नवनिर्वाचित मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा के सामने चुनौतियां

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योगेश कुमार गोयल

24वें मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) का पदभार संभालते हुए सुशील चंद्रा ने सुनील अरोड़ा का स्थान लिया लेकिन इसी के साथ उनके लिए चुनौतियों का दौर शुरू हो गया है। बतौर मुख्य चुनाव आयुक्त वर्तमान समय में उनकी जिम्मेदारी कई गुना बढ़ गई है।

मुख्य चुनाव आयुक्त पद से सुनील अरोड़ा के सेवानिवृत्त होने के बाद 63 वर्षीय चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा देश के नए मुख्य चुनाव आयुक्त बन गए हैं। केन्द्र सरकार द्वारा 11 अप्रैल को निर्वाचन आयोग के सबसे बड़े पद के लिए उनके नाम को स्वीकृति दी गई थी, जिसके बाद अगले दिन 12 अप्रैल को केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा उन्हें भारत का मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। अभी तक की परम्परा के अनुसार देश के तीन निर्वाचन आयुक्तों में से सबसे वरिष्ठ आयुक्त को ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनाया जाता है और उसी आधार पर चंद्रा की नियुक्ति इस पद पर हुई है।

13 अप्रैल को देश के 24वें मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) का पदभार संभालते हुए सुशील चंद्रा ने सुनील अरोड़ा का स्थान लिया लेकिन इसी के साथ उनके लिए चुनौतियों का दौर शुरू हो गया है। बतौर मुख्य चुनाव आयुक्त वर्तमान समय में उनकी जिम्मेदारी कई गुना बढ़ गई है क्योंकि देश में पांच विधानसभा चुनावों के मौजूदा दौर में आए दिन चुनाव आयोग की भूमिका पर गंभीर सवालिया निशान लगते रहे हैं और ऐसे में आयोग की लगातार धूमिल होती छवि में सुधार करना उनके कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी होगी। चंद्रा 14 मई 2022 तक इस पद आसीन रहेंगे लेकिन यह तय है कि उनका करीब एक वर्ष का यह कार्यकाल चुनौतियों से भरा रहेगा।

निर्वाचन आयुक्त से मुख्य चुनाव आयुक्त बने चंद्रा की इस पद पर नियुक्ति और सुनील अरोड़ा की सेवानिवृत्ति के बाद चुनाव आयोग में अब केवल दो ही सदस्य रह गए हैं, सुशील चंद्रा तथा चुनाव आयुक्त राजीव कुमार। चुनाव आयुक्त का एक पद फिलहाल रिक्त है, जिस पर शीघ्र नियुक्ति होनी है। दरअसल वर्तमान में आयोग में कुल तीन सदस्य होते हैं, एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त। हालांकि 1950 में जब निर्वाचन आयोग का गठन हुआ था, तब से लेकर 15 अक्तूबर 1989 तक निर्वाचन आयोग मुख्य निर्वाचन आयुक्त सहित केवल एकल सदस्यीय निकाय ही था। 16 अक्तूबर 1989 से 1 जनवरी 1990 तक निर्वाचन आयोग तीन-सदस्यीय निकाय बना, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त आरवीएस शास्त्री तथा दो चुनाव आयुक्त एसएस धनोवा और वीएस सहगल शामिल थे। उसके बाद 2 जनवरी 1990 से 30 सितम्बर 1993 तक निर्वाचन आयोग पुनः एकल सदस्यीय निकाय बना रहा। 1 अक्तूबर 1993 से निर्वाचन आयोग फिर से तीन सदस्यीय निकाय बन गया और तभी से यह तीन सदस्यीय निकाय ही है, जिसके मौजूदा मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुभाष चंद्रा बने हैं। भारतीय राजस्व सेवा (आयकर कैडर) के 1980 बैच के अधिकारी रहे चंद्रा देश के दूसरे ऐसे आईआरएस अधिकारी हैं, जो भारतीय निर्वाचन आयोग के इस सर्वोच्च पद पर आसीन हुए हैं। उनसे पहले आईआरएस अधिकारी टी एस कृष्णमूर्ति भारत के पहले ऐसे मुख्य चुनाव आयुक्त बने थे। तब तक यह पद प्रायः आईएएस अधिकारियों के पास ही रहा था। कृष्णमूर्ति ने फरवरी 2004 से मई 2005 तक चुनाव आयोग के शीर्ष पद पर अहम जिम्मेदारी निभाई थी।

