क्या नदियों को जोडऩा जरूरी है?

नदियों को जोडऩे की महत्त्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत एक और कामयाबी मिली। कृष्णा और गोदावरी नदियों के मिलन के साथ ही आंध्र प्रदेश का दशकों पुराना सपना साकार हो गया है। माना जा रहा है कि इन दोनों नदियों के आपस में जुडऩे से तकरीबन साढ़े तीन लाख एकड़ के भूक्षेत्र को फायदा होगा और अन्य नदियों को भी आपस में जोडऩे की योजना को गति मिलेगी। दरअसल, भारत विविधताओं से परिपूर्ण राष्ट्र है और यहां सांस्कृतिक विविधता तो खूब है ही, भौगोलिक विविधता भी कम नहीं है। पूरे देश में नदियों का जाल है। लेकिन नदियों का स्वरूप अलग है। प्रथम प्रकार की नदियां हिमालय के ग्लेशियरों से निकलती हैं जिनमें वर्ष भर जल की आपूर्ति सुगमतापूर्वक होती है। ये नदियां अपने आसपास के क्षेत्रों को हरा-भरा रखती हैं और पेयजल, जल विद्युत आदि अनेक प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं। हालांकि इन नदियों में गर्मी के मौसम में पानी की कुछ कमी हो जाती है, पर इतनी अधिक कमी नहीं होती कि इनका पानी सूख जाए। बारिश के मौसम में इन नदियों के किनारे के शहर बहुत बड़ी विभीषिका झेलते हैं और यह विभीषिका बाढ़ की होती है। बाढ़ के कारण अपार धन-जन की हानि होती है। हालांकि सरकार राहत-कार्य द्वारा इस विभीषिका को कम करने का प्रयास करती है, पर नुकसान अनुमान से अधिक होता है। हिमालय से निकली नदियों में एक ही मौसम में बाढ़ आना इन विभीषिकाओं को और बढ़ा देता है और धन-जन की अपार हानि होती है। दूसरे प्रकार की नदियों में प्रायद्वीपीय नदियां आदि हैं जिनका उद्गम किसी पहाड़ी प्रदेश से होता है और ये मुख्य रूप से दक्षिण भारत में बहती हैं। इन नदियों में गर्मी के मौसम में पानी की बहुत कमी होती है और यही नदियां बरसात के समय विशाल स्वरूप ग्रहण करके अपने आसपास के क्षेत्रों को जलमग्न कर देती हैं तथा फसलों को बरबाद कर देती हैं।

मिट्टी का क्षरण बहुत बड़े पैमाने पर होने के कारण भी क्षति अधिक होती है। प्रायद्वीपीय नदियों में कुछ में नौ परिवहन होता है, लेकिन सीमित मात्रा में। इस प्रकार, इन नदियों में पानी बहुत रहता है लेकिन उसका उपयोग ठीक ढंग से नहीं हो पाता है। बरसात के समय यह पानी फालतू बह कर समुद्र में चला जाता है और मनुष्य को दो तरफ से क्षति होती है। पहले तो धन, जन की हानि, और दूसरे प्रकार से जल की हानि।

इसी के मद््देनजर भारत सरकार ने एक महत्त्वाकांक्षी परियोजना का शुभारंभ 13 अक्तूबर 2002 को किया था। अमृत क्रांति के रूप में भारत सरकार ने नदी संपर्क योजना का प्रस्ताव पारित किया जिसमें लगभग सैंतीस नदियों को जोडऩे की बात कही गई। यह केवल नदियों को जोडऩे या उन्हें आपस में मिला देने की परियोजना नहीं है। नदियों को नहरों के माध्यम से जोड़ा जाएगा और जगह-जगह पर बांध और जल संरक्षण के लिए जल भंडार बनाए जाएंगे। मानसून के दिनों में जरूरत से ज्यादा पानी को इसमें सुरक्षित कर लिया जाएगा और बाद में जिस राज्य को आवश्यकता होगी, उसे नहरों के जरिए उसी सुरक्षित पानी से आपूर्ति की जाएगी।

यह देखा गया है कि मानसून के समय बाढ़ आ जाती है, लेकिन मानसून के बाद गंगा जैसी बड़ी नदी में भी पानी का स्तर काफी गिर जाता है। परियोजना के तहत बनाए जाने वाले बांध और स्टोरेज न सिर्फ बाढ़ के प्रकोप को कम करेंगे, बल्कि मानसून के बाद सूखे के दिनों में भी लोगों की जरूरत के मुताबिक पानी उपलब्ध कराएंगे। परियोजना के जरिए चौंतीस हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा और साढ़े तीन करोड़ हेक्टेयर जमीन पर बेहतर सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी। साथ ही परियोजना द्वारा नहरों केविस्तार से कृषि की समस्या को भी सुलझाया जाएगा। नौपरिवहन के साथ-साथ पर्यटन की दृष्टि से भी इस योजना का भविष्य में लाभ उठाया जा सकता है। नदी जोड़ योजना की जोर-शोर से चर्चा भले वाजपेयी सरकार के समय हुई हो, इसका प्रस्ताव और पहले से बीच-बीच में आता रहा। वर्ष 1971-72 में तत्कालीन सिंचाई मंत्री केएल राव ने एक लंबी नहर के जरिए गंगा और कावेरी को जोडऩे का प्रस्ताव रखा था। वर्ष 1980 के दशक में राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी ने इंटरलिंकिंग ऑफ रीवर्स प्लान यानी नदी जोड़ योजना का खाका तैयार किया। पर हुआ कुछ नहीं।

