भारतीय क्षत्रिय धर्म और अहिंसा (है बलिदान इतिहास हमारा), अध्याय-12 (ग) राम भक्त देवीदीन पांडे और रानी जय राजकुमारी की वीरता और बलिदान की गाथा

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राजा मेहताब सिंह के नेतृत्व में जिस सेना ने राम मन्दिर की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया था उसके बारे में इतिहासकार कनिंघम ने कहा है कि :-” जन्मभूमि का मन्दिर गिराए जाने के समय हिन्दुओं ने अपनी जान की बाजी लगा दी थी और 173000 हिन्दुओं के शव गिरने के पश्चात ही मीर बांकी खान मन्दिर को तोप से गिराने में सफल हो सका था।”
राजा मेहताब सिंह की सेना में उस समय एक हिन्दु वीर योद्धा देवीदीन पाण्डे भी था । जिसके भीतर हिन्दुत्व का रक्त दौड़ रहा था । जब उसने देखा कि विदेशी आक्रमणकारी बाबर हमारे आस्था के प्रतीक राम मन्दिर को तोड़ने में सफल हो गया है तो उस महान देशभक्त युवा ने अपने जैसे ही क्रान्तिकारी युवाओं की 70 हजार की सेना तैयार की । यह सारे राम भक्त उस समय बिना वेतन और बिना किसी प्रकार के पुरस्कार की अपेक्षा के राम मन्दिर की रक्षा और माँ भारती की स्वतन्त्रता के लिए विदेशी आक्रमणकारी से जा भिड़े थे। ये सारे के सारे योद्धा राष्ट्र यज्ञ की समिधा बन गए थे । देवीदीन पाण्डे की वीरता और साहस की प्रशंसा स्वयं बाबर ने भी की थी।

प्रताप नारायण मिश्र ने देवीदीन पाण्डे और उनके साथियों के लिए श्रद्धांजलि देते हुए लिखा है :- “वाह रे मेरे शेर (देवीदीन पांडे ) फूटे हुए सिर को पगड़ी से बांधकर बाघ के समान सामने खड़े मीर बांकी खान पर झपट पड़ा । आक्रमणकारी अंगरक्षक का तो उन्होंने पहले ही सिर धड़ से अलग कर दिया था । मीर बाकी खान हक्का-बक्का सा आंखें फाड़े इस अद्वितीय महामानव के पैंतरे को देखता रह गया। उसकी जान को लाले पड़ गए । जान बचाना दूभर हो गया तो यह आभास होते ही वह घबराकर हाथी के हौदे में जा छिपा । उसकी घिग्गी बंध गई । बुझते हुए दीप की अंतिम लौ थी , यह पांडे समझ गया था । मीर बांकी खान का अन्त होना सन्निकट था , पर उसका भाग्य प्रबल था । उसके हाथ में भरी हुई बन्दूक थी 3 बार की धाँय – धाँय – धाँय की आवाज में गोली पाण्डे के वक्षस्थल को चीर गई । पाण्डे की तलवार का प्रहार चूक चुका था । चूकने के कारण वह महावत और हाथी पर जा पड़ा । दोनों ढेर हो गए । पलक झपकते ही यह सब हो गया । मीर बाकी खान गम्भीर रूप से घायल पड़ा था । किसी प्रकार कुछ बचे खुचे सिपाही उसे वापस जीवित ले जा सके । एक और ‘अभिमन्यु’ कर्तव्य की वेदी पर बलि हो गया। मुस्लिम सेना की अपार क्षति हुई थी। जिससे वह चार-पांच माह तक जन्म भूमि की ओर आने का साहस नहीं कर पाई थी।”

