हमारे कवियों ने मां भारती के प्रति हर देशवासी को जागरूक बनाये रखने हेतु समय-समय पर देशभक्ति और जन्मभूमि के प्रति समर्पण का भाव भरने हेतु प्रशंसनीय कार्य किया है। उनके कार्यों की वंदना यह लेखनी यूं कर सकती है :-
धन्य उनकी लेखनी और धन्य उनके कार्य,
हमको सदा बताते रहे तुम हो श्रेष्ठ हे! आर्य।
जन्मभूमि के प्रति भाव भरते रहे वे उच्चतम,
रहे देशभक्ति को जगाते और जगाते शौर्य।।
भारत में इस क्षेत्र में अनेकों कवियों ने वंदनीय कार्य किया है। यहां हम सर्वप्रथम मैथिलीशण गुप्त की इन भावपूर्ण पंक्तियों को रखते हैं-
जिसकी रज में लोट लोट कर खड़े हुए हैं।
घुटनों के बल सरक सरक कर खड़े हुए हैं।।
परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये।images (7)
जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाए।।
हम खेले कूदे हर्षयुक्त जिसकी प्यारी गोद में,
हे! मातृभूमि तुमको निरख मग्न क्यों न हों मोद में।
मैथिलीशरण जी कह रहे हैं कि हम जिस पावन जन्मभूमि की मिट्टी में लोट लोट कर खड़े हुए हैं, और घुटनों के बल खड़े हुए हैं, जहां बालकपन में हमने परमहंस की भांति सब सुखों का भोग लिया है, जिसके कारण हम धूल भरे हीरे कहलाए उस मातृभूमि को देखकर हम आनंद विभोर क्यों न हों?
व्यक्ति बड़ा हो जाता है, बड़े बड़े पदों को सुशोभित करने लगता है। लोग मान्यवर, श्रीमान, सर, साहब के आदर सूचक संबोधन देने लगते हैं। कभी-कभी इन विशेषणों को व्यक्ति स्वयं भी अपने लिए बोझ समझने लगता है। व्यक्ति को अपने दीर्घ स्वरूप में अपने बचपन का लघु स्वरूप स्मरण हो आता है। तब उसे अपने बचपन का बिगड़ा हुआ नाम (जैसे रमेश का रामू, राजकुमार का राजू इत्यादि) अनायास ही स्मरण हो आता है, और स्मृति-पटल पर जन्मभूमि की सौंधी-सौंधी सुगंध छा जाती है। तब दूर देश में बैठे व्यक्ति को अपनी जन्मभूमि की स्मृतियों को लेकर कैसी व्यग्रता घेरती है? इसे केवल वही जानता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस पर बड़ा सुंदर लिखा है-
तुलसी कबहुं न जाइए जन्मभूमि के ठांव।
जाने पहचाने नही लेत पुरानों नांव।।
तुलसीदास जी मानो यहां जन्मभूमि के साथ ठिठोली कर रहे हैं और उसके दर्शनों के प्यासे व्यक्ति की व्यग्रता को और बढ़ा रहे हैं। कह रहे हैं कि जन्मभूमि आपको आपके विशेषणों से नही बुलाएगी। वह आपका पुराना नाम जानती है, इसलिए उसी से बुलाएगी और आप होंगे कि आनंद से भर जाएंगे। इसीलिए मैथिलीशरण गुप्त जी लिखते हैं:-
स्वर्ग से भी श्रेष्ठ जननी जन्मभूमि कही गयी।
सेवनीया है सभी को वह महा महिमामयी।।