15 मई 1957 को उत्तर प्रदेश में जन्मे सुशील चंद्रा आईआईटी रूड़की से बी-टेक और डीएवी देहरादून से एलएलबी करने के बाद भारतीय इंजीनियिरिंग सेवा में आए और 1980 में भारतीय राजस्व सेवा में चयनित हुए। आईआरएस अधिकारी रहते वे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, दिल्ली सहित कई राज्यों में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर तैनात रहे। इंटरनेशनल टैक्सेशन का अच्छा जानकार माने जाते रहे सुशील चंद्रा गुजरात में महानिदेशक (इन्वेस्टिगेशन) तथा महाराष्ट्र में डायरेक्टर पद पर तैनात रहे। करीब 39 वर्षों तक आयकर विभाग में विभिन्न पदों पर रहे चंद्रा 1 नवम्बर 2016 को कर की सर्वोच्च नियामक संस्था ‘केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड’ (सीबीडीटी) के चेयरमैन बने। अपने उस कार्यकाल के दौरान उन्होंने काले धन की रोकथाम के लिए प्रभावी कदम उठाए थे। उनके नेतृत्व में 2017 में सीबीडीटी ने ‘ऑपरेशन क्लीन मनी’ अभियान शुरू किया था। वे 18 फरवरी 2020 से परिसीमन आयोग के पदेन सदस्य भी हैं और केन्द्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में प्रक्रियाओं को देख रहे हैं। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय टैक्सेशन और इन्वेस्टिगेशन के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कार्य किया है। 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले 14 फरवरी 2019 को उन्हें निर्वाचन आयुक्त के पद पर नियुक्त किया गया था और यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालने से पहले वह सीबीडीटी के अध्यक्ष थे। चुनाव आयुक्त बनने के बाद उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा तथा पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के साथ मिलकर उसी वर्ष सफलतापूर्वक लोकसभा चुनाव सम्पन्न कराए थे।

हालांकि पिछले दो साल से चंद्रा बतौर चुनाव आयुक्त भारतीय निर्वाचन आयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं लेकिन इस समय पांच राज्यों में हो रहे चुनावों के दौरान जिस प्रकार चुनाव आयोग की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर कदम-कदम पर सवाल उठते रहे हैं, ऐसे माहौल में निर्वाचन आयोग के मुखिया की कुर्सी पर आसीन होने के बाद आयोग की निष्पक्षता बहाली उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। दरअसल निर्वाचन आयोग को भले ही एक स्वतंत्र संस्था माना जाता रहा है लेकिन हकीकत यही है कि 1990 के दशक में मुख्य निर्वाचन आयुक्त टीएन शेषन के कार्यकाल को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाए तो इस स्वायत्त संस्था पर सदैव आरोप लगते रहे हैं कि यह केन्द्र सरकार के दबाव में काम करती है। वर्षों से देश की जनता टीएन शेषन जैसे ही चुनाव आयुक्त का इंतजार कर रही है, जो अपनी निष्पक्षता, ईमानदारी और कड़ाई को लेकर सत्ता पक्ष सहित तमाम राजनीतिक दलों के गले की हड्डी बन गए थे और चुनाव आयोग की गरिमा को चार चांद लगाए थे। 12 दिसम्बर 1990 से 11 दिसम्बर 1996 तक के शेषन के कार्यकाल को चुनाव आयोग के इतिहास में एक मिसाल के तौर पर याद किया जाता है। दरअसल उन्होंने अपने कार्यकाल में निष्पक्ष और स्वच्छ चुनाव सम्पन्न कराने के लिए तमाम नियमों का कड़ाई से पालन कराया था, जिसे लेकर तत्कालीन केन्द्र सरकार और दूसरी पार्टियों के कई नेताओं के साथ उनके कई विवाद भी हुए थे लेकिन उन्होंने राजनीतिक दबावों के समक्ष झुकने के बजाय चुनाव आयोग की ऐसी गरिमामयी छवि बना दी थी, जिसकी उस समय तक केवल कल्पना ही की जाती थी।

मौजूदा समय में चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए देश को शेषन जैसे ही ऐसे कर्त्तव्यपरायण सख्त मिजाज चुनाव आयुक्तों की जरूरत महसूस हो रही है, जो किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव के समक्ष घुटने टेकते प्रतीत न हों और जनता के समक्ष अपने हर फैसलों से ऐसी मिसाल पेश करें, जिससे उनके किसी भी फैसले पर किसी भी तरह की उंगली उठने की गुंजाइश ही न रहे और देश का प्रत्येक नागरिक आयोग के हर निर्णय पर आंख मूंदकर भरोसा जता सके। फिलहाल चल रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सुनील चंद्रा की असली अग्नि परीक्षा अगले साल देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश सहित उत्तराखण्ड, पंजाब, गोवा तथा मणिपुर में होने वाले विधानसभा चुनावों को बेहतर ढ़ंग से बिना किसी विवाद के सम्पन्न कराने की होगी। देखना होगा कि सुशील चंद्रा चुनाव आयोग की छवि सुधारने में सफल होंगे या अपना छोटा-सा कार्यकाल पूरा कर पूर्ववर्ती आयुक्तों की भांति खामोशी के साथ विदा हो जाएंगे।

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