पुस्तक समीक्षा : ‘विश्व की श्रेष्ठ बाल कथाएं’

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पुस्तक समीक्षा

‘विश्व की श्रेष्ठ बाल कथाएं’

:विश्व की श्रेष्ठ बाल कथाएं’ डॉ कृष्णा रावत द्वारा संकलित और संपादित अनूठी पुस्तक है । जिसमें विश्व के स्वनामधन्य लेखकों द्वारा लिखी गई बाल कथाएं हैं। इन कहानियों को वैश्विक स्तर पर बहुत श्रेष्ठ माना गया है निश्चित रूप से ऐसी कहानियों का एक स्थान पर लाकर संघ संकलन करना बहुत ही कठिन कार्य है , जिसे डॉक्टर कृष्णा रावत ने कर दिखाया है। इसमें जर्मनी, डेनमार्क, इंग्लैंड, स्पेन, फ्रांस और भारत के कई सुप्रसिद्ध विद्वान लेखकों की कविताओं को स्थान दिया गया है।


सारी कहानियों में अलग-अलग ऐसे महत्वपूर्ण संदेश निकलते दिखाई देते हैं जो बालमन को बहुत गहराई से प्रभावित कर सकते हैं । भाषा की सरलता और सहजता पर डॉ रावत द्वारा विशेष ध्यान दिया गया है । जो कि पुस्तक को बालकों के लिए बहुत उपयोगी बनाने में सहायक रही है । भारत से दो महिला साहित्यकारों श्रीमती माधुरी शास्त्री और श्रीमती सुश्री करुणाश्री की दो – दो कहानियां इस पुस्तक में ली गई हैं।
हिंदी में बाल कथाओं को लेकर ऐसी पुस्तक मिलना दुर्लभ है । डॉ रावत के द्वारा किए गए इस प्रयास से हिंदी को समृद्ध करने में भी निश्चित रूप से सहायता मिली है।
हेन्स क्रिश्चियन एंडर्सन की डेनमार्क की कहानी ‘बुलबुल’ पर यदि विचार किया जाए तो पता चलता है कि ‘बुलबुल’ अपने राजा से बहुत अधिक प्यार करती है। देश निकाला देने पर भी वह राजा के लिए गाना गाने को तैयार हो जाती है। पर जिस शर्त पर वह तैयार होती है उसमें उसका स्वाभिमानी व्यक्तित्व झलकता है । इससे बच्चों को शिक्षा मिलती है कि स्वाभिमान के साथ कभी समझौता नहीं करना चाहिए। अपने भाव और भावनाओं को प्रकट करते हुए भी आत्म सम्मान सुरक्षित रहे, यह ध्यान रखना चाहिए। इसी प्रकार प्रत्येक कहानी एक महत्वपूर्ण संदेश देती है, जो बच्चों के लिए पूरे जीवन भर काम आ सकता है। बच्चों के बारे में यह बात हम सभी जानते हैं कि वे कहानियों को बड़े चाव से पढ़ते हैं और उसमें से निकलने वाले संदेश को वह जीवन भर याद रखते हैं।
डॉ कृष्णा रावत ने अपने ‘आत्मकथ्य’ में कविता की बहुत सुंदर दो पंक्तियां लिखी हैं, वह कहती हैं कि –

‘ए मालिक किताबों की शख्सियत दे दे मुझे,
यूं तो खामोश रहूं बोलूं तो सब कुछ बयां कर दूँ।’

कविता की इन दो पंक्तियों से डॉक्टर रावत के गहन, गंभीर और खामोश रहने वाले व्यक्तित्व का बोध होता है। हमें पता चलता है कि लेखिका स्वयं लेखन कार्य के प्रति कितनी गंभीर हैं और यह भी कि वह अपनी गंभीरता के चलते इस पुस्तक में कितने गहरे सागर से मोती लाने में सफल रही होंगी ? लेखक या लेखिका का प्रयास तभी सार्थक होता है जब वह अपने पाठकों पर अपनी विद्वता और सामाजिक तथा व्यावहारिक जीवन की झलक या स्पष्ट छाप छोड़ने में सफल हो जाएं। वास्तव में कलम के माध्यम से कागजों पर उतरे शब्द ही वे मोती होते हैं जिन्हें जो भी पाठक खरीदता है वही मालामाल हो जाता है और उन्हें अपने हृदय की तिजोरी में बंद करके वहां पर सुरक्षित रखता है। पुस्तक के अध्ययनोपरांत यह निष्कर्ष निकालने में कोई असुविधा नहीं होगी कि डॉक्टर कृष्णा रावत अपने पाठकों के हृदय में उतर कर अपने शब्द मोतियों को उनकी हृदय रूपी तिजोरी में सुरक्षित रखने में सफल रही हैं। पुस्तक संग्रहणीय और पठनीय है।
पुस्तक के प्रकाशक साहित्यागार धामाणी मार्केट की गली ,चौड़ा रास्ता जयपुर हैं। पुस्तक प्राप्ति के लिए 0141 – 23 10785, 4022 382 दूरभाष पर संपर्क किया जा सकता है । पुस्तक का मूल्य ₹250 है। जबकि पुस्तक की पृष्ठ संख्या 144 है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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