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इतिहास की अगर हम बात करें तो जब भारत में औद्योगिकरण शुरू हुआ तो लगभग 1860-70 में सबसे पहले मारवाड़ के सिंघानिया परिवार इसी ओर अग्रसर हुए। सन् 1921 से लेकर 1937 तक उनके द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में उद्योगों का लोकार्पण किया। इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों मे मारवाडियों द्वारा सभी बड़े-बड़े उद्योग स्थापित किये गए। आजादी के पूर्व से लेकर स्वतंत्रता तक *भारत के सबसे बड़े उद्योगपति समूह हमारे समाज का रामकृष्ण डालमिया का डालमिया-साहू जैन ग्रुप* रहा। उसके बाद भी हमारे समाज के लोग निरंतर नये-नये व विशाल औद्योगिक समूह स्थापि करते चले गए।

सन् 1990 तक हमारे देश भारत के प्रथम दस उद्योगपतियों में आठ मारवाड़ी समाज से आते थे। पर आज ढूँढने पर एक आध लक्ष्मी निवास मित्तल जैसा व्यक्ति मिल पाता है। कुमारमंगलम बिरला भी इस श्रेणी में नहीं आते। देश में मारवाड़ी समाज की इज्जत इसी बात से थी की वे राष्ट्र के विकास में बहुत बड़ा योगदान देते है। मारवाड़ी समाज से किसी भी क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार पाने वाला तो आज तक कोई नही हुआ। मारवाड़ी समाज के लोग राष्ट्र में सम्मान इसी लिए पाते थे कि राष्ट्र के सभी बड़े उद्योगपति इसी समाज से आते थे। मैं प्रमुख बैंकिंग एक्स्पर्ट श्री कामद से शत प्रतिशत सहमत हूँ कि उच्च ओद्योगिक घरानो ने व्यापार में बदलती हुई परिस्थिति को ना देखा ना समझा।यही कारण है कि वे बिखर चुके हैं।

आज हर उद्योगपति चाहे पुत्र हो या पिता हो वे अनिल अम्बानी की कही बात को दोहराते है कि हम शेयर होल्डर के लिए संपत्ति का निर्माण कर रहे है। जबकि धीरुभाई अम्बानी की सफलता का कारण वह अपने शेयर होल्डर के प्रति शत प्रतिशत ईमानदार थे। रिलायंस में जो लाभ होता था, वह पूरी ईमानदारी के साथ शेयर धारक को दे दिया जाता था। धीरूभाई के इस सिद्धांत के चलते धीरु भाई के रिलायंस ग्रूप के ६० लाख से ऊपर शेयर धारक है। मुकेश अम्बानी कोई बड़ा से बड़ा इशू लता है ,वह दो घंटो में पूरा हो जाता है। शेयर धारक से पैसा लेने पर धीरुभाई की कम्पनी को अतिरिक्त मुनाफ़ा होता रहा है। उसे कभी बैंक से उधार लेकर पैसा वापस करना नही पड़ता व नहीं ब्याज देना पड़ता है। वह नाहीं अन्य लोगों को देना पड़ता है। इस कारण रिलायंस की आय उनके प्रतिद्वंदियों की तुलना में अधिक होती एवं उसके शेयर का दाम अधिक होता है। वही मारवाड़ी उद्योगपति धीरुभाई की इस बात से कुछ नही सीख कर उनके बच्चों द्वारा कही नक़ली बात को दोहरा रहे है। पुराने उद्योगपतियों के सामने इतनी बड़ी सॉफ्टवेयर क्रांति आयी। इसका लाभ कोई भी मारवाड़ी भाई नही ले सका। सिर्फ़ नए इंजिनीयर नारायण मूर्ति ने भारतीय इंजिनीयर की प्रतिभा को पहचाना और विश्व स्तर की एक कम्पनी इनफ़ोसिस खड़ी कर दी। पुराने उद्योगपति टाटा व अजीज प्रेमजी ने इस लाइन को पहचाना तथा आज विश्व की इस क्षेत्र की उनकी कम्पनी अग्रणी कम्पनी है। किसी भी मारवाड़ी भाई की इस क्षेत्र में क़ोई भी कम्पनी नहीं है। हमारी उन्नति नही होने का एक कारण यह भी है कि हम ईमानदारी से इंकम टैक्स नहीं देते। इसका ग़लत परिणाम यह होता है कि हमारी बैलेन्स शीट ख़राब होती है। हमारी कम्पनी अच्छा काम
कर रही हैं,पर वह बैंक के अधिकारियों को आकर्षित नहीं करती तथा हम कम्पनी का बिस्तार नहीं कर पाते। आज एक भी मारवाड़ी युवक एयरपोर्ट पर स्वागत करने लक्ष्मी निवास मित्तल के लिए नही पहुँचा। आरसेलर मित्तल की कठिन लड़ाई, जिसको पूरा विश्व देख रहा था। उनकी यह जीत भारत के लिए एक अनोखी प्रथम जीत थी। हम खिलाड़ियों के लिए तो स्वागत करने एयरपोर्ट पहुँच जाते है , पर लोहे के क्षेत्र में विश्वविजयी इस योद्धा की जीत पर अन्य कोइ नही गया तो क्या हुआ ,मारवाड़ी समाज को तो अवश्य जाना चाहिए था।

आज हमारे समाज के जो श्रेष्ठ प्रतिभाशाली युवा हैं,वे नौकरी करना चाहते है। महेंद्रा के पवन गोइनका या प्रभात खबर के कमल कुमार गोइनका ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है ।वे यदि नौकरी ना करके अपना व्यापार करते, तो एक बड़ा व्यापार खड़ा अवश्य कर देते। मैंने इंजिनीयरिंग व एमबीए करने के बाद अपना व्यापार आरम्भ किया ३ लाख के निवेश व ६८ लाख के क़र्ज़े के साथ एक pvc पाइप बनाने का कारख़ाना लिया। आज २५ वर्ष में मेरी कुलसंपत्ति ₹४०० करोड़ व १ हज़ार करोड़ का कुल कारोबार है। नौकरी करके मैं उतना नही कमा सकता था। समाज के सम्पन्न मारवाड़ी जब अच्छे चल रहे कारख़ानों को बेचकर समाज को गलत संदेश दे रहे हैं।

वेस्ट कोस्ट पेपर (गुजरात) अंबुजा को नई ऊँचाई तक पहुँचाया जा सकता था। इन उद्योगों की बिक्री से आय को या ब्याज में लगाया गया या शेयर कारोबार में लगाया गया। मुझे अत्यंत दुःख पहुँचता है जब अपनी आँख के सामने हिंदुस्तान मोटर्स को मरते हुए देखता हूँ। उनके सामने मारुति की सुंदरता व तेल की खपत चुनौती थी। उसको सुधार करते तो कम्पनी कभी मरती नहीं। कम्पनी कहती रही हमारे पार्ट्स बहुत बिकते है। आज कम्पनी मर गयी। आज मार्केट केपिटलाइजेशन के नाम पर जो लोग गलत खेल खेल रहे हैं,वो एक दिन उनको पछतावा जरूर होगा।
*कलकत्ता शेयर बाज़ार की प्रतिष्ठा पूरे विश्व में थी*। उसको किस तरह बर्बाद क़िया गया यह सबके सामने है। बड़े भाई श्री रवि पोद्दार ने ठीक ही कहा है :
“They are not finished. They are restricted due to our wrong training and our mishandling.They should have small meet and discuss what went wrong and how to bring back old glory.”

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