भारत के संविधान के विषय में जीआईसी हरदोई में कौमी एकता सम्मेलन को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने यह उचित ही कहा है कि भारतवासियों के लिए अपना संविधान ही एक धार्मिक पुस्तक है। वस्तुत: उपराष्ट्रपति के इस कथन में भारत की आत्मा के दर्शन होते हैं। भारत का मूल संविधान (जिसे विश्व संविधान या मानवता का आदि संविधान भी कहा जा सकता है) वेद है। वेद  का उद्देश्य मानव निर्माण से राष्ट्र निर्माण करना है। व्यष्टि से समष्टि की ओर बढऩा है। वेद का व्यष्टिवाद समष्टिवाद की आधारशिला है और समष्टिवाद में व्यष्टिवाद समाहित है। अर्थात वेद के समष्टिवाद में व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की पूर्ण चिंता है। इसी चिंतन से हमारा संविधान भी प्रेरित है। हमारा संविधान जब पंथ निरपेक्षता की बातें करता है, मानव के मौलिक अधिकारों की बात करता है, समान नागरिक संहिता की बात करता है या ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की बात करता है तो उस समय वह वैदिक संस्कृति को विश्वशांति के लिए मानो एकमात्र उपाय भी घोषित करता है। इस अर्थ में भारतीय संविधान वैदिक संस्कृति का प्रवक्ता है।

व्यवहार में हमने भारतीय संस्कृति और भारतीय संविधान को दो अलग-अलग पक्षों के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। हमने यह माना है या मानने का प्रयास किया है कि भारतीय संस्कृति एक अलग चीज है और भारतीय संविधान एक अलग चीज है। हमने भारत की मानवतावादी संस्कृति को साम्प्रदायिक बनाने का प्रयास किया। वोटों की राजनीति और तुष्टिकरण की कांग्रेसी प्रवृत्ति के चलते भारतीय संस्कृति को साम्प्रदायिक मानने की यह प्रवृत्ति ही हमें भटकाते-भटकाते वहां ले आयी जहां आज हम खड़े हैं और जिसे देखकर उपराष्ट्रपति को यह कहना पड़ रहा है कि इस समय हमारी सामाजिक समरसता के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है और लोगों के दिल से दिल नही मिल रहे हैं। हमारा मानना है कि इस स्थिति के लिए संविधान में भी साम्प्रदायिकता खोजने या संविधान को किसी खास वर्ग की तुष्टि करने के लिए प्रयोग करने की हमारी प्रवृत्ति के कारण हुआ है। संविधान को भारत की धार्मिक पुस्तक बनाने की बात कहकर उपराष्ट्रपति ने कुछ ऐसी चर्चाओं पर भी विराम लगाने का प्रयास किया है जिनमें गीता को इस देश की धार्मिक पुस्तक मानने या वेद को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की बातें उठायी गयी हैं। इस प्रकार उपराष्ट्रपति महोदय ने वेद या गीता की बात न उठाकर संविधान की बात उठायी है।

अब हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम भारतीय संविधान के अनुसार ही देश में समान शिक्षा, सर्वशिक्षा, समान नागरिक संहिता, पंथनिरपेक्ष शासन की व्यवस्था और व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए केवल मानवाधिकार आयोग (किसी जाति संप्रदाय के नाम पर आयोग नही) गठित करें और फालतू के आयोगों को समाप्त कर दें। योग्यता को वरीयता और प्राथमिकता दी जाए। इसके लिए भी उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जैसे लोगों को ही पहल करनी होगी। जब तक उन जैसे संजीदा लोग आगे नही आएंगे-तब तक संविधान की धज्जियां उड़ती रहेंगी। उपराष्ट्रपति के इस कथन से एक बात और स्पष्ट हो जाती है कि जब भारत की धार्मिक पुस्तक संविधान है तो भारत का धर्म भी वही है जो यह धार्मिक पुस्तक निष्पादित करती है। हमारा संविधान हमें पंथनिरपेक्ष बनाता है संसार में भारत को विश्व गुरू के पद पर आसीन होते देखना चाहता है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की बात कहता है तो हमारा धर्म भी इन्हीं गुणों के सम्मिश्रण का नाम हो सकता है। निश्चित रूप से उसे मानवता का नाम ही दिया जाएगा। यह मानवता जिन-जिन ग्रंथों की जिन-जिन बातों से विकसित हो सके, उन ग्रंथों की ऐसी बातों को ही नैतिक शिक्षा कहा जाता है। इसलिए ऐसी नैतिक शिक्षा को भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्थान दिलाना भी हमारा राष्ट्रीय उद्देश्य होना चाहिए।

गोलमोल भाषा में कुछ लच्छेदार बात कह जाने की भारतीय राजनीतिज्ञों की प्रवृत्ति रही है। उनकी लच्छेदार बातों पर चलकर जब भारत निर्माण की बात आती है तो लोग अक्सर अपने कहे से यूटर्न ले लेते हैं। हो सकता है हामिद अंसारी जब देश में नैतिक शिक्षा के लिए ग्रंथों का चयन करने लगेंगे तो उस समय उनका दृष्टिकोण कुछ दूसरा हो जाए। संविधान सब कुछ है, पर सब कुछ नही भी है। संविधान एक व्यवस्था को सुव्यवस्थित किये रखने का नियम संग्रह हो सकता है पर संविधान स्वयं में एक जीवन व्यवस्था नही है, ना ही यह ऐसी जीवन व्यवस्था का सृजनहार है। यह तो उन नियमों-उपनियमों का संरक्षक है, और उद्घोषक है जो जीवन को व्यवस्था में ढालने के लिए तथा सदा उस व्यवस्था के अनुरूप चलाने के लिए आवश्यक हैं। जिन नियमों या नीतियों की हमें आवश्यकता है वे निश्चित रूप से संविधान के बाहर हैं, जिनके लिए हमें वेद और वैदिक व्यवस्था की ओर जाना ही पड़ेगा। उस पर पता नही हामिद साहब के क्या विचार होंगे?

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