सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार आचरण करने पर मनुष्य उत्तम गुणों से युक्त होते हैं : शैलेश मुनि महाराज

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ओ३म्
-आर्यसमाज धामावाला, देहरादून का रविवारीय सत्संग-
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आज हमने प्रातः देहरादून की मुख्य आर्यसमाज धामावाला के साप्ताहिक सत्संग में भाग लिया। सत्संग का आयोजन प्रातः 8.30 बजे अग्निहोत्र यज्ञ से हुआ। आर्यसमाज के पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी ने यज्ञ सम्पन्न कराया। यज्ञ में अनेक सदस्यों सहित स्वामी श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम के बच्चों ने भाग लिया। यज्ञ की समाप्ति पर सत्संग का कार्य आर्यसमाज के भव्य सभागार में हुआ। सत्संग के आरम्भ में स्वामी श्रद्धानन्द बाल वनिता आश्रम की चार कन्याओं ने सुश्री नन्दिता जी के साथ एक भजन प्रस्तुत किया। भजन के बोल थे ‘ऐ मेरे प्यारे ऋषि जब तक है ये जिन्दगी, भूलेंगे न हम। तेरे तप और त्याग को, तेरे अमर बलिदान को, भूलेंगे न हम।।’ इस भजन के बाद आर्यसमाज के पुरोहित श्री विद्यापतिशास्त्री जी ने जो एक बहुत अच्छे गायक व भजनोपदेशक भी हैं, एक भजन प्रस्तुत किया। भजन के बोल थे ‘दूसरों की राह में बिछाता है शोले, कैसे मिलेंगे तुझे खुशियां फूल रे।’ यह भजन पंडित जी ने भक्ति भाव में भरकर बहुत मधुर स्वरों में सुनाया जिसे सत्संग में उपस्थित सभी श्रोताओं ने पसन्द किया।

पंडित जी के भजन के बाद बाल वनिता आश्रम की पुत्री रोशनी ने सामूहिक प्रार्थना कराई। उन्होंने प्रार्थना में ईश्वर से बहुत सी बातें कही। हमने कुछ बातें नोट की। उन्होंने कहा ईश्वर सर्वोपरि है। हमारी सभी कामनायें सिद्ध हों। हम धन ऐश्वर्यों के स्वामी हों। ईश्वर हमें बल और शक्ति प्रदान करें। हम ईश्वर की महिमा के गीत गाया करें।

सामूहिक प्रार्थना के बाद पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी ने सत्यार्थप्रकाश के तेरहवें समुल्लास का10 मिनट पाठ किया व कुछ बातों को समझाया। उन्होंने बताया कि बाइबिल ग्रन्थ के अनुसार स्वर्ग किसी स्थान विशेष पर है। उन्होंने बताया कि इस प्रसंग में ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि सर्वव्यापक परमात्मा का कोई स्थान विशेष मन्दिर आदि नहीं हो सकता। पुस्तक में अनेक बातें लोगों को लुभाने के लिये लिखी गई हैं। परमात्मा की उपासना के लिये भक्तों को किसी मन्दिर जैसे विशेष स्थान की आवश्यकता नहीं है। परमात्मा के लिये कोई एक स्थान विशेष महत्व नहीं रखता। पण्डित जी ने श्रोताओं को यह भी बताया कि लोग परमात्मा के पास जाना तो चाहते हैं परन्तु उन्हें परमात्मा के पास जाने का रास्ता मालूम नहीं है। पण्डित जी ने सत्यार्थप्रकाश में वर्णित बाइबिल पुस्तक की कुछ अविश्वसनीय बातें भी पढ़कर सुनाई।

आर्यसमाज में आज का प्रवचन ज्वालापुर-हरिद्वार से पधारे आर्य विद्वान श्री शैलेशमुनि सत्यार्थी जी का हुआ। उन्होंने गायत्री मन्त्र के जप के साथ अपना उपदेश आरम्भ किया। आचार्य शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने स्वर्ग व नरक के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डाला। आचार्य जी ने कहा कि सुख विशेष सामग्री की उपलब्धि व सुख की स्थिति को स्वर्ग कहते हैं। नरक दुःख विशेष व दुःख की स्थिति को कहते हैं। आचार्य जी ने स्वर्ग व नरक की विस्तार से व्याख्या की। उन्होंने बताया कि ऋषि दयानन्द अपने जीवन में दो बार देहरादून आये थे। आचार्य जी ने ऋषि दयानन्द के भिन्न भिन्न स्थानों पर भ्रमण का उल्लेख किया और बताया कि वह भी उनमें से अधिकांश स्थानों पर गये हैं। गृहस्थ जीवन की चर्चा कर उन्होंने कहा कि पहले माता पिता अपने पुत्र व पुत्रियों का विवाह करते समय वर व कन्या पक्ष के रहन सहन पर विशेष दृष्टि डालते थे। वह देखते थे कि क्या परिवार के लोग मिलकर रहते हैं? वह यह भी देखते थे कि जिस परिवार में सम्बंध कर रहे हैं उनमें कष्ट व विपरीत परिस्थितयों को सहन करने की भी शक्ति है या नहीं। विद्वान वक्ता ने कहा कि आज हमारी सहन शक्ति कम हो गई है। आचार्य जी ने राजा और एक व्यापारी की रोचक कथा सुनाई और बताया कि राजा के दरबार में उपस्थित एक वृद्ध नागरिक ने बताया कि हीरा हाथ में लेकर उसे हिलाने डुलाने पर भी वह गर्म नहीं होता और हीरे के समान अन्य पदार्थ हाथ में रखने पर कुछ समय बाद कुछ गर्म हो जाते हंै। उन्होंने कहा की असली हीरा गर्म नहीं होता और जो गर्म हो जाता है वह नकली हीरा होता है। उन्होंने कहा कि ऐसे ही मनुष्य भी अच्छे व बुरे होते हैं। जो विपरीत परिस्थितियों में अपने गुण बनाये रखें, उनमें परिवर्तन न आने दें वह अच्छे मनुष्य होते हैं। जो मनुष्य विपरीत परिस्थितियों में सदाचरण का त्याग कर देते हैं वह अच्छे मनुष्य नहीं होते। आचार्य जी ने आर्यसमाज के विख्यात संन्यासी स्वामी सर्वदानन्द सरस्वती जी के पौराणिक मत से वैदिक विद्वान व संन्यासी बनने की कथा भी सुनाई। स्वामी सर्वदानन्द सरस्वती पहले पौराणिक संन्यासी थे और सत्यार्थप्रकाश पढ़कर आर्य संन्यासी बने थे।

