अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति का प्रमुख नारा था – मारो फिरंगियों को

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1857 की क्रांति हमारे आक्रोश और विदेशी सत्ता के प्रति पनप रहे विद्रोह के भाव का प्रतीक थी। जिसमें दलन, दमन और अत्याचार के विरुद्ध खुली बगावत के स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहे थे । चारों ओर लोग ‘मारो फिरंगियों को’ का नारा देकर देश को अंग्रेजों से मुक्त कर देना चाहते थे। अब वह किसी भी कीमत पर विदेशी सत्ताधारियों को देश के भीतर देखा नहीं चाहते थे। क्योंकि जिन लोगों के बारे में यह भ्रम फैलाया गया था कि यह सभ्यता और संस्कृति के पोषक लोग हैं वही अंग्रेज लोग भारत के लिए बहुत बड़ी क्रूरता का प्रतीक बनकर प्रकट हुए थे। जिन्हें लोगों ने बड़ी गहराई से समझ लिया था कि इनके पास सभ्यता, शालीनता संस्कृति और लोकतंत्र की दूर-दूर तक भी कोई संभावना नहीं है।


उस समय देशभक्ति का ऐसा वातावरण था कि यदि कहीं भी कोई गोरा या उसकी मैम दिखाई दे जाती तो लोग उसे तुरंत परलोक भेज देते। हमारे वर्तमान प्रचलित इतिहास का यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि यदि हमारे लोगों ने किसी भी काल में विदेशी क्रूर सत्ताधारी लोगों के विरुद्ध किसी प्रकार का विद्रोह, उपद्रव, विप्लव या बगावत की या क्रांति की योजना पर काम करते हुए उन्हें मारने काटने की योजनाएं बनाई या उन पर काम किया तो हमारे ही इतिहासकारों के द्वारा हमारे पूर्वजों के ऐसे देशभक्ति पूर्ण कार्यों को बहुत ही दर्दनाक दिखाने का प्रयास किया गया है। कुछ इस प्रकार से दिखाने की कोशिश की गई है कि जैसे उन्होंने ऐसा करके बहुत बड़ा अपराध किया था। जबकि अपराधी वह लोग थे जो हमारी स्वतंत्रता को हड़प कर यहां हमारे ऊपर जबरन शासन कर रहे थे । इन तथाकथित इतिहासकारों की दृष्टि में उनका यह अपराध तो हमारे ऊपर उपकार था क्योंकि ये विदेशी लोग लोकतांत्रिक विचारों को लेकर भारत आए थे और हमारा वह महान कार्य एक अपराध था जो इन विदेशी लुटेरों से अपने देश को मुक्त कर लेना चाहता था। इतिहास के न्यायालय से ‘क़ातिलों’ को मुक्त करने और ‘मुंसिफ’ को सम्मानित करने की उल्टी परंपरा भारतीय इतिहास लेखकों के द्वारा ही अपनाई गई है। जिससे हमें सावधान होने की आवश्यकता है। इसी उल्टी परंपरा के शिकार हमारे अनेकों क्रांतिकारी हो गए हैं । जिनमें राव कदम सिंह और धन सिंह कोतवाल जैसे इतिहास नायक भी सम्मिलित हैं।
हमारे क्रांतिकारी जिस क्रांति की ज्वाला को हाथों में लिए घूम रहे थे, उससे सर्वत्र देशभक्ति का परिवेश सृजित हो चुका था । जब लोगों के कानों में यह नारा पड़ता कि ‘मारो फिरंगियों को’ तो तुरंत अपने अपने घरों से लोग बाहर निकल पड़ते और हाथों में कोई न कोई हथियार लेकर ‘मारो फिरंगियों को’ के उद्घोष को ऊंचा करते हुए अपने क्रांतिकारियों के साथ आ मिलते या उनका मनोबल बढ़ाने के लिए दूर से उन्हें प्रोत्साहित करते दिखाई देते थे। जब हमारे क्रांतिकारियों की यह सामूहिक आवाज या नारा कहीं दूर छुपे अंग्रेजों के कानों में पड़ता तो वह भय के मारे कांप उठते थे।
मार्ग से निकलने वाले सभी यूरोपियनों को लूट लिया जाता था। इस सबके उपरांत भी महिलाओं और बच्चों के साथ ऐसा कोई अमानवीय व्यवहार नहीं किया गया जिसे अनुचित कहा जा सके। मवाना-हस्तिनापुर के क्रान्तिकारियों ने राव कदम सिंह के भाई दलेल सिंह, पृथ्वीसिंह और देवी सिंह के नेतृत्व में बिजनौर के विद्रोहियों के साथ मिलकर एक मजबूत मोर्चा तैयार किया। जिससे अंग्रेजों के लिए एक नई चुनौती खड़ी हो गई। इस मोर्चे को देखकर अंग्रेजों को पसीना आ गया था।
इस संयुक्त मोर्चे के वीर सैनिकों ने बिजनौर के मंडावर, दारानगर व धनौरा क्षेत्र में धावे मार मारकर वहां से अंग्रेजों को भगाने में अप्रत्याशित सफलता प्राप्त की। जैसे ही हमारे क्रांतिकारी दिखाई देते अंग्रेजों की कम्पकम्पी बन्ध जाती थी। हमारे वीर क्रांतिकारियों को देखकर अंग्रेज दुम दबाकर भागते। क्योंकि उन्हें यह पूर्णतया आभास हो चुका था कि भारत इन क्रांतिकारियों के नेतृत्व में अब जाग चुका है और अब ऐसे में उनका यहां रहना बड़ा कठिन हो जाएगा। क्रान्तिकारी निरंतर अपने लक्ष्य की प्राप्ति की ओर बढ़ते जा रहे थे। उन्होंने यह अपना मंतव्य बना लिया था कि अब वह बिजनौर पर जाकर हमला करेंगे जहां पर अंग्रेज बड़ी संख्या में रहते थे। बिजनौर को अंग्रेजों से मुक्त कराने का अर्थ बहुत बड़ी सफलता को प्राप्त कर लेना था। राव कदम सिंह और उनके अधिकारी साथियों के कदम अब रुकने का नाम नहीं ले रहे थे । अंग्रेजों में सर्वत्र हाहाकार मच चुकी थी। जबकि क्षेत्र के लोगों में क्रांति की भावना का एक अद्भुत संचार हो चुका था।
