मनु और मनुस्मृति को शुद्र विरोधी कहना पूरी तरह गलत

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रवि शंकर

यह देखना काफी दुखद है कि स्वयं को प्रगतिशील मानने वाला देश में हरेक व्यक्ति मनु यानी कि मनस्मृति के विरोध में खड़ा रहता है। डॉ. अंबेडकर जैसे बुद्धिमान और पढ़े-लिखे माने जाने वाले नेता ने भी मनु स्मृति दहन का कार्यक्रम किया था जो कि उनके अनुयायी आज भी कहीं-कहीं करते रहते हैं। वेदों में कहा गया है मनुर्भव यानी कि मनुष्य बनो। इस मनु शब्द से ही मनुष्य शब्द बना है परंतु मनुवादी होना आज एक गाली हो गया है। किसी को बड़ी सरलता से मनुवादी कह दिया जाता है और मनुवादी कहते ही आरोपी एकदम से अप्रासंगिक और पिछड़ा मान लिया जाता है। हैरानी की बात यह भी है कि जो लोग मनु स्मृति को जलाने की वकालत करते हैं, वही लोग संविधान की रत्ती भर आलोचना भी सहन नहीं कर पाते। शासन के बल पर गुंडागर्दी करने वाले तत्वों की इतनी अंधेरगर्दी आज अपने देश में चल रही है कि आज संविधान और उसके रचयिता माने जाने वाले डॉ. अंबेडकर की आलोचना करने वाले को जान का भय भी हो सकता है, परंतु वहीं मनु स्मृति के रचनाकार स्वांयभुव मनु को गाली देना और मनु स्मृति को जलाना फैशन माना जाता है।