दरअसल, यह योजना हमेशा इतनी भारी लागत वाली और इतने विवादों को जन्म देने वाली रही कि प्रस्ताव कुछ समय की चर्चा के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता रहा। वाजपेयी सरकार ने इसे अपनी एक महत्त्वाकांक्षी योजना के रूप में पेश किया और इसका खाका बनाने के लिए सुरेश प्रभु की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया। लेकिन 2001 की कीमत पर भी कई लाख करोड़ रुपए की लागत बैठने, बड़े पैमाने पर विस्थापन और पर्यावरणीय तोड़-फोड़ के अंदेशों ने इस परियोजना को काफी विवादास्पद बना दिया और वाजपेयी सरकार ने इस पर चुप्पी साध ली।

वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी सरकार की विदाई हो गई। उसके बाद आई यूपीए सरकार को लगा कि इस योजना की बात छेडऩा बर्र के छत्ते में हाथ डालना होगा। लिहाजा, वह इस पर खामोश रही। लेकिन कृष्णा और गोदावरी के जुडऩे से अब नए सिरे से यह योजना चर्चा का विषय बनी है। इससे पहले मध्यप्रदेश में नर्मदा और क्षिप्रा को जोड़ा गया था। पर्यावरणविद इस पूरी कवायद को पर्यावरण-हितैषी नहीं मानते। उनका कहना है कि नदियों का कुदरती स्वरूप बने रहने देना चाहिए, इससे छेड़छाड़ ठीक नहीं है, यह हमें बहुत महंगी पड़ेगी। पर इस योजना के पैरवीकार कहते हैं कि नदियों का बहुत सारा पानी समुद्र में बेकार चला जाता है। नदियों को जोड़ देने से सूखा और बाढ़, दोनों से स्थायी निजात मिलेगी और इनके कारण हर साल राहत के तौर पर खर्च होने वाली हजारों करोड़ रुपए की राशि बचेगी। दूसरी ओर, बिजली उत्पादन में भी काफी इजाफा होगा।

हालांकि इस योजना को प्रारंभिक तौर पर देखने से यह बहुत ही विकासोन्मुख दिखती है, पर इससे उत्पन्न होने वाली हानियों को भी रेखांकित करना आवश्यक है। हमें हमेशा यह प्रयास करना चाहिए कि विकास के अनुपात में उसकी खातिर चुकाई जाने वाली कीमत को न्यूनतम किया जा सके। नदी जोड़ योजना में कई समस्याएं और जटिलताएं भी हैं। बहुत बड़े स्तर पर और बड़े क्षेत्र में नहरों का निर्माण होने से विस्थापन की समस्या विकराल रूप में उपस्थित होती है।

भारत सरकार पूर्व की अनेक योजनाओं में विस्थापितों की समस्या को आज तक पूर्ण रूप से हल नहीं कर सकी, चाहे वह सरदार सरोवर बांध के निर्माण में हो या टिहरी के संदर्भ में। उचित मुआवजा न मिलने से विरोध के स्वर अब भी मुखर होते हैं। लिहाजा, परियोजना में प्रारंभ से ही विस्थापितों के पुर्नवास के लिए एक पारदर्शीनीति बनाई जाए जिसका कड़ाई से पालन हो। ब्रह्मपुत्र और दूसरी नदियों को आपस में जोडऩे की सरकार की विशालकाय योजना से भविष्य में पर्यावरणीय महाविपदा से इनकार नहीं किया जा सकता।

किसी भी स्थान पर नहरों द्वारा पानी लाने के बारे में पर्यावरणाविद मानते हैं कि पर्यावरण पर इसके असर के बारे में पहले से अध्ययन जरूरी है। कुछ तरह की भूमि और मिट्टी को नहरों से लाभ हो सकता है तो कुछ अन्य तरह की भूमि व मिट्टी को बहुत नुकसान हो सकता है। कहीं भू-जल उपलब्धि बढ़ सकती है तो कहीं दलदलीकरण की समस्या भी विकट हो सकती है। पानी और दलदल में पलने वाले मच्छर और जीव नए इलाके में प्रवेश कर कई ऐसी बीमारियां फैला सकते हैं जिनसे वहां के लोग अनभिज्ञ रहे हों और जिनके लिए उनमें कोई प्रतिरोधक शक्ति भी नहीं है। अत: इस प्रकार से उत्पन्न समस्याओं को दूर करने के लिए अग्रिम अध्ययन के जरिए प्रयास करना चाहिए। हर क्षेत्र के विशेषज्ञों की राय इसमें बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। पर्यावरण प्रदूषण के कारण हिमालय से नदियों में पानी कम आने का एक दुष्परिणाम यह भी होगा कि ये समुद्र में जिस स्थान पर मिलती हैं वहां का पर्यावरणीय संतुलन बुरी तरह बिगड़ जाएगा।

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