अफगानिस्तान से अमेरिका के लौट जाने से भारत के लिए बजी खतरे की घंटी

जी. पार्थसारथी

भारत के पश्चिमी पड़ोसी मुल्क आजादी के समय से ही आतंकवाद और सीमा संबंधी समस्याओं से ग्रस्त रहे हैं। फिलहाल अफगानिस्तान में टकराव बन चला है, जहां इस्लामिक स्टेट-खुरासान यानी आईएस(के) के नाम से एक नया आतंकी संगठन उभरा है। भले ही इस्लामिक स्टेट खुरासान के कुछ सिद्धांत तालिबान वाले हैं-जिसे आमतौर पर कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा कहा जाता है, इसके बावजूद वह तालिबान के खिलाफ है। इस आईएस(के) ने हाल ही में काबुल एयरपोर्ट पर बम धमाके करके अंतर्राष्ट्रीय ध्यान खींचा है। इसका मकसद अमेरिकी सैनिक और सिविलियन लोगों को मारने के अलावा अमेरिकी फौज की निर्विघ्न वापसी में खलल डालना था।
अफगानिस्तान के अप्रत्याशित घटनाक्रम के बाद बड़ी संख्या में विदेशी और अफगान नागरिकों ने क्रूर तालिबानी निजाम की आशंका से देश छोड़ना चुना। हालांकि तालिबान ने बैरियर लगाकर अफगान नागरिकों को रोकने वाली नीति अपनाकर उन्हें रुकने को मजबूर कर दिया। अफसोस की बात है कि अफगानिस्तानी लोग, जिनके जीवनस्तर और निजी आजादी में पिछले दो दशकों के दौरान काफी सुधार हुआ था, अब भविष्य के कड़े नियमों को लेकर डरे हुए हैं। भारत ने तेजी से काम करते हुए अपने अधिकांश लोग हवाई मार्ग से निकाल लिए हैं। हालांकि कुछ अभी भी अफगानिस्तान में फंसे हुए हैं, क्योंकि हुकूमत ने भारतीय मूल के अफगान नागिरकों को भी देश से बाहर जाने की मनाही कर दी है। जाहिर है, आम अफगानों की लोकतांत्रिक आजादी छिनने के अलावा जीवनस्तर पर गंभीर और विपरीत असर पड़ने की पूरी संभावना है।
भारत ने अफगानिस्तान में जो सहायता परियोजनाएं चला रखी थीं, जैसे कि सलमा बांध और काबुल तक बिजली-तारों की व्यवस्था और ससंद भवन बनाने जैसे अनेकानेक कामों से अफगान लोगों में बहुत साख अर्जित की है। 9 करोड़ डॉलर की लागत से बना अफगानिस्तान का नया प्रभावशाली संसद भवन, जिसमें राजस्थान का संगमरमर लगाया गया है, का उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 2015 में किया था। तालिबान का कहना है कि वे भारत की सहायता से बन रही परियोजनाएं जारी रखने के इच्छुक हैं। मजेदार बात यह है कि तालिबान भारत के साथ सारा द्विपक्षीय व्यापार पाकिस्तानी मार्गों से करने को कह रहा है। यह हैरानीजनक है क्योंकि भारत पहले ही अफगानिस्तान तक माल ले जाने को ईरान के चाबहार बंदरगाह पर काफी निवेश कर चुका है। तथापि, ऐसे कई मुद्दे हैं, जिन पर अफगान सरकार से वार्ता हो सकती है। अफगानिस्तान में शैक्षणिक सुविधाओं का विकास और गेहूं एवं अन्य खाद्य पदार्थों की आपूर्ति पर विचार हो सकता है। इसके अलावा, उनकी जरूरतें और तरजीहें जानने के बाद, यथेष्ठ औद्योगिक परियोजनाओं में सहयोग पर भी बात हो सकती है और काम हाथ में लिया जा सकता है।
जिस अपमानजनक ढंग से अमेरिका को अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा है, उससे भारत और अन्य देशों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। बहुत से लोगों की अपेक्षा के विपरीत अफगान सेना ने चंद दिनों में ही तालिबान के सामने घुटने टेक दिए। भारत को दरपेश अब मुख्य चुनौती यह है कि अफगान सेना की अक्षमता के कारण अमेरिकी हथियारों और साजो-सामान का बहुत बड़ा भंडार तालिबान के हाथ लग गया है। फिलहाल मुल्ला अब्दुल गनी बरादर की अगुवाई में तालिबान के नेतृत्व वाली आरजी सरकार काम चला रही है। मुल्ला बरादर ने पाकिस्तानी जेलों में आठ साल बिताए हैं। वह सदा तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर का निकटवर्ती रहा है। लेकिन अभी तक तालिबान का सुप्रीम सैन्य कमांडर हिबातुल्लाह अकुनज़ादा परिदृश्य पर नमूदार नहीं हुआ है। मुल्ला बरादर की अच्छी खासी प्रसिद्धि है और एक दक्ष वार्तावार वाली छवि है। साफ है पाकिस्तान का ध्येय उसे प्रतीक-पुरुष की तरह इस्तेमाल करने का है। सरकार के मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा नियंत्रण में सिराजुद्दीन हक्कानी गुट का दबदबा है, जो पाकिस्तान के खासमखास चेलों में एक है। सिराजुद्दीन हक्कानी और उसका परिवार ‘हक्कानी नेटवर्क’ चलाते हैं, जो सबसे खूंखार और निर्दयी इस्लामिक गुटों में आता है और इसे तालिबान का समर्थन भी प्राप्त है। हक्कानी नेटवर्क ने अफगानिस्तान में भारतीय दूतावास और उप-दूतावासों पर हुए आतंकी हमलों में भाग लिया था। विडंबना यह कि 1980 के दशक में डूरंड सीमा रेखा के पार सोवियत यूनियन के खिलाफ लड़ने वाले जो जेहादी अफगान सशस्त्र गुट अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को बहुत प्रिय थे, उनमें यह एक था।
सिराजुद्दीन हक्कानी और आईएसआई से निकट यारी रही है और उसका एक ‘सरमाया’ गिना जाता है। वह लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे जेहादी गुटों से भी निकट संपर्क रखता है। अमेरिका का मुख्य निशाना अब अपने तैयार किए हक्कानी जैसे तालिबान सरगनाओं की बजाय इस्लामिक स्टेट पर अधिक रहेगा। अमेरिका द्वारा घोषित आतंकी हक्कानी की इस्लामाबाद और उत्तरी वजीरिस्तान में बहुत जायदाद है। जाहिर है भारत यह आकलन करेगा कि तालिबान के हाथ लगे हथियार, गोला-बारूद, हेलीकॉप्टर गनशिप और अन्य हवाई जहाज, जो अमेरिका ने अफगानिस्तान को दिए थे, उनका क्या असर रहेगा। कोई हैरानी नहीं कि ये हथियार भारत के खिलाफ रहे हक्कानी नेटवर्क को मिल जाएं।
फिलहाल अमेरिकी बैंकों में रखा अफगानिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार ‘फ्रीज़’ है। इसलिए अफगानिस्तान एक तरह से दिवालिया हालत में है और आयात के लिए पैसा चुकाना लगभग असंभव है। इसी बीच तालिबान सरकार ने कहा है कि भारत के साथ व्यापार पाकिस्तान के रास्ते जारी रह सकता है, जबकि पाकिस्तानी सरकार खुद गंभीर विदेशी मुद्रा संकट झेल रही है। समस्या और गंभीर हो चली है क्योंकि उसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा निर्माण की एवज में चीन से लिया भारी ऋण चुकाना है। इस गलियारे की वजह से पाकिस्तान का हश्र भी श्रीलंका जैसा होगा, जो इसी तरह चीनी कर्ज के मकड़जाल में फंसा था।
तमाम घटनाक्रम के परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री मोदी की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से हुई चर्चा बहुत अहम है। अफगानिस्तान की सीमा से लगे मध्य एशियाई देशों को रूस हथियार मुहैया करवा रहा है, जिन्हें तालिबान से भारी खतरा सता रहा है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरान की यात्रा की है, उसे भी तालिबान को लेकर गंभीर फिक्र है। अफगानिस्तान में आईएसआई के पदचिन्ह साफ दिखाई दे रहे हैं। भारत को तालिबान से राब्ता जरूर रखना चाहिए। भारत को सावधानी रखते हुए आगे कदम तभी बढ़ाने होंगे, जब तक सुसपष्ट और प्रमाणित आश्वासन नहीं मिल जाता कि तालिबान ने जो अफगान भूमि और हथियार कब्जाए हैं, उनका इस्तेमाल भारत में आतंकवाद बढ़ाने के लिए नहीं होगा।
लेखक पूर्व राजनयिक हैं।

डॉ॰ राकेश कुमार आर्य

मुख्य संपादक, उगता भारत

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