श्रीराम और श्रीकृष्ण भारतीय सांस्कृतिक गगन मण्डल के ऐसे आप्त पुरूष हैं जिन्हें उसका सूर्य और चंद्रमा कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है। समसामयिक पारिस्थितिक घटनाक्रम के अंतर्गत दोनों ही व्यक्तियों का अपना-अपना सहयोग और कार्य अविस्मरणीय है, अनूठा है, अनुपम है और अद्वितीय है। इस लेखमाला में इन दो व्यक्तियों में से जिसका वर्णन किया जा रहा है वह नीति-निपुण, योगिराज श्रीकृष्ण जी के संबंध् में है। इस आप्त पुरूष के लिए प्रत्येक भारतीय और कतिपय विदेशियों के हृदय में भी असीम श्रद्घा है। यह श्रद्घा अंधश्रद्घा के रूप में भी देखी जा सकती है। जिसे कुछ लोगों ने अपनी-अपनी दुकानदारी चमकाने के लिए अपने-अपने ढंग से बढ़ाया है। कृष्ण जी के जीवन का अवलोकन यदि किया जाये तो उनका जीवन हमारी श्रद्घा का ही पात्र है, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़ा हुआ है। यह पर्व भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। उस दिन रोहिणी नक्षत्र था जब, अब से लगभग 5200 वर्ष पूर्व श्रीकृष्ण ने उक्त तिथि को जन्म लिया था। यह भारत की अनूठी पर्व-परंपरा है कि यहां पर महापुरूषों के जन्मोत्सव तो मनाये जाते हैं किंतु मरण-दिवस को कोई विशेष महत्व प्रदान नहीं किया जाता। राम और कृष्ण के जन्म के विषय में तिथिक्रम सब कुछ ज्ञात है, किंतु उनके मरण के विषय में कोई प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध् नहीं है, जिससे तिथि और समय तक ज्ञात हो सके। इसके पीछे यह मान्यता हो सकती है कि जिसका जीवन सत्य पर आधरित हो उसके लिए काल पर विजय पाना सुलभ है। काल पर विजय प्राप्त व्यक्ति के काल या मृत्यु पर लेखनी चलाना अथवा कुछ लिखना काल और उस कालजयी महापुरूष दोनों का ही अपमान करना है। कृष्ण का किसी तिथि विशेष को वह शरीर समाप्त हो गया हो, यह तो संभव है किंतु उससे कृष्ण स्वयं समाप्त हो गये हों, यह असंभव है। जिसने अमरत्व को प्राप्त कर लिया, वह मरा नहीं। यदि उन्हें मरा हुआ कह दिया तो यह  उनका अपमान है?

जन्म-समय की परिस्थितियां: श्रीकृष्ण जी के जन्म के समय भारतीय समाज में सर्वत्र अव्यवस्था व्याप्त थी। नैतिक मूल्यों का स्खलन अपनी चरम सीमा पर था। राम और भरत की भाति साम्राज्य को गेंद नहीं माना जा रहा था कि एक भाई दूसरे के पाले में गेंद पर उसका अधिकार मानकर फेंक रहा था, इसी प्रकार दूसरा भाई पिता की इच्छा को आदेश मानकर कुल की मर्यादा के विपरीत आचरण न करने की सौगंध् खाकर पुन: पहले वाले भाई के पाले में उसे फें क रहा था, वह कह रहा था कि इस पर सिवाय तेरे किसी अन्य का अधिकार है ही नहीं।

अब तो ‘राम’ को ‘भरत’ स्वयं वनवास दे रहा था। पिता स्वयं पक्षपाती था। लक्ष्मण कहीं दु:शासन के रूप में था, तो कहीं अर्जुन के रूप में भी था। उसके दो रूप उसकी भूमिका और व्यक्तित्व को भी विद्रूपित कर रहे थे। और तो और स्वयं श्रीकृष्ण के सगे संबंधी भी इस व्याध् से अछूते नहीं थे। कंस ने अपने वृद्घ पिता राजा उग्रसेन को अपनी जेल में डाल रखा था। साथ ही उसने अपने चाचा देवक की पुत्री देवकी को उसके पति वसुदेव के साथ जेल में बंद कर रखा था। उनको जेल में बंद करने का कारण किसी भविष्यवक्ता ज्योतिषी की यह भविष्यवाणी थी कि इसी देवकी की आठवीं संतान के द्वारा तेरा वध् होगा। वसुदेव के अनुरोध् पर उसने देवकी की तत्काल हत्या न करके उसे जेल में बंद करना, उसकी जन्म लेने वाली प्रत्येक संतान को स्वयं को सौंपने की शर्त पर ही उचित समझा। कंस मथुरा का राजा था। उसका ससुर मगध् का राजा था। जिसका नाम जरासंध् था। जरासंध् भी अत्यंत दुराचारी और अत्याचारी शासक था। उसके सारे दुर्गुण कंस में थे। कंस उसे अपने लिए सुरक्षा-कवच समझता था और उस पर आपत्ति के समय सहायता देने का बहुत विश्वास करता था। इस प्रकार सारा राजनीतिक वातावरण पूर्णत: दूषित था।

