पैगंबर हजरत इब्राहीम द्वारा की गयी कुरबानी की घटना-4

मुजफ्फर हुसैन
गतांक से आगे…….
खुलेआम जानवरों की हत्या सामूहिक रूप से होती है। यह हत्या तकनीक युक्त है, जो अत्यंत दर्दनाक और क्रूरतापूर्ण है। जो हत्या की गयी है, वह व्यापारिक आधार पर लाभ कमाने के लिए की गयी है। इसलाम जैसे महान धर्म के लिए यह चिंता और चिंतन का विषय है। पशुओं की हिंसा आगे चलकर मनुष्य के स्वभाव में आतंक पैदा करती है। यही वह बिंदु है जो दुनिया के सभी प्रकार के हथियारों को जन्म देने वाला है।
यहूदियत और इसलाम में नवजात शिशु के लिए पशु को न्यौछावर करने की अनिवार्य परंपरा है, जिसे अकीका कहा जाता है। बालक 7 दिन 14 दिन अथवा 21 दिन का होता है तब उसका मुंडन किया जाता है और फिर बकरे अथवा भेड़ की कुरबानी की जाती है। यदि इतने अल्प समय में यह संभव न हो तो वह बालक बड़ा हो जाने पर अपने जीवन में किसी भी समय उक्त संस्कार को पूरा करने का प्रयास करता है। वास्तव में देखा जाए तो यह बलि ही दूसरा रूप है। प्राचीन समय में अपने बालक को प्रेत आत्माओं से बचाने और जादू टोने से बच्चे को सुरक्षित रखने के लिए यह क्रिया पूर्ण की जाती थी। विश्व के अनेक समाज और कबीलों में यह आज भी जारी है। ऐसा करना क्या कबीलाशाही को जीवित करना नही है? निर्दोष बालक के जीवन की नींव किसी बिन बोले भोले जानवर की हत्या कर रखी जाए, यह दुनिया का कोई भी समझदार इनसान स्वीकार नही करेगा। ईश्वर ने इनसान को अपनी दुनिया की जितनी चीजें हैं, उनका रखवाला बनाकर भेजा है। यदि रक्षक ही भक्षक बन जाए तो फिर इस खूबसूरत दुनिया को नष्टï होने से कोई नही बचा सकता।
इब्राहीम द्वारा अपने पुत्र इस्माइल की कुरबानी इसलामी जगत में जितनी चर्चित है, वैसी ही एक कुरबानी की कहानी हजरत मोहम्मद पैगंबर साहब के नवासे इमाम हुसैन से भी संबंधित है। मोहम्मद पैगंबर साहब के उत्तराधिकारी के रूप में चार खलीफा हुए। हजरत अली अपने पुत्र इमाम हसन को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। हजरत मुआविया और इमाम हसन के बीच समझौता हुआ और यह तय हो गया कि हजरत मुआविया के पश्चात इमाम हुसैन खिलाफत के अधिकारी बनेंगे। लेकिन इजरत मुआविया के पुत्र यजीद ने इमाम हुसैन के साथ धोखाधड़ी की और उन्हें झूठा पत्र लिखकर इराक के नगर करबला में बुलाया और उनके 72 साथियों के साथ शहीद कर दिया। इनमें 6 माह का उनका पुत्र असगर भी शामिल था और 90 वर्ष के उनके मित्र हबीब इब्ने मजाहिर भी। यजीद ने अपने कुकृत्यों से इसलाम का चेहरा बदल दिया और चाहता था कि समस्त खिलाफत को साम्राज्य के रूप में बदलकर इसलामी मूल्यों को समाप्त कर दे। इमाम हुसैन और उनके साथियों ने इसका विरोध किया। मोहर्रम की सातवीं तारीख से हुसैन के परिवार को पानी बंद कर दिया। दसवीं मोहर्रम को उनके सभी साथियों को करबला की जमीन पर शहीद कर दिया। उनके परिवारजनों को कैद करके सीरिया बुलाया गया। जितने भी कष्टï कोई तानाशाह दे सकता है, वे यजीद ने कर दिखाए। इमाम हुसैन और उनके परिवारजन यजीद से समझौता करके सब कुछ प्राप्त कर सकते थे लेकिन उन्होंने दुनिया के सुखों को ठोकर मार दी, यानी अपनी जान की कुरबानी देकर इसलाम को बचाया।
इस्माइल तो कुरबानी में बच गये, लेकिन हुसैन और उनके साथी नही बच सके। इसलिए कुसैन की कुरबानी का महत्व भी कम नही होता। क्योंकि हुसैन ने धर्म और इनसानियत के खातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। हुसैन की कुरबानी ने भी धर्म, न्याय और मानवता के इतिहास में ऐसा काम किया कि उक्त घटना विश्व इतिहास में मील का पत्थर बन गयी। कुरबानी नाम है त्याग का और उन समस्त कष्टों के सहन करने का, जिसके कारण उक्त सिद्घांत प्रतिपादित हुआ। इसलिए इसलामी जगत के लिए यह भी अनिवार्य है कि इस्माइल की कुरबानी के समय करबला में हुसैन ने जो कुरबानी दी उसे भी प्रस्तुत किया जाए। इब्राहीम ने तो अपनी कुरबानी में कुछ भी नही खोया, लेकिन हुसैन ने तो सबकुछ खो दिया। यदि इब्राहीम ने ईश्वर के आदेश से इस्माइल को न्यौछाबर करने की पेशकश की तो हुसैन ने भी जो कुछ किया उसमें ईश्वर की स्वीकृति थी। दो कुरबानियों की तुलना करते समय हुसैन की कुरबानी भी दुनिया के लिए शिक्षाप्रद है। इब्राहीम की कुरबानी में तो भेड़ की जान गयी, लेकिन यहां तो 72 बेगुनाह इनसान मौत की नींद सुला दिये गये।
क्रमश:

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