दुर्भाग्य यह है कि मनु स्मृति को आज केवल शूद्रों और स्त्रियों के लिए दी गई नकारात्मक व्यवस्थाओं के लिए जाना जाता है। वे व्यवस्थाएं मनु की हैं या नहीं, इस पर हम पृथक से विचार करेंगे, परंतु पहले यह देखना आवश्यक है कि क्या मनु में केवल यही लिखा है या फिर मनु और भी विषयों पर कुछ कहते हैं? मनु स्मृति एक विशाल ग्रंथ है और इसमें सृष्टि रचना से लेकर मानव इतिहास, मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कार व कर्तव्यों, शिक्षा व शिक्षण पद्धति, व्यवसाय, राजनीति, शासन व दंड व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था, परिवार व्यवस्था आदि विविध विषयों का वर्णन है।
सबसे पहले यह बात जानने योग्य है कि मनु ने वर्णों के विभाजन का वर्णन सृष्टि रचना का क्रम बताने के प्रसंग में की है। मनु के पहले अध्याय की शुरूआत ही सृष्टि रचना से होती है। यहां मनु सृष्टि रचना का क्रम बताते हुए मनुष्यों के कर्मों और तदनुसार वर्णों के विभाजन का भी वर्णन करते हैं। वर्णों का निर्धारण करने से पहले मनु ने धर्म तथा अधर्म के विभाजन करने का आधार बताया है। वे कहते हैं – और फिर कर्मों के विवेचन के लिए धर्म-अधर्म का विभाग किया गया तथा सुख-दुख आदि द्वन्द्वों से प्रजा का संयोग (परिचय, मेल, अनुभव) हुआ। (मनु 1/26)
इस संदर्भ से स्पष्ट है कि मनु धर्म-अधर्म को अच्छे-बुरे कर्मों पर आधारित मानते हैं। इससे यह भी साफ है कि धर्म को आज जैसा परिभाषित किया जाता है, वह सही नहीं है और कोई भी व्यवस्था धर्म से निरपेक्ष नहीं होनी चाहिये। अब प्रश्न उठता है कि वर्णों की रचना कैसे हुई? क्या वर्ण और जाति एक ही हैं? क्या एक वर्ण दूसरे से बड़ा या छोटा है? मनु ने कहा है – प्रजाओं अर्थात् समाज की विशेष वृद्धि (शांति, समृद्धि व विकास) के लिए मुख, बाहु, जंघा और पैर की गुणों की तुलनानुसार ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र वर्ण की व्यवस्था का निर्माण किया। (मनु 1/131)
यहां सृष्टि रचना के बाद जीव और मनुष्यों के कर्मों, स्वभावों और गुणों के संयोग और उनके अनुसार समाज की व्यवस्था का प्रसंग चल रहा है। इसीलिए इससे चार श्लोक पहले मनु ने कर्मों की व्यवस्था हेतु धर्म-अधर्म की व्यवस्था की है। यहां यह भी द्रष्टव्य है कि जिन चार अंगों से वर्णों की तुलना की है, उनमें से किसी को भी कोई हेय या श्रेष्ठ नहीं मानता। कम से कम शरीररचना विज्ञान के विद्वान के लिए तो इनमें से सारे अंग एक समान ही श्रेष्ठ हैं। इसी प्रकार मनु भी इन सभी वर्णों का केवल गुण कर्म व स्वभाव के अनुसार कर्म आधारित विभाग कर रहे हैं।
अब प्रश्न उठता है कि क्या कोई वर्ण श्रेष्ठ और कोई हीन है। क्या मनु किसी वर्ण को अधिक श्रेष्ठ मानते हैं। मनु ने श्रेष्ठता के आधारों का कई स्थानों पर वर्णन किया है। देखने वाली बात यह है कि उन्होंने कहीं भी वर्ण को श्रेष्ठता का आधार नहीं माना। दूसरे अध्याय में ही श्रेष्ठता का आधार बताते हुए मनु कहते हैं – धन, बंधु यानी मित्रों व सहयागियों की संख्या, उत्ताम कर्म और विद्या, श्रेष्ठता के ये पांच मान्य स्थान हैं और इनमें भी धन से बंधु, बंधु से कर्म और कर्म से विद्या अधिक माननीय हैं। इस श्लोक से पता चलता है कि मनु किसी को सम्मान देने में लिंग, जाति, वर्ण आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करते हैं। इसके बाद मनु एक और स्थान पर किसको अधिक महान माना जाए, इसके बारे में बताते हुए कहते हैं -अधिक आयु होने से या केशों के पकने से या अधिक धनवान होने ये या फिर ढेर सारे साथी या समर्थकों के होने से कोई महान नहीं होता। जो ऋषियों के बनाए धर्म को जानता है, वही महान होता है। (मनु 2/154) स्पष्ट है कि यहाँ भी मनु ने वर्ण को मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार नहीं माना है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि आखिर मनु ने ब्राह्मण को श्रेष्ठ तथा महान और शूद्र को हीन और निम्न कहाँ बताया है। कम से कम सिद्धांत के रूप में तो मनु ब्राह्मण या शूद्र होने को श्रेष्ठता के लक्षण के रूप में स्वीकार नहीं करते। आगे के श्लोकों में जब मनु इन वर्णों का लक्षण बताएंगे तो यह बात और भी साफ हो जाएगी।
यह कहने की तो कोई आवश्यकता है ही नहीं कि मनु स्मृति में वर्णों का निर्धारण कर्म और स्वभाव के आधार पर किया है। उदाहरण के लिए ब्राह्मण वर्ण की परिभाषा करते हुए मनु ने कहा है – इन छह काम करने वाला ब्राह्मण कहलाता है – पढ़ाना, पढऩा, स्वयं यज्ञ करना और दूसरों को करवाना, दान देना और दान लेना। ब्राह्मण होने के लिए उपरोक्त छह कार्य करने वाला होना चाहिए। (मनु 1/87) स्पष्टत: ब्राह्मण होने का आधार कर्म है, जन्म नहीं। मनु ने इसी प्रकार सभी वर्णों के कर्मों का उल्लेख किया है। मनु ने इसे और भी अधिक समझाते हुए अपने ग्रंथ के अंत में कहा है – ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन वर्ण द्विजाति हैं और शूद्र वर्ण एकजाति है। इनके अलावा कोई पाँचवाँ वर्ण नहीं है। (मनु 10/4) इसका अभिप्राय एकदम साफ है कि जिन लोगों ने गुरूकुल जा कर उपनयन करवाया, वे द्विज कहलाए और फिर गुरू द्वारा उनके गुण तथा स्वभाव के अनुसार तीन द्विज वर्णों में से किसी एक वर्ण का निर्धारण किया जाता है। परंतु जो विद्या ग्रहण में असमर्थ है और इस कारण उपनयन नहीं करवाता, वह एकजाति है और शूद्र है। मनु शूद्र के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए लिखते हैं
