Narendraराजनीति को हमारे देश में प्राचीन काल में राष्ट्रनीति कहा और माना जाता था। राष्ट्र एक अमूर्त्त भावना का नाम है। मैं आपके प्रति सम्मान भाव  रखता हूं, और आप मेरे प्रति रखते हैं-यह जो सम्मान भाव रखने की परंपरा है ना, यह दीखती नही है, पर वास्तव में ये ही वो चीज है जो हम दोनों को, और अपने और भी विराट स्वरूप में समस्त मानव समाज को एक दूसरे के प्रति सहनशील, विनम्र , सद्भावी और सहयोगी बनाती है। इसी भावना के कारण ही राष्ट्र जैसी एक अमूर्त्त भावना प्रधान सामाजिक संस्था का निर्माण हुआ। वास्तव में ‘राष्ट्र’ जैसी अमूर्त्त संस्था का आविष्कार करना भारतीय विद्वानों की विश्व समाज के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। राष्ट्र  एक ऐसी संस्था है, जिसके मुखिया आप भी हैं, और मैं भी हूं। जिसका कार्यालय जितना आपका हृदय है, उतना ही मेरा भी है और जितना मेरा है उतना ही आपका भी है।

इस राष्ट्र की पवित्रता को सबकी आस्था का केन्द्र बनाये रखने के लिए ‘राष्ट्रनीति’ स्थापित की गयी। राष्ट्रनीति का अभिप्राय था समस्त राष्ट्रवासियों को अपने सारे मौलिक कर्त्तव्यों का बोध कराया जाए और सबको इस बात के लिए स्वाभाविक रूप से प्रेरित किया जाए कि वे एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान करने वाले हों। प्राचीन भारत में राज्य के समस्त विधि-विधान और नियम-उपनियम इसी पवित्र उद्देश्य की प्राप्ति हेतु ही विनिर्मित किये जाते रहे। पर कालांतर में धीरे-धीरे राष्ट्रनीति के स्थान पर राजनीति शब्द प्रचलन में आया। वस्तुत: राजनीति राष्ट्रनीति का स्थानापन्न शब्द नही था, इसलिए वह उसके समकक्ष भी नही था। राष्ट्रनीति  शब्द ने अपनी आभा गिराई और लगने लगा कि राजनीति छल-प्रपंचों और घात-प्रतिघातों का खेल खेलने वालों के लिए है, इसमें एक सज्जन का क्या काम? इसलिए सज्जनों पर राज करने के लिए राजनीति को दुर्जनों के हवाले कर दिया गया। अब दुर्जनों का वर्चस्व राजनीति में देखकर जब सज्जन उन्हें कोसते हैं, तो लगता है कि इन लोगों का ऐसा वर्चस्व स्थापित कराने में क्या सज्जन शक्ति का योगदान नही है?

राजनीति में भाई भतीजावाद इसके स्वरूप के विकृतीकरण या राष्ट्रनीति से राजनीति तक की इसकी यात्रा में लगा एक ऐसा गहरा दाग है, जिससे इसके स्वरूप को और भी विकृत किया गया है। भारत में आजादी की पहली सुबह से ही राजनीति में भाई भतीजावाद हावी हो गया था। नेहरू जी के परिवार में उनकी दो बहनें थीं, तो उनका हस्तक्षेप राजनीति में बढ़ा और इसी की नकल अन्य राजनीतिज्ञों ने की। प्रचलन इतना बढ़ा कि सारा देश आज मात्र तीन सौ राजनीतिक घरानों की जागीर बनकर रह गया है। ये वही परिवार ंहैं, जो देश की राजनीति की दिशा तय करते हैं और उस पर अपना दबदबा बनाकर रखते हैं।

पर अब ‘अच्छे दिन’ आ रहे हैं। पी.एम. नरेन्द्र मोदी ने राजनीतिज्ञों की इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने का एक अच्छा निर्णय लिया है। वीर सावरकर की 131वीं जयंती के अवसर पर विगत 28 मई को श्री मोदी ने अपनी सरकार में परिवारवाद और भाई भतीजावाद को रोकने के लिए सभी मंत्रियों को कड़े निर्देश दिये हैं। निर्देशों के अनुसार मंत्रियों को अपने निजी स्टाफ में अपने परिजनों को स्थान न देने की बात कही गयी है।

पी.एम. श्री मोदी का यह निर्णय नितांत सही है क्योंकि भारत में परिवार के लोग ही बड़े बड़े राजनीतिज्ञों के पतन के कारण बने हैं, ये लोग अधिकारियों को हड़काने और जनता के बीच से निकल कर आने वाले लोगों के साथ अभद्र और अशोभनीय व्यवहार कर डालते हैं। जिन्होंने अपने सांसद को सांसद बनाने में मेहनत की होती है, ऐसे परिजनों की ऐसी ही उपेक्षापूर्ण प्रवृत्ति का शिकार कई बार कई पार्टी ऐसे कार्यकर्ताओं या नेताओं को भी होना पड़ता है। ये सभी लोग वक्त के अनुसार उस समय तो चुप लगा जाते हैं, पर सही समय आने पर सही उत्तर भी दे देते हैं। इतना ही नही परिवारवादी नेताओं के परिजन अधिकारियों से अपने मनपसंद लोगों को काम दिलाते हैं, ठेके दिलाते हैं, नौकरी दिलाते हैं और बड़े कामों में बड़े-बड़े मुनाफे कमाते हैं। इस प्रकार राजनीति का व्यापारीकरण और अंधी लूट मचाने का क्रम चल पड़ता है। पिछली यू.पी.ए. सरकार में जितनी भी ‘बड़ी मछलियों’ फंसी उन सबके फंसाने में उनके परिजनों की विशेष भूमिका रही। क्योंकि ‘छोटी मछलियों’ को फंसाने का जाल मंत्री के किसी ना किसी परिजन के पास ही था।

अब मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह मेें अपने ही परिजनों को उसमें आमंत्रित ना करके यह सिद्घ किया कि परिवार वालों के साथ आपके अपने भावनात्मक संबंध हो सकते हैं, लेकिन उन भावनात्मक संबंधों की भी एक सीमा है, और उस सीमा से उनका बाहर आना देश और राष्ट्र के लिए संकट खड़ा करने वाला हो सकता है। मोदी स्वयं गुड़ नही खाते, इसलिए इनकी बात का असर गुड़ ़खाने वालों पर होता है। परिणाम स्वरूप उनकी हिदायतों को सभी मंत्रियों ने सकारात्मकता के साथ लिया है। वरिष्ठ मंत्री श्रीमती  नजमा हेतुल्ला ने पी.एम. के इस निर्णय पर प्रसन्नता व्यक्त की है और कहा है कि ऐसा किया जाना उचित है। श्री मोदी के इस निर्णय को यदि अक्षरश: लागू कर दिया गया तो राजनीति में निश्चित रूप से पारदर्शिता और शुचिता स्थापित होगी। पारदर्शिता और शुुचिता ही वे दो महत्वपूर्ण कारक होते हैं जिनसे राष्ट्र निर्माण होता है और राजनीति राष्ट्रनीति बन जाती है। हमारे नये पी.एम. की राजनीति का आधार राष्ट्रनीति है, इसे स्वागत योग्य ही माना जाएगा।

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