आर.एस.एस. प्रमुख ने ‘अखंड भारत’ की बात की है। उन्होंने कहा कि भारत से अलग होकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान अशान्ति और संकट झेल रहे हैं। इसलिए शान्ति, सहजता के लिए उन्हें भारत के साथ पुनः एक होना चाहिए। लेकिन क्या पाकिस्तान या अफगानिस्तान इस्लाम की कीमत पर वैसा चाहते हैं? किसी हिन्दू के लिए शान्ति की चाह सहज बात है। लेकिन मुहम्मदी मजहब में तो जिहाद एक अभिन्न कर्तव्य है। उस की खुली घोषणा है कि दुनिया में शान्ति तभी होगी ‘जब पूरी दुनिया अल्लाह और प्रोफेट मुहम्मद की हो जाएगी’। तब तक वे न केवल अशान्ति और संकट के लिए तैयार हैं, बल्कि उसी का आवाहन और उपयोग करते हैं।

अफगानिस्तान, पाकिस्तान या यहीं कश्मीर में मुस्लिमों को दूसरों ने अशान्ति में नहीं झोंका। उन्होंने सिपह-ए-सहाबा, अल कायदा, जैशे मुहम्मद, तालिबान, हिजबुल मुजाहिदीन, आदि को स्वयं अपनाया। सभी इस्लाम से जुड़े हैं। जिस का एक मात्र अर्थ है प्रोफेट मुहम्मद के रास्ते पर चलना, हर कहीं शरीयत लागू करना। इस में संकट से बचने या शान्ति की कोई चाह ही नहीं है!इस बुनियादी सत्य को अनदेखा कर उन की ‘अशान्ति’, ‘संकट’, आदि पर काफिरों का तरस खाना भयंकर आत्म-छलना है। वे मान लेते हैं कि जैसी उन की भावना है, वही दूसरों की भी होगी। संघ-भाजपा का नारा ‘सबका विकास’ है, तो मुसलमानों का भी यही है। ऐसी बचकानी कल्पना इस्लाम के मामले में सदैव भयावह साबित होती है।

आश्चर्य है कि गत सौ साल में चार बार हाथ जला चुकने के बाद भी हिन्दुओं में वही बालसुलभ आत्म-प्रवंचना काम कर रही है। गाँधीजी ने खलीफत आंदोलन का जोरदार समर्थन कर देश भर में मुस्लिम दबदबे वाले इलाकों में हिन्दुओं को जिबह कराया। फिर आकस्मिक देश-विभाजन कर पंजाब-बंगाल में करोडों हिन्दुओं-सिखों को जिहाद के सामने अपने हाल पर छोड़ दिया। आगे, बंगलादेश बनाने में निर्णायक सहयोग देकर भी वहाँ बचे-खुचे हिन्दुओं के सम्मान तो क्या, समानता से भी रहने का उपाय करना जरूरी न समझा। अंततः, यहीं कश्मीर में मुस्लिमों को बेतरह तवज्जो और धन दे-देकर उन्हें और भूखा जिहादी बनाया, जिस की भेंट डेढ़ हजार कश्मीरी पंडित चढ़े, सैकड़ों ललनाएं बलात् का शिकार हुईं और चार लाख हिन्दुओं को घर छोड़ शरणार्थी होना पड़ा।यह भी आश्चर्य नहीं कि इतने भयंकर, निरंतर झटकों के बाद भी हमारे नेताओं ने कभी किसी प्रसंग की समीक्षा नहीं की। उसे चुपचाप भुलाया, बल्कि छिपाया, झुठलाया भी। फलतः नई पीढ़ियाँ उन भयंकर हिन्दू-संहारों, विस्थापनों के बारे में अनजान हैं। आज भी इस्लामी सिद्धांत और व्यवहार के बारे में हमारा भोलापन यथावत है।

संघ-भाजपा को मालूम नहीं, या वे जानबूझ कर इस की गंभीरता नजरअंदाज करते हैं कि अखंड भारत का एक नक्शा इस्लामी जमातों के पास भी है। अल कायदा उसे ‘मुगलिस्तान’ कहता था, और इस्लामी स्टेट ने उसे ‘खुरासान’ का नाम दिया है। जिस में वे भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान को मिला कर एक इस्लामी देश बनाना चाहते हैं।फिर, हालिया इतिहास गवाह है कि इस्लामी संगठनों में अपने उद्देश्य के लिए मर-मिटने, अड़ने, और दूसरों को छल-बल से झुका सकने की भारी सामर्थ्य है। तुलना में संघ परिवार के नेताओं में तो मौखिक रूप से भी कुछ कहने की ताब नहीं है। तब किस ‘अखंड भारत’ का माद्दा अधिक है?अभी कश्मीर में ही फिर दिखा कि धारा 370 हटाने के बाद भी, जैसे ही उन्हें ‘राष्ट्रवादियों’ की किंकर्तव्य-विमूढ़ता और विचारहीनता का संकेत मिला, वैसे ही इस्लामियों ने तुरत अपना उग्र दबाव बनाना शुरू कर दिया। कि सब कुछ वही हो जो पहले था! पुनः साबित हुआ कि कागज पर लिखी बातें या हवाबाजी नहीं, बल्कि कर्ता की दृढ़ता निर्णायक होती है।

