नई संभावनाओं का अंतरिक्ष

जाहिद खान

अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो ने कामयाबी का एक और नया अध्याय लिख दिया है। हाल ही में उसने खगोलीय शोध को समर्पित भारत की पहली वेधशाला एस्ट्रोसैट का सफल प्रक्षेपण किया। ‘एस्ट्रोसैट’ बहु-तरंगदैध्र्य वाला अंतरिक्ष निगरानी उपग्रह है, जो ब्रह्मांड के बारे में अहम जानकारियां प्रदान करेगा। यह मिशन एक ही समय में अल्ट्रावायलेट, ऑप्टिकल, लो एंड हाइ एनर्जी एक्स रे वेवबैंड की निगरानी में सक्षम है। तकरीबन एक साल के अंदर मंगलयान के बाद अंतरिक्ष में भारत की यह दूसरी बड़ी कामयाबी है।

एस्ट्रोसैट के सफल प्रक्षेपण के साथ ही भारत ऐसा पहला विकासशील देश बन गया है, जिसका अंतरिक्ष में अपना टेलीस्कोप है। भारत की कामयाबी इसलिए भी खास मायने रखती है कि यह काबिलियत अभी तक अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान जैसे देशों के पास ही थी। वहीं हमारा पड़ोसी और प्रतिद्वंद्वी देश चीन फिलहाल अपनी पहली अंतरिक्ष दूरबीन ‘हार्ड एक्सरे माड्युलेशन टेलीस्कोप’ पर काम ही कर रहा है। जाहिर है कि अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में देश के लिए यह सचमुच एक बड़ी कामयाबी है।rocket

इस कामयाबी से देश में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में रहने वाले हर भारतीय का सिर गर्व से ऊंचा हो गया है। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से पीएसएलवी-सी 30 के जरिए प्रक्षेपित एस्ट्रोसैट को बनाने में इसरो को पूरे दस साल लगे और इसके निर्माण पर कोई 178 करोड़ रुपए की लागत आई। वहीं एस्ट्रोसैट का कुल वजन 1513 किलोग्राम है। बहरहाल, उड़ान शुरू होने के लगभग पच्चीस मिनट बाद ही पीएसएलवी-सी 30 ने इस उपग्रह को पृथ्वी से लगभग साढ़े छह सौ किलोमीटर की दूरी पर अंतरिक्ष की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया।

एस्ट्रोसैट पर सुदूर आकाशीय पिंडों के अध्ययन के लिए पांच विशेषज्ञ उपकरण लगे हुए हैं। ये खास उपकरण इस तरह से हैं-अल्ट्रावायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप, लार्ज एरिया एक्स रे प्रपोशनल काउंटर, सॉफ्ट एक्स रे टेलीस्कोप, कैडमियम जिंक टेल्यूराइड इमेजर और स्कैनिंग स्काई मॉनीटर। इन उपकरणों से मिले वैज्ञानिक आंकड़ों को मॉक्स के जमीनी स्टेशन को भेजा जाएगा, जहां उनका वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाएगा। यह उपग्रह पांच सालों तक अपनी सेवाएं देगा। उपग्रह के संचालन की पूरी अवधि के दौरान इसका प्रबंधन बंगलुरुस्थित इसरो टेलीमिट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क के मिशन ऑपरेशन्स कॉम्पलेक्स स्थित अंतरिक्ष यान नियंत्रण केंद्र द्वारा किया जाएगा।

एस्ट्रोसैट में कई खास विशेषताएं हैं। मसलन, यह एक ही उपग्रह के जरिए विभिन्न खगोलीय पिंडों से जुड़ी अलग-अलग लंबाइयों वाली तरंगों के आंकड़े जुटा सकता है। इसरो के मुताबिक एस्ट्रोसैट, ब्रह्माांड का अध्ययन विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम के प्रकाशीय, पराबैंगनी और उच्च ऊर्जा वाली एक्सरे के क्षेत्रों में करेगा। जबकि अधिकतर अन्य वैज्ञानिक उपग्रह विभिन्न लंबाई की तरंगों के एक संकीर्ण फैलाव (नैरो रेंज) का ही अध्ययन करने में सक्षम होते हैं।