आचार्य शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने कहा जो मनुष्य अपने घर को स्वर्ग बनाना चाहते हैं व स्वयं को सुखी रखना चाहते हैं उन्हें अपने घर की महिलाओं को सम्मान देना चाहिये। उन्होंने विस्तार से व्याख्या कर बताया कि पुरुषों को नारियों को यथाशक्ति आभूषण, वस्त्र व उनकी पसन्द के भोजन उपलब्ध कराने चाहियें। उन्होंने बताया कि ऋषि दयानन्द ने कहा है कि इन तीन वस्तुओं में ही स्त्रियों की रूचि और लगाव होता है। आचार्य जी ने इस प्रकरण से जुड़ी व अपने अनुभव पर आधारित अपने एक परिचित पति-पत्नी के जीवन की वास्तविक घटना भी सुनाई जिससे स्त्रियों की आभूषणों तथा वस्त्रों के प्रति रुचि सिद्ध होती है। आचार्य जी ने गृहस्थ जीवन को सुखी बनाने के अन्य कई उपाय भी श्रोताओं को बतायें। उन्होंने कहा कि पति पत्नी को एक दूसरे को प्रातः व रात्रि के समय नमस्ते करनी चाहिये। इससे परिवार में मनोमालिन्य व विवाद नहीं होता और कभी हो भी जाये तो शीघ्र समाप्त हो जाता है।

आचार्य जी ने सत्यार्थप्रकाश के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जिस मनुष्य का आचरण शुद्ध न हो उसके अपने घर आने पर भी प्रतिबन्ध लगा देना चाहिये। आचार्य जी ने कुछ पुरोहितों के आचार विषयक दोषों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि हमारे किसी पुरोहित में आचरण संबंधी कोई दोष नहीं होना चाहिये। उन्होंने कहा कि जिसका आचरण शुद्ध होगा वही व्यक्ति सिद्धियों को प्राप्त हो सकता है। उन्होंने चेतावनी दी की अपने सन्तानों के आचरणों पर ध्यान दें और उनका सुधार करें। आचार्य जी ने कहा कि यदि सन्तान बिगड़ गई तो सब गड़बड़ हो जायेगा। उन्होंने कहा कि अधिक धन व साधन होने पर मनुष्य का खानपान व रहन सहन बिगड़ने की सम्भावना होती है। आर्य विद्वान शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने प्रतिदिन प्रातः व सायं सन्ध्या करने को आवश्यक बताया और कहा कि ऐसा करने से संस्कार सुरक्षित रहते हैं। आचार्य जी ने कहा कि भले ही मनुष्य इंजीनियर व डाक्टर बने या न बने परन्तु उन्हें ईश्वर उपासक तो अवश्य ही बनना चाहिये। श्री सत्यार्थी जी ने कहा कि जो मनुष्य गायत्री मन्त्र का जप करता है, यह मन्त्र उस मनुष्य का रक्षा कवच बन जाता है। आचार्य जी ने सभी बच्चों को गायत्री मन्त्र को अर्थ सहित सिखाने की प्रेरणा की। विद्वान वक्ता ने कहा कि हमें जप की सही विधि भी सीखनी व अपने बच्चों को सिखानी चाहिये। गायत्री मन्त्र के जप से बुद्धि तीव्र होती है। इससे मनुष्य गूढ़ से गूढ़ रहस्यों को जानने में समर्थ होता है। उन्होंने बताया कि ऋषि दयानन्द के विद्यागुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती गंगा नदी में खड़े होकर गायत्री मन्त्र का जप किया करते थे। महात्मा आनन्द स्वामी जी को भी गायत्री मंत्र का जप करने से लाभ हुआ था। अपने वक्तव्य को विराम देते हुए आचार्य श्री शैलेशमुनि सत्यार्थी जी ने कहा कि सत्यार्थप्रकाश पढ़ने तथा इसके अनुरूप आचरण करने से मनुष्य व सन्तानें उत्तम गुणों से युक्त होते हैं।

आर्यसमाज के प्रधान डा. महेश कुमार शर्मा जी ने आज के व्याख्यान के लिये आचार्य शैलेशमुनि सत्यार्थी जी को धन्यवाद किया। आज का वेद विचार बताते हुए उन्होंने कहा कि आज का वेद विचार ऋग्वेद का विचार है जिसमें कहा गया है कि‘दानी अमरत्व को प्राप्त करते हैं।’ आज के यज्ञ के यजमान श्री संजय भल्ला जी को आर्यसमाज के प्रधान जी ने शुभकामनायें एवं बधाई दी। इसके बाद बाल वनिता आश्रम की कन्या नन्दिता जी ने संगठन सूक्त का पाठ कराया और पुरोहित पं. विद्यापति शास्त्री जी ने सामूहित शान्तिपाठ कराया। इसी के साथ आज का सत्संग समाप्त हुआ। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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