प्रत्येक हाथी के मस्तक में मणि नहीं होती

चाणक्य नीति

शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने।।

आचार्य चाणक्य ने कहा है कि न प्रत्येक पर्वत पर मणि-माणिक्य नही प्राप्त होते , न प्रत्येक हाथी के मस्तक में मणि नहीं होती है, साधु पुरुष भी सब जगह नहीं मिलते। इसी प्रकार सभी वनों में चंदन के वृक्ष उपलब्ध नहीं होते।

यहां अभिप्राय यह है कि अनेक पर्वतों पर मणि-मणिक्य मिलते हैं, परन्तु सभी पर्वतों पर नहीं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि कुछ हाथी ऐसे होते हैं जिनके मस्तक में मणि विद्यमान रहती है, परन्तु ऐसा सभी हाथियों में नहीं होता। इसी प्रकार इस पृथ्वी पर पर्वतों और जंगलों अथवा वनों की कमी नहीं, परन्तु सभी वनों में चन्दन नहीं मिलता। इसी प्रकार सभी जगह साधु व्यक्ति नहीं दिखाई देते।

साधु शब्द से आचार्य चाणक्य का अभिप्राय यहां सज्जन व्यक्ति से है। अर्थात् ऐसा व्यक्ति जो दूसरों के बिगड़े हुए काम को बनाता हो, जो अपने मन को निवृत्ति की ओर ले जाता हो और निःस्वार्थ भाव से समाज-कल्याण की इच्छा करता हो। साधु का अर्थ यहां केवल भगवे कपड़े पहनने वाले दिखावटी संन्यासी व्यक्ति से नहीं है। यहां इसका भाव आदर्श समाजसेवी व्यक्ति से है, परन्तु ऐसे आदर्श व्यक्ति सब जगह कहां मिलते हैं! वे तो दुर्लभ ही हैं। जहां भी मिलें उनका यथावत् आदर-सम्मान ही करना चाहिए।

प्रस्तुति : राहुल धूत

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