एकं एव तु शूद्रस्य प्रभु: कर्म समादिशत्। एतेषां एव वर्णानां शुश्रूषां अनसूयया।। मनु 1/91
यानी शूद्र का एक ही कर्म है कि वह बिना किसी से द्वेष रखे तीनों वर्णों की सेवा करे। यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि इससे पहले मनु ने ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के कर्मों में अध्ययन को अनिवार्य रूप से रखा है। केवल शूद्र को अध्ययन से छूट दी है। यानी जो अध्ययन करने में योग्य नहीं है, केवल उसी को मनु ने शूद्र स्वीकार किया है। मनु के इस विधान से भी दो बातें साफ हो रही हैं। पहली बात तो यह है कि शूद्र विद्या से दूर है और केवल शारीरिक परिश्रम करता है। दूसरी बात यह है कि इसके बाद भी वह किसी की घृणा का पात्र नहीं है। उसे शेष तीनों वर्णों की सेवा करनी है, तो वह किसी भी प्रकार से अछूत या घृणा का पात्र नहीं हो सकता। सेवा तो निकट रहकर ही की जा सकती है। ऐसे में अन्य तीन वर्णों के लिए शूद्र किसी भी प्रकार से निरादर या घृणा का पात्र नहीं है। दंडविषयक विधान करते हुए मनु ने इस बात को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। वे लिखते हैं – जो कुछ जानकार (आज की भाषा में पढ़ा-लिखा कह सकते हैं) होकर चोरी करे तो उस शूद्र को चोरी से (सामान्य शूद्र को चोरी के लिए दिए जाने वाले दंड से) आठ गुणा अधिक, वैश्य को सोलह गुणा अधिक, क्षत्रिय को बत्तीस गुणा अधिक और ब्राह्मण को चौंसठ गुणा या सौ गुणा या फिर एक सौ अ_ाइस गुणा (जितना अधिक विद्वान उतना अधिक) अधिक दंड देना चाहिए। (मनु 8/337, 338)
मुझे नहीं लगता कि डॉ. अंबेडकर या आज के कथित दलित चिंतकों ने मनु स्मृति का यह विधान पढ़ा होगा। मनु यहाँ शूद्रों के साथ भेदभाव तो कर रहे हैं, परंतु वह भेदभाव स्वागतयोग्य है। इससे यह भी स्पष्ट है कि मनु ने हमेशा विद्वता को महत्व दिया है और अनपढ़ और अज्ञानी को ही वे शूद्र मानते हैं। इसके बाद मनु ने शूद्रों के ब्राह्मण बनने और ब्राह्मण के शूद्र हो जाने का भी विधान दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि कर्मों के आधार पर ब्राह्मण शूद्र हो जाता है और शूद्र ब्राह्मण।
प्रश्न उठता है कि यदि मनु ने किसी वर्ण को श्रेष्ठ और किसी को नीच माना ही नहीं है, जो फिर मनु स्मृति की विरोध आज के कथित दलित चिंतक क्यों कर रहे हैं? वर्तमान में उपलब्ध मनु स्मृति में शूद्रों के लिए अलग और भेदभावकारी विधान देने वाले श्लोक बड़ी संख्या में मिलते हैं। इसलिए मनु पर इतने सारे आरोप लगते हैं। परंतु जैसा कि हम ऊपर देख आए हैं कि मनु सिद्धांतत: वर्णों में किसी को ऊँचा और नीचा मानते ही नहीं है, फिर वे उनके लिए भेदभावकारी व्यवस्थाएं कैसे दे सकते हैं?
समझने की बात यह है कि हरेक व्यक्ति और उसके ग्रंथ की एक प्रकृति होती है। जैसे कोई कहे गांधी ने अपनी आत्मकथा सत्य की खोज में झूठ बोलने का महिमामंडन किया है तो इसे कोई भी स्वीकार नहीं करेगा। यदि कोई कहे कि योगी अरविंद ने अपनी पुस्तक दिव्य जीवन में भौतिक लालसाओं की पूर्ती में ही जीवन गुजारने की राय दी है तो इसे भी कोई स्वीकार नहीं करेगा। ठीक इसी प्रकार मनु स्मृति को भी समझना चाहिए। मनु में वर्णों की रचना और उनके कार्यों का जो विधान है उसमें कहीं भी श्रेष्ठता और हीनता की बात नहीं कही है। ज्ञानवान को श्रेष्ठ मानना तो हरेक समाज की परंपरा रही है और आज भी है। इस नाते कुछ रूढिय़ां भी विकसित हो जाती हैं। उन रूढिय़ों को मान्यता दिलाने के लिए मनु स्मृति में मनमाने ढंग से श्लोक मिलाए गए। मनु स्मृति के अध्येता इस बात को जानते हैं कि वर्तमान में उपलब्ध मनु स्मृति में बड़ी संख्या में प्रक्षेप यानी कि बाद में मिलाए गए श्लोक हैं। नौवीं शताब्दी में मनु स्मति के भाष्यकार कुल्लुक भट्ट ने अपने समय में 170 श्लोकों का प्रक्षेप पकड़ा था। उन्नीसवीं शताब्दी में महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी प्रक्षेपों की चर्चा की है। प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार ने प्रक्षेपों की समीक्षा करते हुए परिश्रम करके मनु स्मृति का भाष्य किया है। वे आधे से अधिक मनु स्मृति को प्रक्षिप्त ही मानते हैं।
साफ है कि मनु स्मृति में शूद्रों को न तो नीच माना गया है और न ही उनके साथ भेदभावपूर्ण विधान दिए गए हैं। जो भेदभावपूर्ण विधान मिलते हैं, उनमें से अधिकांश प्रक्षिप्त हैं और अमान्य हैं। इसलिए मनु स्मृति को शूद्रविरोधी कहना या मानना न केवल अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन करना है, बल्कि यह अपने पूर्वजों का अपमान भी है।

लेखक रवि शंकर सिंह

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