छे दिन लौट आने’ की उड़ान के साथ बेरंग चेहरों पर मुस्कान लौटती, सन‍् 2021 अर्थात इस वर्ष के पहले महीनोंं में ही कोरोना की दूसरी लहर ने अधिक संक्रामक रूप के साथ देश के हर राज्य में दस्तक दे दी।

यह सही है कि सोलह जनवरी से देश में कोरोना निरोधी टीका अभियान शुरू कर िदया गया था। मौजूदा सरकार ने देश की नौकरशाही के ढीले-ढाले रवैये, चिकित्सा ढांचे की असमर्थता के बावजूद इस टीकाकरण को रिकार्ड स्तर पर चलाने का प्रयास किया। एक करोड़ टीका प्रतिदिन लगा देने का लक्ष्य रखा गया है। 97 करोड़ टीके लग चुके हैं। सौ करोड़ को छूने का लक्ष्य है। लेकिन बड़ी कमी अभी यह कि टीकों की पहली खुराक के बाद, सबको दूसरी खुराक भी लगानी है। अभी तक यह खुराक केवल एक-चौथाई आबादी से अधिक को नहीं लग सकी। सबको लगे, यह पहला अभीष्ट है। फिर चर्चा है कि धूर्त कोरोना का वायरस पल-पल रूप बदलता है, इसलिए तीसरी खुराक का बूस्टर भी सम्भवत: लगाना पड़े।

फिर इन टीकों को लेकर चिकित्सा विशारदों की एक समस्या है कि ये टीके कोरोना उन्मूलक नहीं, संक्रमित की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा उसके अस्पताल में दाखिल होने की जरूरत को कम करते हैं। टीका लगवाने के बाद भी सामाजिक अन्तर न रखो तो कोरोना से संक्रमित हो सकते हो, हां उसकी घातकता अब इतनी नहीं होगी।

फिर हम इस साल के उत्तरार्द्ध में आ गये। इस बीच टीकाकरण अभियान के साथ-साथ देश ने कोरोना की दूसरी लहर भी झेल ली। यह अधिक संक्रामक और अधिक मारक थी। जब यह लहर ज्वार पर थी तो उसने देश की चिकित्सा व्यवस्था की असमर्थता और निजी चिकित्सा व्यवस्था के बाजारूपन को बेनकाब कर दिया। ऐसे विकट दिनों में असामाजिक मुनाफाखोर अपनी हरकतों से बाज नहीं आये। प्राण वायु देने वाले आक्सीजन के सिलेंडरों और प्राणरक्षक रेमडेसिविर जैसी दवाओं की खुलकर ब्लैक हुई।

सरकारी आंकड़ा शास्त्रियों ने चाहे सिलेंडरों की कमी और ब्लैक से होने वाली मौतों को नकारा, लेकिन वास्तविकता यह है कि जिन बड़े अस्पतालों को अपने आक्सीजन प्लांट लगाने के आदेश दिये गये थे, उनका पालन कोरोना की तीसरी लहर के आने के भय से अब करवाया जा रहा है। वेंटिलेटर की कमी और उसके चलाने वाले प्रशिक्षित कर्मियों का अभाव अब अाड़े न आये, इसकी दिलासा अब दी जा रही है।

लेकिन कोरोना की तीसरी लहर के फैलने की आशंका और विश्व के कुछ अति सम्पन्न देशों में कोरोना की चौथी लहर के फैलने के संकेत अभी भी चेतावनी दे रहे हैं कि देश को अपने जीने के ढंग में परिवर्तन करना होगा। देश को आर्थिक निष्क्रियता से छुटकारा दिलाना आवश्यक है। जीवन को धीरे-धीरे पटरी पर लाना है।

इस देश के लोगों ने पिछले डेढ़ बरस में कोरोना की इस विकट महामारी और संक्रमण के संहारक दिनों का अपूर्व धीरज और अनुशासन के साथ सामना किया है। लेकिन अब कोरोना लहर के दबने के साथ और तीसरी लहर के ना आने के साथ यह खुलता हुआ जीवन जिम्मेदारी और सुरक्षित दूरी बनाए रखने की भावना का वहन करते हुए दिखायी नहीं दे रहा। अभी नवरात्रों में हिमाचल और उत्तराखंड के धार्मिक स्थलों में पर्यटकों की भारी भीड़ एक चेतावनी भी देती है कि जिओ लेकिन होश के साथ। तब तक चिकित्सा विशेषज्ञ कह रहे हैं कि कोरोना उन्मूलक अन्तर को अपने जीवन का अनिवार्य अंग बनाना होगा। तभी शिक्षा परिसरों, खेल के मैदानों और उद्यम स्थलों में सामान्य जिंदगी की चमक लौटेगी।

उद्यम और निवेश की वापसी के लिए अभी भारत सरकार ने छह लाख करोड़ रुपये से अधिक का दूसरा आर्थिक बूस्टर दिया है। कोरोना से मुकाबला करने में अभी तक देश का किसान और ग्रामीण क्षेत्र दबंग रहा। लेकिन आत्मनिर्भर भारत के नारे को सार्थक करने के लिए कृषि की दूसरी क्रांति को अब सम्पूर्ण और समावेशी बनाना होगा। पहली कृषि क्रांति की एकाकी सफलता के बाद अब इसे और स्थगित नहीं किया जा सकता।

कोरोना की दोनों लहरों के विकट समय में हमारे शहरों और विदेशों से लाखों की तादाद में उखड़ कर श्रम शक्ति गांवों में चली आयी है। खेतों की उत्पादकता इतनी नहीं कि इस अतिरिक्त श्रम शक्ति को अपनी बाहों में समेट सके। लौटो गांव की ओर का नारा तभी सार्थक होगा, जब गांवों में लौटी इस बड़ी आबादी को कृषि के अतिरिक्त सहयोगी काम धंधे दिये जा सकें।

लघु, कुटीर और मध्यम उद्योगों को आर्थिक प्रोत्साहन देने की सरकारी घोषणा हो गयी है। आव्रजक युवा शक्ति के एफपीओ बनाकर इन्हें इन उद्योगों के लिए संगठित करना पड़ेगा। इसके लिए उदार साख नीति से ही काम नहीं चलेगा। अभी इन्हें जिन्दा करने के लिए घोषित रिजर्व बैंक की नयी मौद्रिक नीति में  ब्याज दर को हिलाया नहीं गया। उन्हें उसी निवेश प्रोत्साहन निचली ब्याज दरों पर रखा गया है।

लेकिन नया निवेश लाभ प्रेरित होता है। इसके लिए आज सबसे बड़ा अवरोध बाजारों में मांग की कमी है। यह कमी कोरोना प्रकोप की वजह से फैली रिकार्डतोड़ बेरोजगारी से पैदा हुई है। काम मांगते हुए करोड़ों खाली हाथों को रोजगार दीजिये। इन्हें वेतन मिलेगा तो मांग अपने आप अधिक हो जायेगी। इस समस्या का अन्त खैरात और राहत संस्कृति की नित्य नयी घोषणाओं में नहीं है। काम मांगते हाथों को काम देने से होगा। जितनी जल्दी यह हो सके, उतना बेहतर।

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