हंस, जिसे कि मानसरोवर की यात्रा करनी है, गंगा तट पर बैठकर भी व्याकुल और अशांत है। वह मानसरोवर जाकर ही शांति का अनुभव करेगा, इसलिए उसकी साधना मानसरोवर जाने के लिए निरंतर जारी है। ऐसे ही एक देशभक्त सिपाही जन्मभूमि से देशभक्ति की भावना से भरपूर होकर सीमा पर पहरा दे रहा होता है, परंतु उसका मन रूपी हंस जन्मभूमि के दर्शनों को ही मानसरोवर की यात्रा मानता है, अर्थात वह जन्मभूमि के लिए तरसता रहता है। कवि रामचरित उपाध्याय क्या कहते हैं :-
हंस गंगाकूल भी अनुकूल तेरे है नही,
मानकर पहुंचे बिना तू मान सकता है नही।
धन्य है अनुशक्ति तेरी धन्य तेरी शक्ति है,
धन्य तेरी जन्म धरती धन्य तेरी भक्ति है।
विश्व को आध्यात्मिक आनंदानुभूति केवल और केवल भारतभूमि ने ही करायी है। सारा विश्व इसीलिए कृतज्ञ भाव से इस भारतभूमि का कीर्तिगान करता है। जब भावना ऐसी हो तो पुराण भी भला इस पवित्र भारतभूमि की वंदना करने से पीछे क्यों रहने लगे हैं? इसलिए विष्णु पुराण में आता है :-
अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महामुने।
यतो हि कर्म भूरेवां हयतोअन्याभोग भूमय:।।
हे महामुनि! जम्बूद्वीप में भारतवर्ष श्रेष्ठ है, क्योंकि यह कर्मभूमि है और शेष सब भोग भूमि हैं। यहां कर्मभूमि का अर्थ भारत की अध्यात्म शक्ति से है, जिसके बल पर भारत ने जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझा और जीवन को उन्नत बनाने का अनुसंधान किया। जबकि शेष विश्व जीवन को उन्नति बनाने का अनुसंधान नही कर पाया।
उसी उन्नतावस्था को पुन: अपनाने के लिए मैथिलीशरण गुप्त लिखते हैं :-
इस देश को दीनबंधों! आप फिर अपनाइए।
भगवान भारतवर्ष को फिर पुण्य भूमि बनाइए।
जयपाणि जो वर्द्घक हुआ है एशिया के हर्ष का।
है शिष्य वह जापान भी इस वृद्घ भारत वर्ष का।।
गुप्त जी पुण्यभूमि भारतवर्ष को ही विश्व के कल्याण की एकमात्र रक्षिका मानते हैं और लिखते हैं-भारत जब तक जग में होगा, भारतीयता तब तक होगी।
भारतीयता होगी जब तक, जग होगा तब तक नीरोगी।।
प्राचीनकाल में आयर्वुद ने ही विश्व को नीरोगी रखा था। एलोपैथिक चिकित्सा प्रणाली व्यक्ति को नीरोग बनाने में असफल सिद्घ हो चुकी है। क्योंकि एलोपैथी रोग को समाप्त नही करती है, अपितु रोग से लड़ती है और हम देखते हैं कि एक दिन रोग जीत जाता है और एलोपैथी हार जाती है।
जिन लोगों ने भारत की प्राचीन उत्कृष्ट सांस्कृतिक मान्यताओं अथवा चिकित्सा प्रणाली इत्यादि को अपनाकर आधुनिकता के नाम पर बेच डाला है, और अपनी संस्कृति को किसी भी कारण से हेय मानते हैं, मानो उन्हें लताड़ते हुए आचार्य सोहनलाल द्विवेदी कह रहे हैं:-
प्राणों पर इतनी ममता, और स्वतंत्रता का सौदा?
