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सोमनाथ मंदिर के बारे में बताने की ज्‍यादा जरूरत नहीं, मगर पिछले दिनों जब मैंने ‘स्‍कन्‍दपुराण’ के ‘प्रभासखंड’ की भूमिका लिखी तो उसके रचनाक्षेत्र और रचनाकाल की ओर मेरा ध्‍यान अंतर्साक्ष्‍य पर गया। प्रभासखंड स्‍कंदपुराण का अं‍तिम, सातवां खंड है और इसमें गुजरात और राजस्‍थान की पृष्‍ठभूमि के तीर्थों का विवरण अधिक है : प्रभास (साेमनाथ क्षेत्र), वस्‍त्रापथ (रैवतक पर्वत, जूनागढ), अर्बुद (आबू पर्वत मेवाड़), द्वारका।

इन खंडों में संबंधित स्‍थलों का माहात्‍म्‍य है और बहुत ही पौराणिक स्‍वरूप में लिखा गया है। पुराणकार ने कई कथाओं को लिखा और नया रूप दिया। वह जहां कहीं एक कथा के प्रकारांतर पर आया, उसने कल्‍पांतर का आश्रय लिया। यह भी लगता है कि अनेक हाथों इस पुराण का पल्‍लवन हुआ मगर एक दक्ष संपादक का उस पर जरूर हाथ चला था।

इसमें सोमनाथ मंदिर के निर्माण का श्रेय चंद्रमा को दिया गया है। कथा यह लिखी गई है कि चंद्रमा को जहां पर यक्ष्‍मा रोग से निजात मिला, वहीं पर विश्‍वकर्मा ने शुद्ध स्‍फटिक के जैसा, गाय के दूध के समान उज्‍ज्‍वल मंदिर बनावाया। यह मंदिर मेरु राजप्रासाद के रूप में बनाया गया था और उसमें सुवर्ण जैसा परकोटा और तोरण भी बनाए गए थे। वहां पर तेरह अन्‍य प्रासाद बने और दस ब्रह्मादि अन्‍य देवताओं के लिए बनाए गए।

इन प्रासादों के नाम बृहत्‍संहिता से लेकर विश्‍वकर्मासंहिता, मत्‍स्‍यपुराणादि में भी मिलते हैं। स्‍कंदपुराण में भी अाए हैं : 1. केसरी 2. सर्वतोभद्र, 3 नंदन, 4 नंदिशालक, 5 नंदीश, 6 मन्‍दर, 7 अमृतोद्भव, 8 हिमवान, 9 हेमकूट, 10 कैलास, 11 पृथ्‍वीजय, 12 इंद्रनील, 13 महानील, 14 भूधर, 15 रत्‍नकूट, 16 वैडूर्य, 17 पद्मराग, 18 वज्रक, 19 मुकुटोज्‍ज्‍वल, 20 ऐरावत, 21 राजहंस, 22 गरुड और 23 वृषभ। (प्रभासखंड 24, 56-62)

पुराणकार ने इस वर्णन में ‘वृहस्‍पति’ का अनेकत्र जिक्र किया है। प्रतिष्‍ठा के विधान को भी पूरी तरह वैसा ही लिखा है जैसा कि आजकल भी होता है। यहीं नहीं, वहां पर बावली, कूपादि बनाने कर उनके उत्‍सर्ग करने का भी संदर्भ दिया है। वहां पर द्वीपांतर से अाने वाली वस्‍तुओं का रोचक उल्‍लेख किया है। इतिहास प्रसिद्ध है कि 1026 ईस्‍वी में महमूद गजनी द्वारा इस मंदिर को तोडा गया।

संयोग है कि प्रभासखंड में बार-बार बृहस्‍पति का जिक्र आता है, उसी के नाम साम्‍य वाले भावबृहस्‍पति नामक संस्‍कृत कवि शिलालेख वहां के भद्रकाली के मंदिर में मिला है। यह अभिलेख 1169 ईस्‍वी का है और इस रचनाकार को पूर्ववर्ती सब घटनाओं का ध्‍यान था। शिलालेख में भी ‘सौवर्ण सोमराजो’ शब्‍द का प्रयोग हुआ है जो पुराण के विवरण की तरह ही है। यही नहीं, यह भी विवरण पुराण के वर्णन से तुलनीय है – श्रीभीमदेवो रुचिरतर महाग्रावभी रत्‍नकूटं तं कालाजीर्णमेव क्षितिपतिलिको मेरुसंज्ञ चकार प्रासादं संप्रभाव सकल…।

