अधिनायकवादी सोनिया गांधी परिवार संकट में

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आज देश का सबसे पुराना राष्ट्रीय राजनैतिक दल कांग्रेस एक परिवार की भक्ति के दुष्परिणाम से आहत हो रहा हैं। लेकिन भूल सुधार करते हुए पिछ्ले दिनों कुछ प्रथम पंक्ति के कांग्रेस के नेताओं के साथ ही कुछ अन्य वरिष्ठ कांग्रेस जनों ने एक पत्र लिख कर कांग्रेस हाई कमान को सच्चाई का सामना करने के लिये झकझोर दिया है। लगभग सभी समाचार पत्रों में वरिष्ठ पत्रकारों के बडे-बडे लेख आने से अधिनायकवादी सोनिया परिवार संकट में आ गया हैं। इस वर्ण संकर परिवार का वर्षो पुराना अहंकार सम्भवत: अब टूटने जा रहा हैं।

भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व.श्री पी वी नरसिंह राव (1991-96) व कांग्रेस के भूतपूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष (1996-98 ) स्व.श्री सीता राम केसरी का जिस तरह सोनिया मण्डली ने अपमान किया था वह भुलाया जाना भी अब कांग्रेस के इन वरिष्ठ नेताओं को भली प्रकार समझ में आ रहा होगा। लोकतांन्त्रिक मूल्यों पर आधारित राजनीति करने वाले नेताओं व विरासत में मिली नेतागिरी में अंतर समझना हो तो सोनिया गांधी के परिवार के माँ सहित बेटे-बेटी की अधिनायकवादी मनोवृत्ति को जानो। नेहरु-गांधी परिवार के सदस्य होने के नाते पार्टी का पदाधिकारी बनना सरल है परन्तु नेता बनने के गुण भी तो होने चाहिये। व्यवहारिकता व संवेदनशीलता के अभाव में नेता बनना कैसे सम्भव हो सकता है। कभी ‘दो बैलों जी जोड़ी’ तो कभी ‘गाय-बछड़े’ के चुनाव चिन्ह से भारतीय संस्कृति का मान-सम्मान बनाये रखने वाली कांग्रेस आज एक इटालियन एंटोनिया माईनो की घृणित व दूषित सोच ने कांग्रेस के अस्तित्व को भी संकट में डाल दिया हैं। देश के मूलभूत स्वरुप व संस्कृति को नष्ट करके बहुसंख्यकों को बन्धक बनाने के सभी षडयंत्र रचने वाली सोनिया को अब स्वयं अपने पापों का प्रायश्चित करना होगा।

इस परिवार के सक्रिय तीनों सदस्यों के बचकाने,अपरिपक्व व अधिनायकवादी कार्यों ने कांग्रेस के स्वरुप को भी घायल कर रखा हैं। मूलतः नेहरु-गांधी की विरासत से देश की मुख्य पार्टी ‘कांग्रेस’ में सोनिया के बाद राहुल वर्षो से राजनीति में अपने को स्थापित करने में लगे हुए है। परंतु ये दस वर्षों के (2004–2014) के संप्रग सरकार के कार्यकाल में कांग्रेस की मुखिया अपनी माता श्रीमती सोनिया के अथक प्रयासों के उपरान्त भी सफल नहीं हो पाये। हमें इस काल में प्रधानमंत्री रहे डा मनमोहन सिंह के मौन सिंह व रोबोट सिंह जैसे रूपों का भी स्मरण रखना होगा। 2014 में सत्ता से हटने के बाद आज भी सोनिया का अपने पुत्र मोह में मन्द बुद्धि राहुल को येन केन प्रकारेण स्थापित करने के लिये वरिष्ठ पार्टी जनों के प्रति कठोर बने रहना आत्मघाती कदम होगा। क्या दलितों – निर्धनों आदि के यहां नई नई नौटकी करना, कभी जनेऊधारी का सांग रचना व कांग्रेस के कुछ स्वार्थी नेताओं के चक्रव्यूह में फंसा रहना ही एक नेता की योग्यता है। वैभवशाली जीवन जीने वाले इस परिवार को निर्धनता व अभाव भरा सामान्य भारतीय जीवन क्या होता है, का क्या किंचित मात्र भी ज्ञान है ?

दुर्भाग्य यह भी है कि देश का कभी सबसे बडा व प्रमुख रहने वाला यह राजनैतिक दल परिवारवाद की चाटुकारिता से बाहर निकलने का वर्षों से कोई साहस ही नहीं कर पा रहा था। ऐसे में कुछ वरिष्ठ कांग्रेसियों को जब अपने-अपने भविष्य की चिंता सताने लगी तो हाई कमान को पत्र लिख कर अपना रोष व्यक्त करना आवश्यक हो गया था। आज जब मोदी सरकार अपनी कार्य कुशलता से विश्व पटल पर एक अहम भूमिका निभाते हुए कोरोना महामारी के साथ-साथ सीमाओं पर भी अति उत्साहित होकर सक्रिय है तो ऐसे में विपक्ष को भी राजनैतिक कौशल्य का परिचय देते हुए मोदी सरकार के मनोबल को बढ़ाना चाहिए। परंतु न जाने किस मनोवृत्ति के कारण मोदी सरकार के आरम्भ से ही कांग्रेस आदि सभी विपक्षी दलों को केवल अनावश्यक विरोध की आत्मघाती राजनीति ही क्यों रास आ रही है?

इसके लिये यह समझना बहुत आवश्यक हैं कि इस सबके पीछे यह परिवार अपनी हिन्दू विरोधी प्रवृत्ति और भारतीय धर्म व संस्कृति के विरुद्ध सक्रियता को बनाये रख कर मोदी जी के नेतृत्व में गठित राष्ट्रवादी सरकार को घेरने के सारे हथकण्डे अपना रहा हैं। इसके अतिरिक्त एक प्रमुख बात यह भी है कि जो परिवार जीवन भर सत्ता का सुख भोगता रहा वह आज सत्ता से बाहर होने की खीझ से अत्यंत विचलित है। विपक्ष में बैठ कर जनादेश का सम्मान करने में सोनिया परिवार का अहंकार बाधक क्यों हैं? अपनी पार्टी के शासन काल में प्रायः निष्क्रिय रहने वाले राहुल गांधी आज प्रमुखता से नकारात्मक राजनीति का मोहरा बन चुके है।

ऐसी स्थिति में प्रथम पंक्ति के कुछ कांग्रेसियों ने अधिनायकवादी सोनिया परिवार के समक्ष बडा संकट खड़ा कर दिया है। ऐसे दुखी नेताओं ने अधिनायकवादी मनोवृत्ति के विरुद्ध पत्र लिख कर अपने मन की बात को रखने का सराहनीय कार्य किया हैं। इस प्रकार इन वरिष्ठ कांग्रेसियों ने वर्षो बाद सोनिया परिवार के आभाचक्र के विरुद्ध अपनी राष्ट्रीय राजनीति में सकारात्मक भूमिका निभाने के भी संकेत दिये हैं।

विनोद कुमार सर्वोदय
(राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक)
ग़ाज़ियाबाद

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