कोरोना का सच चाहे जो हो, संसार परेशान है

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़ संजय पंकज
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अहंकार के अंधकार में अछोर डूबा आदमी आलोक की अभ्यर्थना भूल जाता है तब प्रकृति की सारी नकारात्मक शक्तियाँ उसके अंतर्मन में बैठकर आसुरी वृतियों को उभार देती हैं ।वह हिंसक हो जाता है ।अपने अस्तित्व के आडंबर में औरों को तुच्छ और निकृष्ट समझता हुआ आक्रामक हो जाता है ।वह भूल जाता है कि जीवन सहअस्तित्व से संचालित होता है ।

संपूर्ण जीव-जगत एक-दूसरे से आबद्ध है ।समस्त प्राणियों में जो प्राणसत्ता है वह एकरूप होती है ।जैविक आकार-प्रकार की बाह्य विभिन्नताओं के बावजूद प्राण की अंतर्लीनता और निराकार स्वरूप एक समान है ।ऐसा नहीं कि हाथी में दीर्घाकार और चींटी में लघुरूप प्राण होते है ।सूक्ष्म से भी परे इसकी स्थिति होती है ।कोई आकृति,रंग,गंध नहीं बल्कि मात्र चिन्मय चेतना!हमारे वैदिक ऋषियों ;जो प्रकृति-सहचर,चिंतक,वैज्ञानिक ,समयस्रष्टा ,युगद्रष्टा और ब्रह्मवेत्ता साधक हुआ करते थे ,ने जैसा ज्ञान दिया वही तो हमारा धर्म और आचरण है ।उनके आह्वान और निष्ठा के शाश्वत भाव – ‘असदोमासद्गमय:,तमसोमाज्योतिर्गमय:,मृत्योर्मामृतगमय:’ शब्दमात्र नहीं हैं ।जीवन की संजीविनी-संहिता है,समग्र संवेदना है,शिवशक्ति है,मंगलप्राण है ।इनके भाव जीवनसंबल,प्राणाधार,व्यापकबोध,सत्यतत्व और परमात्मज्ञान हैं ।ये अर्थ हमारी साँसों,रगों,धड़कनों और प्राणों में उतरकर रच-बस जाएँ तभी जीवन और मनुष्य के होने की व्यापक सार्थकता है ।
संसार को सदा डराने वाली कतिपय महाशक्तियाँ भी आसन्न मृत्यु के भय से आक्रांत हुईं। उन्होंने परेशानियों के आक्रोश में एक दूसरे को खूब कोसा।अपनी खामियों को अब भी देखने-मानने के लिए वे तैयार नहीं हैं ।उनका अहंकार और अंधत्व आज भी सिर चढ़कर बोल रहा है ।मगर सच तो यही है कि सबकुछ के होते हुए भी आज संसार लाचार है ।हर ओर अफरा-तफरी मची हुई है ।आदमी बेचैन है फिर भी वह स्वयं को दोषी नहीं मान रहा है। अपनी सैन्य शक्तियों और अत्याधुनिक हथियारों के बल पर दंभ भरने वाले देश कोरोना से बुरी तरह भयभीत हो गए, टूट गए फिर भी वह अपनी खामियों को देखने के लिए तैयार नहीं हैं। आज भी कोरोनावायरस एक रहस्य की तरह है। इसे प्राकृतिक माना जाए या खुराफाती मस्तिष्क की उपज! बार-बार शक चीन की ओर जाता है। लहर लहर यह कोरोना अपना प्रकोप दिखा रहा है। सरकारी आंकड़ों में आर्थिक कमजोरी बढ़ी है मगर यह भी सच है कि लोगों की जरूरतें भी कम हो गई हैं और कम संसाधनों में ही वे घर में गुजारा किए जा रहे हैं। कोरोना का सच चाहे जो हो लेकिन इससे बचने के लिए संसार लड़ रहा है।
‘कोरोना वायरस’ से मुक्ति का सर्वमान्य उपाय है – एकांत ।इसी एकांत में चिंतन,ध्यान,आत्मज्ञान,परमात्मदर्शन,सत्यसंवाद सन्निहित है ।भूमंडलीकरण और विकासवाद के अंध दौर में आदमी अपनी जड़ों से उखड़ गया है ।सनातन ज्ञान पर सवाल उठाता हुआ आदमी आज प्रकृति के कोप का शिकार हो रहा है ।कोरोना — फिर एक तमाचा है ।इससे पहले भी कई बार प्रकृति के तमाचे लग चुके हैं ।संसार कई त्रासदियों को झेल चुका है। अहंकार की पराकाष्टा पर पहुँचा मनुष्य एक-दूसरे को तबाह और नष्ट करने के चक्कर में आज स्वयं परेशान और डरा हुआ है ।