मालूम होता है कि यह सिद्धराज के समय, 1143 ईस्‍वी में दोबारा बना और इस भावबृहस्‍पति का जिक्र चालुक्‍यराज कुमारपालप्रबंध में भी आया है। मेरा आश्‍चर्य यही है कि यह ऐतिहासिक घटनाक्रम पुराण में बहुत ही रोचक ढंग से लिखा गया है। बस इ‍तिहास की जानकारी लेकर पुराण के इस अध्‍याय को पढ़ा जाए तो कई जानकारियां उजागर हो सकती है।

शिव धर्मोत्‍तर – सानुवाद संपादन

शैव पुराणों में दो उप पुराण बहुत उपयाेगी है जिन्‍होंने लिंगपुराण, स्‍कन्‍दपुराण और शिवपुराण के कलेवर को समृद्ध किया है। इनमें से शिव धर्म पुराण पुराण का अनुवाद पिछले 2015 में किया और कुछ समय पूर्व उसका प्रकाशन भी हो गया। दूसरे शिव धर्मोत्‍तर पुराण्‍ा का संपादन और अनुवाद कार्य 2016 में पूरा हुआ। कुल बारह अध्‍याय और करीब दो हजार श्‍लोक हैं। शिवपुराणकार ने अपने पाठकों को इस पुराण को भी पढ़ने का निर्देश किया है। यानी यह उनके लिए भी महत्व का रहा है।

यह मूलत: शिवधर्मशास्‍त्र है जिसमें शैवधर्म के मूल सिद्धांतों का व्‍यावहारिक रूप से प्रतिपादन किया गया है। मनु और याज्ञवल्‍यादि स्‍मृतियाें का इस पर प्रभाव है और शिव को गौ रक्षक देवता के रूप में स्‍थापित किया गया है। इसमें वास्‍तु विज्ञान के तहत मठ, व्‍याख्‍यान मण्‍डप, शिवमण्‍डप, शिव उद्यान, महावेदी, आरोग्‍यशाला, गोशाला निर्माण विधान बताया गया है। इसमें सबसे अधिक प्रभावी अध्‍याय विद्यादान नामक है जिसमें विद्या के दान, शिक्षण, पठन-पाठन की प्राचीन परंपरा पर प्रकाश डाला गया है।

यह वर्तमान समाज के लिए भी बहुत प्रासंगिक है। गाेधन की सुरक्षा पर जोर दिया गया है और पाप-पुण्‍य, स्‍वर्ग, नरक आदि के वर्णन के साथ ही जीवन में दान पुण्‍य की महत्‍ता पर विचार है।
सच कहूं तो यह कि इस पुराण के संपादन में जितना समय लगा, वह सच में कमर तोड़ने वाला ही कार्य लगा है। पूरे आठ महीने लगे। यदि कोई मुझे ऐसा नया ग्रंथ रचने को कहता ताे मैं दो महीने में इससे अधिक श्‍लोक रचकर उनके अर्थ कर देता मगर, इसका संपादन बहुत दुश्‍कर लगा। नेवारी और आंध्र लिपि की पांडुलिपियों से देवनागरी और फिर खण्डित, त्रुटित पाठ का निर्धारण करना। इसके बाद ही जाकर एक-एक श्‍लोक का अनुवाद…।

सचमुच ये काम आसान नहीं था। मगर, ये शायद शिव कृपा ही कही जाएगी। गोस्‍वामी श्री तुलसीदास ने कभी ऐसे ही कार्य के लिए कहा था, जिसे दोहराने की इच्‍छा हो रही है- रची महेस निज मानस राषा, पाई सुसमय सिवासन भाषा। शिव धर्मोत्‍तर के लिए भी मैं यही कहने की स्‍िथति में हूं। चौखम्बा संस्कृत सीरीज़ ऑफिस, वाराणसी ने इसका प्रकाशन किया है।
जय-जय।

लकुलीश – एक शिवावतार

उत्‍तर से पश्चिमी भारत होते हुए दक्षिण तक लाकुलीश शिव के कई मन्दिर मिलते हैं। मेवाड में 8वीं सदी से ही लाकुलीश मंदिरों का निर्माण आरंभ हुआ था और पहला शिवालय कल्‍याणपुर में था जिसको शूलिन मंदिर कहा गया है। यहां जो शैव साधक रहा था, वह अपने मार्ग को शिव आम्‍नाय कहता है और आम्‍नाय की परिभाषा भी देता है।