कंस ने जब कृष्ण के माता-पिता देवकी और वसुदेव को अपनी जेल में डाल दिया तो वसुदेव अपने यहां जन्म लेने वाली प्रत्येक संतान को चुपचाप कंस को सौंप देते थे और कंस उसका वध् कर डालता। यह क्रम देवकी और वासुदेव की छठी संतान तक चलता रहा। पौराणिक परंपरा और मान्यता के अनुसार सातवें बच्चे का गर्भपात हो गया था। मां की ममता देवकी के लिए अभिशाप बन गयी थी। संतान जन्म लेती और कंस उसे मार डालता, मां की ममता तड़पकर और चुपचाप करूण क्रंदन करके रह जाती, पीड़ा ने अब ‘भय’ का रूप ले लिया था। इसलिए ‘भयवश’ देवकी का गर्भपात हो गया था। जब सर्वत्र इस प्रकार का भय, आतंक और अत्याचार व्याप्त था, जब जनता में निराशा-निशा गहराती जा रही थी और आतंक के बादल छंटते दृष्टिगोचर नहीं हो रहे थे, तब इन सबका अंत करने के लिए पूर्व जन्मों के सुकृतों से मोक्ष में विचर रही कोई आत्मा कृष्ण के रूप में अवतरित हुई। यह आत्मा देवकी और वसुदेव की आठवीं संतान के रूप में आयी। इस पुण्यात्मा का इस प्रकार का अवतरण ही अवतार का रूप लेकर पौराणिक काल में भारतीय समाज में रूढ़ हो गया कि ईश्वर स्वयं अवतार लेते हैं और कृष्ण जी ईश्वर के ही अवतार थे।

भाद्रपद माह की अष्टमी तिथि को जबकि चहुं ओर गहन अंधकार व्याप्त था। निराशा-निशा अपने चरमोत्कर्ष पर थी तब मानव मन में आशा का संचार लेकर गहराती निशा को चीरते हुए प्रकाश की भांति दिव्य-पुरूष के रूप में जेल की सींखचों के पीछे कृष्ण का जन्म हुआ। दिव्य व्यक्तित्व के स्वामी महापुरूषों के लक्षण उनके जन्म लेते ही दीखने लगते हैं। जो सबका रक्षक, उद्घारक और दुष्टों का संहारक बनकर आया था, उस कृष्ण के आते ही प्रभु की लीला देखिये दुष्ट कंस के गुप्तचर उसके जन्म की भनक तक न ले सके। द्वार के प्रहरी भी अपना उत्तरदायित्व भूलकर ठण्डी वायु के झोंकों की गोद में लुढक़ कर चुपचाप सो गये। इस अवसर का लाभ वासुदेवजी ने उठाना चाहा।

नंद नामक उनके एक मित्र के यहां गोकुल में एक लडक़ी ने उसी समय जन्म लिया था। बहुत संभव है कि नंद और वसुदेव में अपने गुप्तचर सूत्रों के माध्यम से ऐसी योजना पहले ही बन गयी हो कि हम दोनों की पत्नियों यशोदा और देवकी का गर्भकाल संयोगवश एक साथ ही पूर्ण होगा, इसलिए आप अपनी संतान को मेरी संतान से बदल लें। यह बहुत बड़ा त्याग था, जो अपने मित्र के लिए मात्र इसलिए किया जा रहा था कि उसकी गोद सूनी न रहने पाये। उसकी पत्नी भी ममत्व की अनुभूति कर सके।

इस योजना में संभवत: प्रहरी अथवा गुप्तचर भी सम्मिलित हो सकते हैं, जो कार्य तो कंस के लिए कर रहे थे, किंतु साथ ही उसके अत्याचारों से पूर्णत: आतंकित भी थे। दूसरे सभी को यह भी मालूम था कि देवकी का यह आठवां गर्भ है यदि इसकी रक्षा हो गयी तो हम सबकी रक्षा तो वह आने वाला महामानव स्वयं ही कर लेगा। इसलिए देवकी को पहले से ही इस योजना के विषय में विश्वास में लेकर कार्य किया गया होगा ताकि वह अपने भीतर व्याप्त भय को निकालकर शांतमना होकर आने वाली संतान के प्रति आश्वस्त रहे। इतनी देर तक जेल के सीखचों में बंद रहने से जनसहानुभूति देवकी के साथ हो गयी होगी। सातवें गर्भ के क्षीण होने की सूचना ने तो लोगों को और भी अधिक भाव विह्वल किया होगा। अत: इन सब परिस्थितियों के मध्य कृष्ण की जीवन लीला को कंस से बचाने का हर संभव प्रयास किया गया होगा। फ लत: प्रहरियों के ‘सोते हुए’ वसुदेव अपने नवजात शिशु को उठाकर गोकुल में नंद के घर की ओर चल दिये।

क्रमश:

Comment:

betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
betgaranti giriş
norabahis giriş
oslobet giriş
oslobet giriş
oslobet giriş
betnano
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
Betist
Betist giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
betpark giriş
betpark giriş
bahiscasino giriş
bahiscasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betnano giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
ikimisli giriş
betplay giriş
timebet giriş
roketbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
ikimisli giriş
betplay giriş
pokerklas giriş
pokerklas giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
betpark
betpark
Hitbet giriş
Bahsegel giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betnano giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
holiganbet giriş
vaycasino
vaycasino
realbahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
realbahis giriş
royalbet giriş
royalbet giriş
royalbet giriş
betnano giriş
celtabet giriş
betnano giriş
celtabet giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
betpark
betpark
betpark
betpark
timebet giriş
timebet giriş
roketbet giriş
roketbet giriş
vaycasino giriş
betplay giriş
betplay giriş
betpuan giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
betpark giriş
betpark giriş
betbox giriş
betbox giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betorder giriş
betorder giriş
betlike giriş
baywin giriş
betpark giriş
betpark giriş
baywin giriş
betpark giriş
baywin giriş
baywin giriş
bepark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
piabellacasino giriş
piabellacasino giriş
betnano giriş