सफल प्रक्षेपण के बाद एस्ट्रोसैट की तुलना नासा की खगोलीय दूरबीन हबल के साथ की जा रही है। हालांकि हबल की तुलना में एस्ट्रोसैट का वजन और इसकी लागत दोनों काफी कम है। जहां नासा ने हबल के विकास और प्रक्षेपण के लिए यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का सहयोग लिया, वहीं इसरो ने स्वयं के संसाधनों से देश में ही एस्ट्रोसैट का निर्माण किया और अपने ही अंतरिक्ष यान पीएसएलवी-सी 30 के जरिए इसे प्रक्षेपित किया। हबल के मुकाबले एस्ट्रोसैट कई गुना बेहतर है।

मसलन, एस्ट्रोसैट का कुल वजन 1513 किलोग्राम है, तो हबल का वजन एस्ट्रोसैट से दस गुना ज्यादा यानी पंद्रह हजार किलोग्राम है। इसरो को एस्ट्रोसैट के निर्माण में पूरे दस साल लगे और इसकी कुल लागत 178 करोड़ रुपए आई, वहीं हबल के विकास और निर्माण पर काफी खर्च आया। इस पर कुल ढाई अरब डॉलर यानी लगभग 195 अरब रुपए की लागत आई। इस लिहाज से देखें तो हमारा उपग्रह एस्ट्रोसैट काफी सस्ता है। एस्ट्रोसैट के मुकाबले हबल उपग्रह सिर्फ इस दृष्टि से बेहतर है कि यह उपग्रह साल 1990 यानी पच्चीस साल से लगातार काम कर रहा है, तो वहीं एस्ट्रोसैट पांच साल तक ही सक्रिय रहेगा। पांच साल के बाद यह काम करना बंद कर देगा।

एस्ट्रोसैट उपग्रह के अलावा इसरो ने विभिन्न देशों के छह सैटेलाइट यानी उपग्रह भी प्रक्षेपित किए। इन छह उपग्रहों में दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका के चार नैनो उपग्रह भी शामिल हैं। यह भी कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है। इसरो वैसे तो अभी तक कई देशों के उपग्रह प्रक्षेपित कर चुका है, लेकिन यह पहला मौका है जब उसने अमेरिका के व्यावसायिक उपग्रहों को प्रक्षेपित किया। अमेरिका के चार नैनो उपग्रहों के साथ ही इसरो ने कनाडा और इंडोनेशिया का भी एक-एक उपग्रह प्रक्षेपित किया। इस प्रक्षेपण में इसरो ने अपने विश्वसनीय ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान यानी पोलर सेटेलाइट लॉन्च वीकल (पीएसएलवी) की मदद ली। विश्व के सबसे विश्वसनीय प्रक्षेपण वाहनों में से एक पीएसएलवी की यह इकतीसवीं उड़ान थी। यह बताना लाजिमी होगा कि इस यान की इकतीस में से तीस उड़ानें कामयाब रही हैं। एक लिहाज से देखें, तो इस यान की सफलता दर निन्यानवे फीसद है।

पीएसएलवी यान एक ही मिशन में कई उपग्रहों को एक साथ लॉन्च करने के अलावा उनको सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित करने में कामयाब रहा है। पीएसएलवी ने आज से बाईस साल पहले 20 सितंबर 1993 को अपनी पहली उड़ान भरी थी, जो कि नाकाम रही। अपनी नाकामयाबी से सबक लेते हुए इसरो ने इस पर और लगातार काम किया। इसरो की यह मेहनत जल्द ही रंग लाई और इसके बाद तो उसने जैसे इतिहास ही रच दिया। पीएसएलवी की एक के बाद एक सभी उड़ानें कामयाब रहीं। एक साधारण शुरुआत के बाद इसरो की यह कामयाबी सचमुच अचंभित करने वाली थी।