दसवी सदी के आरंभ में उदयपुर जिलांतर्गत कैलासपुरी लाकुलीश मंदिर बना था। इसमें शिव की जो मूर्ति विराजित है, वह तीर्थंकर की तरह है और हाथ में बीजपूरक (बीजोरा नींबू), लकुटी लिए है जबकि शिव ऊर्ध्‍वमेढ्र हैं। लाकुलीश मूर्ति का यही लक्षण विश्‍वकर्मावतार नामक ग्रंथ में आया है।

चौथी सदी में संपादित हुए वायुपुराण में शिव के इस अवतार की कथा आती है। कहा गया है कि यह अवतार तब हुआ जबकि द्वापर में कृष्‍ण का जीवनकाल था। तब शिव ने कायावरोहण (गुजरात के बडौदा के पास) नामक स्‍थान पर श्‍मशान में साधक के रूप में अपना अवतार ग्रहण किया था। बाद में, 13वीं सदी में संपादित हुए शिवपुराण में तो इस अवतार की पूरी कथा ही दे दी गई है। इसके साधक बहुत कठिन साधना करते थे और शरीर को इतना तपाते थे कि आज तो विचार करना ही कठिन होता है।

कायावरोहण माहात्‍म्‍य नामक ग्रंथ में इसका संदर्भ मिलता है। यह माहात्म्य तीर्थ स्थलों के बढ़ते प्रभाव के काल की देन है जिसको “लाकुलीश पुराण” के रूप में विस्तृत करने का प्रस्ताव मुझे मिला था।

इस सम्‍प्रदाय का एकमात्र ग्रंथ ‘गणकारिका’ है। इसमें मात्र आठ ही श्‍लोक हैं और प्रारंभ ‘ओम नम: सर्वज्ञाय’ श्‍लोक से हुआ है। आचार्य हरदत्‍ताचार्य ने इसकी रचना की और आचार्य भासर्वज्ञ ने इसकी रत्‍नटीका नामक विवृत्ति रची थी। इसका अनुवाद मैंने एकलिंगपुराण के परिशिष्‍ट में दिया है। (एकलिंगपुराण पृष्‍ठ 500-502) इसके साधकों के लिए यह निर्देश था कि वे निवास के कर्म का सदैव ध्‍यान रखें, जप करें, ध्‍यान करें, एकमेव रुद्र का ही ध्‍यान करें और स्‍मरण करें-

वासचर्या जपध्‍यानं सदारुद्रस्‍मृतिस्‍तथा।
प्रसादश्‍चैव लाभानामुपाया: पंच निश्चिता।। (गणकारिका 7)

कश्मीर और व्रज – मथुरा से लेकर पंजाब, हरियाणा, राजस्‍थान, वारंगल, हिमालय, गुजरात आदि में इस मत के बहुत मंदिर मिलते हें। कहां-कहां है, मित्र बनाएंगे, मैं तो बस शिवरात्रि के उपलक्ष्‍य में यह बात शुरू कर रहा हूं। मित्र प्रकाशजी मांजरेकर ने चित्र भेजे तो अच्‍छा लगा कि इस संबंध में कुछ लिख दिया जाए। वैसे बाणभट के हर्षचरित में शैव साधकों की क्रियाओं का अच्‍छा वर्णन मिलता है।
✍🏻डॉ श्रीकृष्ण जुगनू जी की पोस्टों से संग्रहित

कन्नड़ साहित्य इतिहास की धारा में बारहवीं सदी का वचन साहित्य-युग सच्चे अर्थों में ‘स्वर्ण-युग’ कहलाता है। इस काल विशेष में कन्नड़ के कवि-कवियित्रियों ने जो शिवशरण और शिवशरणियाँ कहलाते हैं, कविता की रचना आध्यात्मिक के साथ साथ सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक आंदोलन के लिए की है। काव्यकर्म इनके लिए साधन मात्र था, न कि साध्य।

लगभग सैकड़ों शरण कवि-कवयित्रियों ने समकालीन काल संदर्भ में, व्यष्टि और समष्टि हित को समान रूप से महत्व देते हुए, वचन साहित्य की रचना की थी। आज भी लगभग सैकड़ों शिवशरण और पैंतीस से बढ़कर शिवशरणियों का वचन साहित्य उपलब्ध होना आश्चर्य का कारण बन सकता है।