मेरठ और बिजनौर दोनो के दारानगर और रावली घाट, पर राव कदमसिंह का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। राव कदम सिंह बरेली बिग्रेड के नेता बख्त खान के से भी संपर्क साधे हुए थे, जो कि उस समय अंग्रेजों के विरोध में पूरी तरह मैदान में आ चुके थे। इससे पता चलता है कि दोनों नेता मिलकर ‘किसी बड़ी योजना’ पर काम करना चाहते थे। राव कदम सिंह ने अपने साथी बख्त खान के अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोही तेवरों को देखते हुए और अपने लक्ष्य की प्राप्ति में उसके महत्वपूर्ण सहयोग को ध्यान में रखते हुए ही बरेली बिग्रेड को गंगा पार करने के लिए नावें उपलब्ध कराई थीं।
हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि 1857 की क्रांति के इस दौर में हमारे सभी क्रांतिकारियों का एक लक्ष्य था कि तुरंत दिल्ली पर जाकर कब्जा किया जाए और वहां पर स्थित लाल किले पर अपना क्रांतिकारी झंडा लहराकर संपूर्ण भारतवर्ष की स्वाधीनता की घोषणा कर दी जाए । इसके लिए हमारे क्रांतिकारियों का यह भी मानना था कि मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर यदि प्यार से उनके साथ आ जाते हैं तो प्यार से नहीं तो जबरदस्ती भी उन्हें क्रांति के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया जाए। जैसे भी हो उन्हें हिंदुस्तान का बादशाह घोषित कर पूर्ण स्वाधीनता की घोषणा की जाए। अंग्रेजों तक यह बात पहुंच चुकी थी । इसलिए वह भी सावधान हो गए थे यही कारण था कि अंग्रेजों ने बरेली के विद्रोहियों को दिल्ली जाने से रोकने के लिए गढ़मुक्तेश्वर के नावों के पुल को तोड़ दिया था।  यद्यपि क्रांतिकारियों के हौसलों को अंग्रेज इसके उपरांत भी पस्त नहीं कर पाए थे। क्योंकि उन्हें ऐसे अन्य गुप्त रास्तों या स्थानों का ज्ञान था जहां से नदी को आराम से पार किया सकता था। यही कारण रहा कि हमारे क्रांतिकारियों ने अपने बुलंद हौसलों का परिचय देते हुए नदी को बड़े आराम से पार कर लिया।
27 जून 1857 को बरेली बिग्रेड के लोगों ने नदी को पार किया और दिल्ली की ओर प्रस्थान करने में सफलता प्राप्त की। हमारे इन क्रांतिकारियों के द्वारा इस प्रकार के दिखाए गए साहस को देखकर अंग्रेज अब पूरी तरह अपने आपको असहाय समझने लगे थे। जहां से हमारे वीर क्रांतिकारियों ने नदी को पार किया वहां पर अंग्रेजों को जानकारी होने के उपरांत भी उनकी ओर से कोई सक्षम विरोध या प्रतिरोध नहीं किया गया। क्योंकि वह जान गए थे कि इस समय क्रांतिकारियों का विरोध करने का अर्थ अपने प्राणों को गंवा देना ही होगा। नदी के पार करते ही क्रांतिकारियों का क्रांति का जोश और भी दुगना हो गया। चारों ओर से लोगों ने आकर अपने क्रांतिकारियों का स्वागत सत्कार किया। उस समय हमारे क्रांतिकारियों के स्वागत सत्कार में लोग पहले से ही भोजन आदि की व्यवस्था करके भी तैयार रहते थे। जिससे उन्हें किसी भी प्रकार की असुविधा अनुभव ना हो। गांव में बहन बेटियां व माताएं विशाल
भंडारों में भोजन आदि की व्यवस्था में लगी रहती थीं। जिससे पता चलता था कि उन सबके भीतर देश भक्ति की कितनी प्रचंड भावना थी ? वैसे भी हत्यारे, लुटेरे और बलात्कारी विदेशी सत्ताधारियों को भारत कभी भी सहन नहीं कर सकता था। क्योंकि भारत की परंपरा में इन नीच कार्यों के लिए कहीं कोई स्थान नहीं था। जिन माता बहनों ने विदेशी बलात्कारी शासकों के हाथों अपने अपमान त शीलभंग कराया या किसी और प्रकार का अपमान सहन किया, उन सबके लिए तो यह और भी अधिक अच्छा अवसर था कि अब विदेशियों को यहां से भगाया जाए और जितना हो सके उनको अधिक से अधिक क्षति पहुंचाई जाए। यही कारण था कि बड़ी संख्या में हमारी माता, बहनें और बेटियां क्रांतिकारियों के प्रति अपनी सहानुभूति, सहयोग और पूर्ण निष्ठा व्यक्त करते हुए मैदान में उतर आयी थीं और यथायोग्य भूमि का को लेकर देशभक्ति के कार्य में जुट गई थीं।

क्रमशः

डॉ राकेश कुमार आर्य
सम्पादक : उगता भारत

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