मजहब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना, अध्याय – 10 ( 1 ) , भारत में सांप्रदायिकता, अंग्रेज और कॉन्ग्रेस

 

भारत में साम्प्रदायिकता ,अंग्रेज और कॉंग्रेस

भारत में प्राचीन काल में शासन की नीति का आधार पंथनिरपेक्ष विचारधारा होती थी । जिसमें शासन का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को स्वतन्त्रता की स्वतन्त्र अनुभूति कराना होता था। किसी पर भी किसी प्रकार का बन्धन न हो, प्रतिबन्ध न हो और अपने जीवन को सब सुरक्षित भाव से जीने का आनन्द ले सकें , ऐसी व्यवस्था करना शासन का प्रमुख उद्देश्य था। जब तक भारत की यह व्यवस्था कार्य करती रही तब तक समाज में शान्ति बनी रही।
भारत के उस शान्ति के उपासक समाज में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगों के लिए कहीं कोई स्थान नहीं था । यदि किसी पर कोई व्यक्ति अत्याचार करता था तो शेष सारा समाज उस अत्याचारी के विरोध में उठ खड़ा होता था। जिससे किसी भी अपराधी मनोवृति के व्यक्ति को अपराध करने से पहले दस बार सोचना पड़ता था।

हिन्दू मुस्लिम पढ़ लिए की नीति तैयार।
अपना लाभ जानकर बढ़ा दई तकरार।।

हम पूर्व में ही स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत में साम्प्रदायिकता अर्थात मजहबपरस्ती और मजहबी दंगों का इतिहास मुस्लिमों के आक्रमण से आरम्भ होता है। इस प्रकार की गतिविधियों को इस्लाम के प्रत्येक शासक ने भारत में प्रोत्साहित किया और दीनी खिदमत के लालच में हर वह अत्याचार करने का प्रयास किया, जिसे वह कर सकता था।
जब भारत में अंग्रेज आए तो उन्होंने देखा कि मुस्लिमों के अत्याचारों और उनके साम्प्रदायिक दृष्टिकोण को भारतवर्ष का हिन्दू ना तो स्वीकार करता है और ना ही उनकी मजहबी कट्टरता के कारण उनके साथ बैठना पसन्द करता है । क्योंकि मुस्लिमों का दृष्टिकोण काफिरों के साथ कयामत तक युद्ध करते रहने का है। दूसरी ओर हिन्दू समाज है जो अपनी स्वाधीनता को हर स्थिति में बनाए रखना चाहता है, वह अपने धार्मिक मूल्यों, सांस्कृतिक पहचान और अपने पूर्वजों की महान परम्पराओं के निर्वाह में विश्वास रखता है, जिन्हें इस्लाम मिटा देना चाहता है । इस्लाम की अपनी मान्यताएं हैं ,जबकि हिन्दुओं की अपनी मान्यताएं हैं, जो दोनों को एक साथ नहीं आने देती हैं। मुसलमान हिन्दुओं की हर एक मान्यता का अतिक्रमण ही नहीं करते हैं, बल्कि ‘हिन्दू विनाश’ में विश्वास रखते हैं। जिस कारण हिन्दू कभी मुस्लिमों को अपना नहीं समझ पाया है ।इसलिए देश का हिन्दू समाज उनके प्रति सशंकित रहता है ।