वचन साहित्य के प्रमुख कवि हैं-बसवण्ण, अल्लमप्रभु, सिद्धराम, चन्नसवण्ण अंबिगर चौडय्य, नुलिय चंदय्य, हडपद अप्पण्ण, आय्दक्की मारय्या, किन्नरी बोम्मय्य, मडिवाल माचय्य, मोलिगे मारय्य, तुरगाही रामण्ण, उरिलिंग देव, उरिलिंग पेद्दी, डोहर कक्कय्य, एकांतद रामय्य, नगेय मारितंदे, बहुरूपी चौडय्य, मरूळ शंकरदेव, घट्टिवाळ्य्य अजगण्ण, वचन भांडारी शांतरस, कोलशांतय्य, सोडुल बाचरस और अन्य फुटकल शिवशरण।
वचन साहित्य की प्रमुख शरणी कवयित्रियाँ हैं-नीलांबिके, नागलांबिके, मोलिगेय महादेवी, कालव्वे आय्दक्की लक्कम्मा, हडपद लिंगम्म, अमुगि रायम्म, सत्यक्क, केतलदेवी, वीरम्म, दुग्गळे, गुड्डव्वे, बोंतादेवी, सूळे (वेश्या) संकव्वे, गंगम्म, रेकम्म, मसणम्म, मुक्तायक्क और कई फुटकल शिवशरणियाँ।

 

वचन साहित्य के केन्द्रबिन्दु के रूप में इनके मार्गदर्शक, प्रेरक शक्ति, भक्ति भांडारी, समाज सुधारक विश्वज्योति की उपाधि से सुशोभित शरण थे बसवण्ण। बसव, बसवण्ण, बसवप्रभु, बसवेश्वर, बसवराज आदि नामों से जानाजाने वाले समकालीन सभी वचनकारों से प्रशंसित बसवेश्वर के काव्य व्यक्तित्व और सामाजिक व्यक्तित्व का परिचय चिंतन और मुख्य रूप से आज के साहित्यिक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में उनकी विचारधारा की प्रासंगिकता का एक अध्ययन इस लेख का उद्दे्श्य है।
किसी एक भारतीय भाषा का साहित्य ही भारतीय साहित्य नहीं है, अपितु भारतीय किसी भी भाषा का साहित्य ‘भारतीय साहित्य’ ही है। वचन साहित्य, बसव साहित्य की जनवादी जीवन दृष्टि का अध्ययन भारतीय स्तर पर हो और चर्चा परिचर्चा का कारण बनें-यही प्रेरणा इस ग्रंथ की रचना के पीछे काम कर रही हैं।

इसलिए विश्वास भरी एवं ऊँची आवाज में यह कहा जा सकता है कि विश्व साहित्य पंक्ति में कन्नड़ के वचन साहित्य को खुले दिल से रखा जा सकता है।

#वीरशैव परम्परा के आधार स्तम्बों में से एक #अलम्मामहाप्रभु

कर्नाटक की शैव सम्प्रदाए की शाखा वीरशैव सम्प्रदाए, जिसके संस्थापक महान राजऋषि अल्लमा महाप्रभु में एक बड़ी ही खूबसूरती कहानी है।

भारत के दक्षिणी हिस्से दक्कन के पठारी क्षेत्र में कर्नाटक और आंध्र प्रदेश इलाके में एक सिद्धलिंग नाम के एक योगी थे। इस क्षेत्र में वह पूरे ऐश्वर्य और प्रभुत्व के साथ घूमते थे और लोगों के सामने यह साबित करते रहते थे कि वह उस क्षेत्र के सबसे महान योगी हैं। वह कायाकल्प के मार्ग पर थे। काया का मतलब है, शरीर और कल्प का अर्थ है अपने शरीर को एक बिल्कुल अलग ही आयाम में परिवर्तित कर लेना। वह ऐसे योगी थे, जिनका जीवन के मूल तत्वों पर पूरी महारत हासिल थी। उन्होंने ऐसी साधना की थी कि उनका शरीर बेहद कठोर और स्थिर हो गया था। ये लोग 300 से 400 साल तक जीवित रहते थे।