यह आदमी की जड़ता नहीं तो क्या है कि वह थोड़ी राहत मिलते ही फिर से अहंकार पर आरूढ़ हो स्वयं को शक्तिमान मानने लगता है ।उसे अपना सुख सर्वोपरि दिखता है ।इसलिए मरने-मारने पर उतर आता है ।वह भूल जाता है इतिहास को,पूर्वजों को,जीवन की क्षणभंगुरता को ।आसन्न मृत्यु वैराग्य की क्षणिक कौंध पैदा करती है,किसी के भीतर वह ठहर भी जाती है मगर अधिसंख्य उससे अनछुए और अप्रभावित रह जाते हैं ।
संसार कोरोना से लड़ रहा है ।हमारा महान देश भारत राजनैतिक दलों के घात-प्रतिघात और वितंडावादों से परेशान हो रहा है ।सदा झूठ बोलते रहने वालों की सच्ची और सही बात पर हठात् विश्वास नहीं होता ।अफवाहें भी बीच-बीच में सिर उठा लेती हैं ।मीडिया का भी सुर-ताल बिगड़ने और बहकने लगता है ।घबराए और डरे हुए लोग धैर्य खोने लगते हैं ।सुरक्षा के व्यूह को तोड़कर उनका अचानक बाहर आ जाना और गाँव-घर के लिए भीड़ में निकल पड़ना ‘कोरोना’ को आमंत्रित करने जैसा व्यवहार प्रतीत होता है ।भारत सरकार, बिहार, महाराष्ट्र,दिल्ली-उत्तरप्रदेश और अन्य प्रांतीय सरकारें कोरोना से लड़ने के लिए तत्पर है ।उनके सारे तंत्र दिन रात बचाव में लगे हुए हैं ।जान पर जोखिम उठाकर डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की टीम सेवा दे रही है ।प्रधानमंत्री
, प्रातों के मुख्यमंत्री हर स्तर पर सहयोग में लगे हुए हैं ।आखिर इनकी निष्ठा जनता और देश के लिए ही तो है ।राहत के सारे दरवाजे खोल दिए गए हैं ।कुछ लोग रोटी की तलाश में ,कुछ रोटी की व्यवस्था में तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी रोटी सेंकने के जुगाड़ में हैं ।ऐसे ही लोगों ने जनता को अधीर कर दिया और आँख मूँदकर जनता भी बेपरवाह सड़कों पर निकल पड़ी है ।समय की नाजुक स्थिति समझने की जरूरत है ।जरूरत है अपने नेतृत्व के आग्रह को मानने की ।जरूरत है सुरक्षा के नियमों के पालन की ।जरूरत है बचने और बचाने की,एक-दूसरे के सहयोग की,धैर्य की ।जरूरत है सोशल मीडिया पर प्रलाप और विलाप को स्थगित करने की ।कोरोना से लड़ाई मामूली नहीं है ।यह विषम और भीषण लड़ाई है ।इसे सकारात्मक,संवेदनशील,सहयोगी,सुसंस्कृत,स्वच्छ,सुव्यवस्थित और शांतिपूर्ण होकर परस्पर की सहभागिता से पराजित किया जा सकता है ।समय साक्षी है कि मनुष्य के संकल्प ने कैसी कैसी जययात्राएँ की है ,कितने कितने चुनौतीपूर्ण अभियान तय किए हैं ।यह समय है सचेत और सावधान होने का ।सबका मनोबल बढ़ाने का ।अमृत विचारों से संसार को संचालित करने का ।साधना से मानवता का कल्याण करने का ।यह समय है देवदुर्लभ मानवीय मूल्यों को हर हाल में बचाने का ।प्रेरित होने का समय संकल्प देता है कि —
‘जीवन कुछ ऐसे जिओ,जैसे जिए फकीर ।
आँखों में शिवलोक हो,मस्ती रहे कबीर ।।

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