बिना तेल के द्वीप जलाने, का है कठिन कसौदा।
इस भारत भूमि की जब वंदना की बात आ रही हो तो इकबाल की जगप्रसिद्घ इस कविता को भी नही भूला जा सकता है, जिसमें उन्होंने मातृभूमि को विश्व में सर्वप्रथम वंदनीया माना है : –सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा। हम बुलबुलें हैं इसकी वह गुलसितां हमारा।।
इस मातृभूमि में होने वाले या उठने वाले नित्यप्रति के विवादों को अथवा क्षेत्रवाद, भाषावाद आदि के वितण्डाबाद को सदा-सदा के लिए समाप्त करने की औषधि प्रदान करते हुए हमारे लिए सुमित्रानंदन पंत लिखते हैं:-
बहुप्रांतों की वाणी का जनमानस हो रस संगम।
सांस्कृतिक दैन्य की खाई फिर परे युगों की दुर्गम।।
उत्तर दक्षिण छोरों पर नव सेतु बंध हो निर्मित।।
इस जन विशाल भू में हो राष्टरीय एकता प्रतिष्ठित।।
अपने राष्टरीय भावों से अछूती और भारतीय संस्कृति के प्रति सर्वथा अनुदार अंग्रेजी के प्रति जिस प्रकार का ‘मोहभाव’ देश में बढ़ता जा रहा है, मानो उसी पर कुठाराघात करते हुए मैथिलीशरण गुप्त की लेखनी हमें सचेत कर रही है :-
अरे अड़ो मत अलग बोलियों को ले लेकर।
पार करेगी नाव राष्टरभाषा ही खेकर।।
यदि अनुदार विचार धार में बह जाओगे।
कहकर सुनकर भी मूक बधिर ही रह जाओगे।
कवि का अभिप्राय है कि अपनी संस्कृति से जन्मी देशी भाषाओं को लेकर विवादों में मत उलझो अन्यथा अनुदार विचारधारा (अंग्रेजी) बहा ले जाएगी। अपनी भाषाओं को लेकर हम अनुदार विचारधारा के सृजक ना बनें। हमारी संस्कृति ने भारत की महान संस्कृति का निर्माण किया है जिस उत्तरदायित्व को आज पूर्ण निष्ठा के साथ हिंदी निर्वाह कर रही है। अपनी संस्कृत से जन्मी महान संस्कृति का उत्तम चित्रण मैथिलीशरण गुप्त की लेखनी ने यूं खींचा है :-
शैशव दशा देश प्राय: जिस समय सब व्याप्त थे।
नि:शेष विषयों में तभी हम प्रौढ़ता को प्राप्त थे।। 
संसार को पहले हमीं ने ज्ञान शिक्षा दान की।
आचार की, व्यापार की, व्यवहार की, विज्ञान की।।
आगे कह सकते हैं:-
हम दूसरों के दुख को थे दुख अपना मानते।
हम मानते कैसे नही जब थे सदा यह जानते।
जो ईश कर्ता है हमारा दूसरों का है वही,
है कर्म भिन्न परंतु सबमें तत्व समता हो रही।।
आज सारा विश्व अशांत है और शांति को कब्रों पर मोमबत्ती जला जलाकर खोज रहा है। पर शांति उससे आंख मिचौली कर रही है। कारण केवल एक ही है कि शांति की खोज का ढंग विपरीत दिशा में काम कर रहा है। काम अशांति के और खोज शांति की हो रही है। भारत की प्राचीन संस्कृति जो इस पावन भूमि पर वास्तविक शांति स्थापित कराने में सहायक बनी थी उसी की पुन: स्थापना पर बल देते हुए तथा वर्तमान विश्व सभ्यता को धिक्कारते हुए मां भारती की वंदना में रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा :-
घूम रही सभ्यता दानवी शांति! शांति करती भूतल में।
पूछे कोई भिगो रही वह क्यों अपने विषदंत गरल में।।
सचमुच ‘मां भारती’ विश्ववंद्या है। इस पवित्र भूमि पर कितने ही महापुरूष आए और चले गये। उनके चरण कमल की पावन रज आज भी इस पवित्र भूमि के लिए गर्व और गौरव का विषय है। उन महापुरूषों के उत्कृष्ट जीवन चरितों को देखकर अच्छा अच्छा विवेकशील व्यक्ति भी विस्मय से भर उठेगा कि पहले उन्हें नमन किया जाए या इस पवित्र भूमि को या इन दोनों के रचयिता प्यारे प्रभु को? यहां गुरू और गोविंद का द्वैतवाद नही खड़ा है, अपितु ऋषि परंपरा, मातृभूमि और साक्षात ब्रहम का त्रैतवाद खड़ा है। त्रिवेणी बह रही है। अदभुत है मेरी पावन मातृभूमि। मैथिलीशरण गुप्त जी की इन पंक्तियों के साथ लेख का समापन करता हूं:-
युग युग के संचित संस्कार, ऋषि मुनियों के उच्च विचार।
धीरों वीरों के व्यवहार, निज संस्कृति के श्रंगार।।

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