हालिया अभियान के साथ ही इसरो ने व्यावसायिक प्रक्षेपणों के क्षेत्र में अपने पचास साल पूरे कर लिये हैं। इसरो इससे पहले पैंतालीस विदेशी उपग्रहों को प्रक्षेपित कर चुका है। और हालिया छह उपग्रहों के प्रक्षेपण के साथ इनकी संख्या इक्यावन हो गई है। आज आलम यह है कि इसरो के वैश्विक ग्राहकों में जर्मनी, फ्रांस, जापान, कनाडा, ब्रिटेन जैसे विकसित देश शामिल हैं। चंद्रयान-1 के बाद मंगलयान की कामयाबी ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को दुनिया में एक नई पहचान दिलाई। अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में देश नित्य नई ऊंचाइयां छू रहा है। स्वदेशी क्रायोजेनिक रॉकेट के सफल परीक्षण के बाद इस क्षेत्र में इसरो के हौसले और भी बुलंद हुए हैं। इसी साल उसने जीपीएस बनाने के लिए एक के बाद एक चार नैविगेशनल सैटलाइट्स को कामयाबी के साथ लॉन्च किया है। एक के बाद एक मिली बड़ी कामयाबी ने इसरो को नए-नए जोखिम लेने के लिए प्रेरित किया है। अच्छी बात यह है कि सरकार भी अब उस पर यकीन कर रही है और उसके हर नए प्रोजेक्ट में हर मुमकिन मदद कर रही है।

इसरो फिलवक्त कई प्रोजेक्टों पर एक साथ काम कर रहा है, जिनमें रीयूजेबल रॉकेट बनाने के अलावा दूसरे चंद्र मिशन की तैयारी भी है। सभी देशवासियों के लिए यह फख्र की बात होनी चाहिए कि हाल के सालों में इसरो ने अंतरिक्ष अनुसंधान के अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी अहम मौजूदगी दर्ज कराई है। इसरो की व्यावसायिक शाखा एंट्रिक्स कॉरपोरेशन लिमिटेड अब लगातार विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण कर रही है। इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए हाल ही में एंट्रिक्स ने विभिन्न देशों से तेईस उपग्रह प्रक्षेपित करने का करार किया है। इन तेईस विदेशी उपग्रहों में दो को अलग-अलग रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में स्थापित किया जाएगा। बाकी के इक्कीस उपग्रहों को भारत के बड़े उपग्रह के साथ छोड़ा जाएगा। इसरो जल्द ही सिंगापुर के छह उपग्रहों का प्रक्षेपण करेगा, जिनका कुल वजन करीब 660 किलोग्राम होगा। इनमें सबसे बड़ा 410 किलोग्राम वजनी अर्थ ऑब्जर्वेशन सेटेलाइट भी शामिल होगा। इसके अलावा दो माइक्रो और तीन नैनो-सेटेलाइट होंगे। एंट्रिक्स ने इसके अलावा अमेरिका के साथ भी नौ उपग्रहों के प्रक्षेपण का करार किया है। इनमें से चार, उसने एस्ट्रोसैट के साथ प्रक्षेपित कर दिए हैं।

चंद्रयान और मंगलयान के सफल प्रक्षेपण के बावजूद अभी तक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन रिमोट सेंसिंग, संचार, मैपिंग, नेविगेशन आदि तक ही सीमित था। लेकिन एस्ट्रोसैट के सफल प्रक्षेपण के बाद अब हम खगोलीय घटनाओं का अध्ययन भी कर सकेंगे। भारतीय खगोलविद दशकों से जमीनी दूरबीनों से आकाशीय हलचलों पर नजर रखते थे। अंतरिक्ष में वेधशाला होने से अब उनका काम पहले से आसान हो जाएगा। एस्ट्रोसैट की मदद से ब्रह्मांड के और भी नए राज खुलेंगे। हमारी नई पीढ़ी को नए ग्रहों और तारों के बारे में तो जानकारी मिलेगी ही, उनके परंपरागत ज्ञान में भी इजाफा होगा। एस्ट्रोसैट की मदद से भारत के वैज्ञानिक अंतरिक्ष में पाई जाने वाली तमाम किस्म की किरणों और पिंडों के बारे में पुख्ता जानकारी हासिल कर पाएंगे। यही नहीं ब्लैक होल्स, आकाशगंगाएं और तारे किस तरह से बनते और नष्ट होते हैं, इसका भी अध्ययन हो पाएगा। मल्टी वेवलेंथ आब्जर्वेटरी के जरिए तारों के बीच दूरी का भी पता लग सकेगा। एक अकेले एस्ट्रोसैट के सफल प्रक्षेपण से अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में कई नए दरवाजे खुल गए हैं।

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