मूल तत्वों पर अधिकार की वजह से उन्होंने अपने शरीर को इतना स्थिर बना लिया था कि वे सामान्य जीवनकाल से भी ज्यादा जीवित रह पाते थे। कहा जाता है कि इस कहानी के वक्त सिद्धलिंग की उम्र 280 साल से भी ज्यादा थी और उन्होंने अपने शरीर को हीरे जैसा कठोर बना लिया था। उन दिनों में सभी हथियार स्टील, पीतल, तांबे या ऐसे ही दूसरे पदार्थों से बने होते थे। उस समय जो भी हथियार उपलब्ध थे, उनसे उनके शरीर को काटा नहीं जा सकता था और यही उनके लिए गर्व की बात थी। वह जहां भी जाते, हमेेशा लोगों के सामने यही चुनौती रखते कि वही उस क्षेत्र के सबसे बड़े और महान योगी हैं।

सिद्धलिंग ने एक और योगी अल्लामा के बारे में सुना, जो योगियों की तरह नहीं रहते थे। अल्लामा को लेाग अल्लामा महाप्रभु के नाम से पुकारते थे। वह बड़े ही खूबसूरत संत थे और #शिव_भक्त थे। उनका दक्षिण भारत में बडे़ सम्मान की नजर से देखा जाता था। यहां तक कि आज भी उनका नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। अक्का महादेवी जैसे बहुत सारे संत अल्लामा के संपर्क में थे। अल्लामा का भक्ति और साधना का संदेश तेजी से लोगों के बीच फैल रहा था।

सिद्धलिंग ,अल्लमा म्महाप्रभु के पास गये और उनसे कोई सिद्धि दिखाने को कहा।

अल्लामा महाप्रभु ने कहा, ‘आप एक सर्वश्रेष्ठ योगी हैं। बेहतर होगा कि आप दिखाएं कि आप क्या कर सकते हैं?’

सिद्धलिंग ने एक तलवार निकाली, जिसके सिरे पर हीरा जड़ा हुआ था। उस तलवार को अल्लामा को देते हुए वह बोले, ‘यह लो तलवार और पूरी ताकत के साथ इसे मेरे सिर पर मारो। मुझे कुछ नहीं होगा।’

अल्लामा शांत थे। उन्होंने तलवार ले ली और दोनों हाथों और पूरी ताकत से सिद्धलिंग के सिर पर वार कर दिया। तलवार सिद्धलिंग के सिर से टकराकर लौट आई, क्योंकि उनका शरीर था ही इतना कठोर। सिद्धलिंग किसी चट्टान की भांति वहीं खड़े थे। वह हंसने लगे – ‘देखा, तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सके। तुमने इस तलवार से मुझ पर वार किया अब इसी तलवार से मैं तुम पर वार करूंगा।’

अल्लामा ने शांतचित से कहा, ‘ठीक है।” सिद्धलिंग ने तलवार से अल्लामा महाप्रभु पर वार कर दिया। तलवार अल्लामा के शरीर से ऐसे निकल गई, जैसे हवा से निकल जाती है। सिद्धलिंग मुख के बल गिर पड़े और घोर आश्चर्यजनिक बोले,” यह क्या है?”

अल्लामा ने शांतचित्त मधुर वाणी से बोले ,” यह-वह तो कभी था ही नही, अगर ये यह-वह होता, तो इसमें गुण-अवगुण अवश्य होता और गुण-अवगुण होने से इसमें भेद(द्वैत) होता, किन्तु इन सबसे परे जो केवल परम्-तत्व #शिव है, जो हर कॉल, हर क्षण विद्यमान है, केवल वही यहा विद्यमान है। यह सब #शिव ही है।

यह सुनकर सिद्धलिंग ने अल्लामा के सामने सिर झुका दिया और बोले, ‘मुझे शक्ति के योग के बारे में तो पता है, लेकिन मैं इस ज्ञान से अभी अनभिज्ञ था। इसके बाद वह अल्लामा के शिष्य बन गए।

अल्लामा ने संतों के नए पंथ की नींव डाली, जिसे वीरशैव कहा जाता है। वीरशैव योद्धा भक्त होते हैं। वे शिव भक्त होते हैं, लेकिन हथियार धारण किए रहते हैं। अल्लामा बड़े ही सज्जन थे। उन्होंने हजारों ऐसे दोहे लिखे हैं, जिनमें आपको एक गहराई नजर आएगी। मैं स्पष्ट तौर पर कह सकता हूं कि मानवता के इतिहास का वह एक ऐसा नाम हैं, जो अपने आप में असाधारण है।
✍🏻Karanje KS कुछ त्रुटि हो तो कृपया बताएं!!

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