अंग्रेजों की कूटनीति

देश के मुस्लिम समाज के बारे में अंग्रेजों ने अपनी धारणा बनायी कि ये लोग मजहबी कट्टरता के आधार पर हिन्दुस्तान पर देर तक शासन करते रहना चाहते हैं और इसे अपने रंग में रंग देना चाहते हैं अर्थात इसको दारुल इस्लाम की श्रेणी में ले आना चाहते हैं। अंग्रेजों ने बड़ी सावधानी बरतते हुए यह समझ लिया कि इस समय हिन्दुस्तान की राजगद्दी के उत्तराधिकारी दो हैं। एक हिंदू हैं जो इस देश को अपने पूर्वजों की पवित्र भूमि मानते हैं और इसी आधार पर इस देश की राजगद्दी पर अपना अधिकार जताते हैं ,जबकि दूसरे उत्तराधिकारी मुसलमान हैं । जो यह मानते हैं कि हिंदुस्तान की भूमि को उनके पूर्वजों ने जीता है और जीती हुई वस्तु पर केवल उन्हीं का अधिकार है। दोनों उत्तराधिकारियों की मानसिकता को समझकर अंग्रेजों ने अपनी राजनीतिक गोटियां बैठाने का लक्ष्य निर्धारित किया। उन्होंने समय-समय पर दोनों की राजनीतिक और सामाजिक दूरियों का न केवल लाभ उठाया बल्कि जहाँ आवश्यक हुआ वहाँ साम्प्रदायिक नीति अपनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध किया और जहाँ उचित समझा वहाँ दोनों को लड़ाकर अपनी जीत सुनिश्चित की अर्थात अपना लाभ प्राप्त किया।

वंध्या मुस्लिम कर दिए लिए सभी पुचकार।
अपने हितों को साधने लगी चतुर सरकार।।

अंग्रेजों ने बड़ी चतुराई दिखाते हुए मुस्लिमों को नेतृत्व के विषय में नपुंसक बनाकर रख दिया। उन्होंने इस बात की पूरी व्यवस्था कर ली कि अब कोई ना तो नया सुल्तान बनेगा और ना ही कोई नया मुस्लिम राज्य स्थापित करने वाला बादशाह पैदा होगा। इस तथ्य की ओर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है कि भारत में जैसे ही अंग्रेज आए और उन्होंने अपना साम्राज्य स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ना आरम्भ किया, वैसे ही मुस्लिमों के नए राजनीतिक नेता अर्थात सुल्तान या बादशाह पैदा होने बंद हो गए।
अपनी इस योजना को सिरे चढ़ाने के लिए अंग्रेजों ने सर सैयद अहमद खान जैसे लोगों को पहले दिन से ही खोजना आरम्भ कर दिया था। समय-समय पर वह अपने इस कार्य को करते रहे और उन लोगों को मुस्लिमों का नेता बनाना आरम्भ कर दिया। उनसे देश में द्विराष्ट्रवाद की आवाज लगवानी आरम्भ की। अंग्रेजों ने मुस्लिमों को यह सब्जबाग दिखाने आरम्भ किए कि आप हमारे साथ मिलकर या सामंजस्य बनाकर चलते रहो। भविष्य में यदि हमको कभी भारत छोड़ना पड़ा तो हम आपको आपकी इस वफादारी का पूरा मूल्य चुकाएंगे अर्थात आपको अपना एक देश देकर जाएंगे। अपनी इस योजना को सिरे चढ़ाने के लिए अंग्रेजों ने मुस्लिम साम्प्रदायिकता को समय – समय पर अपना पूरा सहयोग और समर्थन प्रदान किया। जिससे अंग्रेजों के समय में भी मुस्लिम साम्प्रदायिकता भारतवर्ष में नंगा नाच करती रही। इसको आप इस प्रकार समझ सकते हैं कि जहाँ मुगलकाल में सरकार द्वारा प्रायोजित दंगे होते थे या मजहबपरस्ती अपना नंगा नाच दिखाती थी, वहीं अब सरकार द्वारा समर्थित दंगे होने लगे। जिन्हें अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेज पीछे से सहयोग करते थे ।उनका उद्देश्य केवल यह होता था कि मुस्लिम साम्प्रदायिकता के माध्यम से हिन्दुओं को अपनी मुट्ठी में रखा जाए। इस प्रकार हिन्दुओं के प्रति शासन की कुल मिलाकर वही नीति रही जो मुगलों के काल में रही थी। हिन्दू को आज भी साम्प्रदायिक दंगों और हिंसा का शिकार होते रहना था । इस प्रकार की सच्चाई को समझने के उपरान्त भी कांग्रेस के नेता गांधीजी मुगलों के शासन काल को भारत के लिए पराधीनता का काल नहीं मानते थे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत एवं
राष्ट्रीय अध्यक्ष : राष्ट्रीय इतिहास पुनर्लेखन समिति

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