भारतीय अर्थव्यवस्था V आकार की रिकवरी के साथ ऊंची छलांग लगाने को तैयार

कोरोना महामारी की दो लहरों को झेलने के बाद भारत में अर्थव्यवस्था अब धीरे-धीरे पटरी पर आती दिख रही है। भारत में, अप्रैल-मई 2021 के महीनों में महामारी की दूसरी लहर का सामना करने के बाद, जून 2021 में आर्थिक गतिविधियां तेज गति से पुनः प्रारम्भ हो गई हैं, जिसका असर अब जुलाई 2021 माह के आंकड़ों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। बढ़ती घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय मांग के कारण कारखानों में कामकाज ने रफ्तार पकड़ी ली है। वित्तीय वर्ष 2020-21 में कुल कर (प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष) राजस्व 14.24 लाख करोड़ रुपये रहा है, जो इससे पहले के वित्त वर्ष के मुकाबले पांच प्रतिशत अधिक है, इसके साथ ही भारतीय शेयर बाजार अब एक नए मुकाम पर पहुंच गया है। हाल ही में सेंसेक्स 54 हजार अंक के स्तर को पार कर गया, निफ्टी भी नई ऊंचाई पर कारोबार कर रहा है। भारत का मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) जुलाई 2021 माह में 55.3 रहा है जो माह जून 2021 में देश के अलग-अलग हिस्सों में लोकल लॉकडाउन के कारण 48.1 था। जुलाई 2021 माह में जीएसटी कलेक्शन 1 लाख 16 हजार 393 करोड़ रहा, सालाना आधार पर इसमें 33 फीसदी की वृद्धि आंकी गई है। देश में रोजगार के नए अवसर भी निर्मित होने लगे हैं, विशेष रूप से सूचना तकनीकि क्षेत्र में तो रोजगार के नए अवसरों की बहार आ रही है। कम्पनियों की लाभप्रदता में तेज गति से वृद्धि दृष्टिगोचर है एवं दुपहिया एवं चार पहिया वाहनों की बिक्री में भी लगातार उछाल दिखाई दे रहा है। उक्त सभी संकेत कोरोना महामारी के दौरान लड़खड़ा गई भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी से हो रहे सुधार की ओर साफ इशारा कर रहे हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार भी देश की अर्थव्यवस्था में तेजी से स्थिरता आती दिखाई दे रही है और अब यह V आकार के साथ उंची छलांग लगाने को तैयार हो रही है। भारत में विदेशी मुद्रा का भंडार नित नई ऊंचाईयों को छू रहा है और अब यह 62,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी प्रतिवर्ष लगभग 7,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है एवं शेयर बाजार में पोर्ट्फोलीओ निवेश भी तेज गति से बढ़ रहा है और यह लगभग 3,200 करोड़ अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष हो रहा है। नित नए आईपीओ शेयर बाजार में आ रहे हैं और बहुत अधिक सफल भी हो रहे हैं। शेयर बाजार में आईपीओ की सफलता, देशवासियों के आत्मविश्वास में आई वृद्धि को दर्शाता है। मध्यम वर्ग के लोग जो पहिले शेयर बाजार में निवेश नहीं करते थे वे भी अब निवेश करने लगे हैं। औद्योगिक उत्पादन तो तेज गति से वृद्धि दर्ज कर ही रहा है साथ ही उपभोक्ता सूचकांक भी बढ़ता जा रहा है। निर्माण उद्योग में भी वापिस गति आती दिख रही है, क्योंकि केंद्र सरकार ने हाल ही में कई उपायों की घोषणा इस क्षेत्र को गति देने के उद्देश्य से की है। कुल मिलाकर आर्थिक क्षेत्र में बहुत अच्छा माहौल बनता जा रहा है। जनधन योजना के अंतर्गत खोले गए जमा खातों के माध्यम से वित्तीय समावेशन के कार्य ने भी गति पकड़ ली है एवं अब सब्सिडी एवं वित्तीय सहायता की राशि सीधे ही इन खातों में जमा हो रही है जिससे रिसाव एवं भ्रष्टाचार को लगभग समाप्त कर दिया गया है। कोरोना महामारी को मात देने के उद्देश्य से देश के नागरिकों का टीकाकरण भी अब बड़ी तेजी से किया जा रहा है। इससे नागरिकों में आत्मविश्वास लौट रहा है और वे अब वापिस काम पर लौटने लगे हैं तथा देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में जुट गए हैं। युवाओं का इसमें विशेष योगदान देखने में आ रहा है।

केंद्र सरकार, राज्य सरकारों एवं उद्योग जगत के बीच में भी बहुत अच्छा समन्वय देखने में आ रहा है। “ईज ओफ डूइंग बिजनेस” पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है और इसका असर अब धरातल पर भी दिखाई देने लगा है। विश्व में भारत की 146वीं रेंकिंग से 63वीं रेंकिंग पर आना ही अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है, इस वर्ष भारत की रेंकिंग को 50 के अंदर लाए जाने के प्रयास केंद्र सरकार द्वारा किए जा रहे हैं। इसी क्रम में उद्योग जगत की समस्याओं को केंद्र सरकार द्वारा तुरंत हल करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। देश में हाल ही के समय में स्टार्ट अप ने बहुत अच्छा काम किया है, इनमे से कई स्टार्ट अप की सम्पत्ति में हुई वृद्धि के चलते ये स्टार्ट अप यूनिकोन की श्रेणी में आ गए हैं (अर्थात इनकी बाजार कीमत 100 करोड़ रुपए से अधिक की हो गई है)।

किसी भी देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर दो प्रकार से आंकी जा सकती है। एक तो मुद्रा स्फीति में हो रही वृद्धि दर के साथ एवं दूसरे मुद्रा स्फीति में हो रही वृद्धि दर के बगैर। यदि किसी देश में मुद्रा स्फीति की दर 10 प्रतिशत है और सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर भी 10 प्रतिशत है तो इसका आश्य यह है कि वास्तव में सकल घरेलू उत्पाद में कुछ भी वृद्धि नहीं हुई है एवं इस वृद्धि का लाभ आम नागरिकों तक नहीं पहुंचा है। वर्ष 2010-11 के आसपास देश में मुद्रा स्फीति की दर 10 प्रतिशत से भी अधिक रहती थी जबकि सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर इससे भी कम रहती थी। परंतु अब देश में परिस्थितियां बदल गई है और सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर मुद्रा स्फीति में हो रही वृद्धि दर से कहीं अधिक रहती है। इस प्रकार सकल घरेलू उत्पाद में हो रही वृद्धि का फायदा देश के नागरिकों तक पहुंच रहा है। भारत में हाल ही के समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दामों में हुई भारी वृद्धि के कारण मुद्रा स्फीति की दर बढ़ जरूर गई है परंतु इसका विपरीत प्रभाव जनता को न हो इसके लिए अन्य कई योजनाएं (जैसे प्रधान मंत्री अन्न योजना, आदि) चला कर जनता को सीधा लाभ देने का प्रयास केंद्र सरकार द्वारा किया जा रहा है। फिर भी केंद्र सरकार एवं भारतीय रिजर्व बैंक को मिलकर यह प्रयास करने होंगे ताकि देश में मुद्रा स्फीति की दर को पुनः 4 प्रतिशत के अंदर लाया जा सके।

प्रहलाद सबनानी

लेखक भारतीय स्टेट बैंक से सेवा निवर्त उप-महाप्रबंधक हैं।

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