वस्तुतः यही पिछले सत्तर साल का हाल है। इस्लामी तत्वों ने बिना किसी कानूनी प्रावधान या अपनी कोई पार्टी, आदि के होते भी सभी हिन्दू दलों द्वारा ही निरंतर इस्लामी विशेषाधिकार झटके हैं। संघ-भाजपा इस के प्रतिनिधि उदाहरण हैं। पिछले कुछ वर्षों में ही इतनी नई-नई राजकीय सस्थाएं, सुविधाएं, जमीन, और अनुदान ‘अल्पसंख्यकों’ को मिले हैं जिस का आकलन करके किसी के होश उड़ जा सकते हैं। यानी, उस हिन्दू के जो इस्लामी सिद्धांत-इतिहास जानता है। लेकिन जो आत्म-मुग्ध महानुभाव इस्लाम को जानते ही नहीं, वे जिहादी तलवारों को नए-नए हिन्दू शिकार क्रमशः उपलब्ध कराते रहेंगे। खुद बकरे होकर बाघ पर दया करते रहेंगे!

गाँधीजी से लेकर आज के नए गाँधियों तक यह क्रम बदस्तूर जारी है। गाँधी, नेहरू, मनमोहन, वाजपेई तो मंच से विदा होते रहते हैं। उन के बुरे राजनीतिक कर्मों का फल बेचारी हिन्दू जनता भोगती है, जिस ने उन पर भरोसा किया। कैसे नहीं करती! वे सभी हिन्दू लबादे में, हिन्दू शब्दावली, सज्जन भंगिमा, टीका-तिलक लगाकर हिन्दुओं को भरमाते हैं – फिर जिहादियों से निपटने के लिए अकेला छोड़ देते हैं। खलीफत जिहाद से लेकर कश्मीर में हिन्दू-संहार तक, कभी कोई हिन्दू नेता उन्हें बचाने, उन के साथ खड़ा होने, मरने नहीं गया।

इसीलिए, ‘अखंड भारत’ के दो विकल्प हैं। इस्लामी और हिन्दू। रोचक यह कि इसी से मिलते-जुलते बिन्दु पर डॉ. अंबेदकर ने अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया’ (1940) में विस्तार से विचार किया था! किन्तु यह भी हमारे नेताओं की शुतरमुर्गाना सिफत है कि वे हिन्दुओं को विभाजित करने की हर स्कीम के लिए अंबेदकर को लाते हैं। पर इस्लामी चोट से हिन्दुओं को बचाने के लिए जितनी बातें अंबेदकर ने कही थी, उस का भूल कर भी नाम नहीं लेते!यह इस्लामी भाषा में ‘जिम्मी’ रवैया है। गाँधीजी से शुरू होकर गत सौ वर्ष से यह मॉडल व्यवहार के रूप सें यहाँ स्थापित है। भारत के सभी नेता, दल वही चलाते रहे हैं। संघ-भाजपा द्वारा गाँधीजी का चरखा, चश्मा पूरे देश में दूने उत्साह से प्रचारित करने के पीछे वही भाव है। वरना वे श्रीअरविन्द या वीर सावरकर, आदि को प्रचारित करते। पर वे अच्छे जिम्मी के रूप में इस्लाम को प्रसन्न रखने, विशेष आदर में लगे रहते हैं।

इस प्रकार, राजनीतिक इस्लाम की खुली आलोचना किए बिना ‘अखंड भारत’ की बात इस्लामी तत्वो की मुँह-माँगी मुराद पूरी करना हो सकता है। वे फौरन शान्ति व भाईचारे का चोला पहन कर एक हो जाएंगे। शरीयत की ‘तकिया’ तकनीक उन्हें इस की असीम छूट देती है। कि काफिरों को धोखा देने के लिए कुछ भी कहें, करें। फिर, अपनी जिहादी कटिबद्धता से पूरे भारत को इस्लामी शिकंजे में ग्रस लें।यह न केवल संभव है, बल्कि इस के लिए वे पहले से सक्रिय हैं। सफल भी होते रहे हैं। जिस यूरोप ने इस्लाम को हरा कर वापस कर दिया था, वह आज मात्र 6-7 % मुस्लिम आबादी के दबाव में जिहाद से तनो-तराज है। तब ‘अखंड भारत’ में 35 % मुस्लिम आबादी तो बैठे-बैठे, अपनी नजर से ही ऐसे गाँधियों को गद्दी से उठाकर फेंक देगी। इस्लाम के प्रति अज्ञान ने गत सौ सालों में हिन्दुओं की सर्वाधिक तबाही की है। इस पर भोलापन रखना और मन की तरंग में कुछ भी करना अत्यंत घातक है। दुर्भाग्यवश अभी इसी का बोलबाला है। भगवान राम को ‘इमाम-ए-हिन्द’ कहने वाले राष्ट्रवादी नेता नीतियाँ तय करते हैं, और इमामियत के जानकार इसी जानकारी के कारण ही अयोग्य माने हैं। राम बचाएं ऐसे राम-भक्तों से!

  • डॉ. शंकर शरण

 

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