तीव्र गति से चलने वाले लोगों की विशेषता

*विशेष कार्य करने की इच्छा वालों को तेज चलना चाहिए, तभी वे विशेष कार्य कर पाएंगे, अन्यथा नहीं।*
*जो लोग संसार में कुछ विशेष कार्य करना चाहते हैं, वे लोग पूर्व जन्म के संस्कारों के कारण तीव्र गति से चलते हैं।* अधिकतर लोग कोई विशेष कार्य नहीं करते। सामान्य रूप से पढ़ना लिखना खाना-पीना और घर परिवार चलाकर अपना जीवन पूरा करना।


तीव्र गति से चलने वाले लोग अलग ही दिखाई देते हैं। जैसे भक्त प्रहलाद , ब्रह्मचारी नचिकेता इत्यादि । ऐसे लोगों के विशेष संस्कार बचपन से ही दिखाई देते हैं ।
इसी प्रकार के कुछ अन्य संस्कारी लोग भी विशेष पुरुषार्थ करते हैं, और बहुत उच्च स्तर पर पहुंच जाते हैं। वे भी पूर्व जन्मों के विशेष संस्कारी होते हैं, और देश धर्म एवं समाज की उन्नति के लिए अद्भुत कार्य कर जाते हैं। *जैसे ब्राह्मण संन्यासी विभाग में महर्षि दयानंद सरस्वती, महर्षि कणाद, महर्षि गौतम, महर्षि कपिल, महर्षि जैमिनी, महर्षि पतंजलि इत्यादि। इन सब महापुरुषों ने वेदों की रक्षा करने का, तथा मनुष्य को सब दुखों से छुटकारा दिलाने वाले मोक्ष का मार्ग दिखाने का महान कार्य किया। ये महापुरुष, सब लोगों से अलग हटकर तीव्र गति से चलते थे।*
ऐसे ही क्षत्रिय विभाग में, महाराणा प्रताप वीर शिवाजी चंद्रशेखर आजाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस भगत सिंह इत्यादि महापुरुषों ने विशेष गति दिखाई और ऊंचे आदर्श प्रस्तुत किए।
वैश्य विभाग में भी बहुत से नाम भामाशाह, टाटा बिरला आदि, और आजकल अंबानी अडाणी एवं बिलगेट्स आदि प्रसिद्ध हैं। ये लोग भी सबसे अलग हटकर तीव्र गति से चलने वालों में से हैं।इन्होंने भी अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की।
यदि आप भी ऊपर बताए महापुरुषों के तुल्य कुछ विशेष कार्य करना चाहते हों, तो आपको भी तीव्र गति से चलना होगा। यदि ऐसा करना हो, तो अकेले भी चलना होगा। *अर्थात आपकी सोच आपका चिंतन, अन्य सामान्य लोगों से हटकर विशेष होगा। यदि आप ऐसा कर पाएंगे, तो देश धर्म समाज की उन्नति एवं रक्षा के लिए कुछ विशेष योगदान कर पाएंगे।*
और यदि तीव्र गति से अकेले नहीं चल सकते, विशेष कार्य करने की क्षमता न हो, तो कोई बात नहीं, भले ही धीरे चलें, तब भी समाज के साथ मिलकर तो चलना ही होगा। *सामाजिक नियम में परतंत्र रहते हुए सब कार्य करना होगा।*
तब आप भले ही विशेष कार्य न कर पाएँ, परन्तु पाप कर्म तो कभी नहीं करना चाहिए। *जो लोग समाज की उन्नति के लिए कोई विशेष कार्य भी नहीं करते; और सामाजिक नियमों में परतंत्र रहकर सब के साथ भी नहीं चलते, ऐसे दुष्ट संस्कार वाले लोग, समाज से हटकर चोरी डकैती लूट मार हत्याकांड अपहरण इत्यादि पाप कर्म करके सबकी हानि करते हैं। मानवता को ध्यान में रखकर कम से कम दूसरों की हानि तो नहीं करनी चाहिए। ऐसा व्यवहार तो मनुष्यता से ही बाहर है।*
– *स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक।*

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