रानी जय राजकुमारी का बलिदान

जिस समय राम मन्दिर गिराने से हिन्दू समाज आन्दोलित था , उसी समय की एक और रोमांचकारी घटना है । हंसवर की रानी जय राजकुमारी और राजा रणविजय सिंह ने स्वामी महेश्वरानन्द जैसे महान सन्यासी के मार्गदर्शन में अपनी 25000 की सेना के साथ बाबर की सेना के साथ घोर संग्राम किया था । इसके बारे में प्रताप नारायण मिश्र ही हमें बताते हैं कि :- ” मीर बकी अभी मेहताब सिंह व दीन दयाल पांडे की भयंकर मार से सम्भल भी नहीं पाया था कि इस अप्रत्याशित मार से उसकी नस-नस ढीली पड़ गई। बकी की बची खुची सेना रणविजय सिंह की सेना के सामने टिक नहीं सकी । उसके पैर उखड़ गए। जनश्रुति है कि मीर बकी खान युद्ध पटल से न जाने कैसे अदृश्य हो गया ? कदाचित वह जानबूझकर रणनीति के अनुसार भयग्रस्त होकर या कुमुक की प्रतीक्षा में गायब हुआ।”
इसी युद्ध में रानी जय राजकुमारी का बलिदान हो गया था । स्वामी महेश्वरानन्द भी रानी के साथ लड़ते – लड़ते अपने साथियों सहित मारे गए थे। माँ भारती की स्वतन्त्रता के लिए लड़े जा रहे युद्ध में इन सभी हुतात्मा महान योद्धाओं का नाम भी ससम्मान सम्मिलित किया जाना अपेक्षित है।
अपने ऐसे महान योद्धाओं और बलिदानियों के बलिदान पर गर्व करते हुए राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त अपनी कविता ‘उद्बोधन’ में लिखते हैं :-

” हम हिन्दुओं के सामने आदर्श जैसे प्राप्त हैं ।
संसार में किस जाति को किस ठौर वैसे प्राप्त हैं ? भव सिन्धु में निज पूर्वजों की रीति से ही हम तरें ।
यदि हो सके वैसे न हम तो अनुकरण तो भी करें ।। क्या कार्य दुष्कर है भला यदि इष्ट हो हमको कहीं । उस सृष्टिकर्ता ईश का ईशत्व क्या हम में नहीं ?
यदि हम किसी भी कार्य को करते हुए असमर्थ हैं ,
तो उस अखिलकर्त्ता पिता के पुत्र ही हम व्यर्थ हैं ।।”

कान्हा देव का अपूर्व शौर्य

महाराणा संग्राम सिंह ने 1520 ई0 में ईडर राज्य पर आक्रमण किया था । उस समय वहाँ का हाकिम मलिक हुसैन था । जो निजाम उल मुल्क कहलाता था। महाराणा संग्राम सिंह के भय से कांपकर मलिक हुसैन अहमदनगर के दुर्ग में जा छुपा था। राणा संग्राम सिंह उस विदेशी राक्षस को ढूंढते – ढूंढते अहमदनगर के किले तक जा पहुंचे। उनकी सेना में कान्हा चौहान नाम का वीर योद्धा भी था। जिसके पिता , भाई व चाचा भी उपरोक्त निजाम उल मुल्क के विरुद्ध राणा संग्राम सिंह की ओर से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हो चुके थे।
निजाम उल मुल्क ने अपनी प्राण रक्षा के लिए किले के लोहे के किवाड़ों को और उनकी सलाखों को गर्म कर दिया था । जिससे हाथी भी उन किवाड़ों में टक्कर न मारकर उनसे बचकर भागने लगे। तब यह प्रश्न खड़ा हुआ कि इन किवाड़ों को कैसे तोड़ा जाए ? तभी हिन्दू वीर योद्धा कान्हा देव ने अपने आपको नुकीले भालों के सामने खड़ा कर दिया और महावत से कहा कि हाथी को मेरे शरीर पर टक्कर मारने के लिए संकेत करे ।हाथी ने अपने महावत के संकेत पर जब कान्हा के शरीर में जाकर टक्कर मारी वह वीर योद्धा तो संसार से विदा हो गया परंतु अपने अद्भुत साहस से किले के किवाड़ों को खोलकर एक अद्भुत इतिहास भी रच गया।
हमारे योद्धाओं के इस प्रकार के अनेकों उदाहरण हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि जब बाबर भारतवर्ष में मुगल साम्राज्य की नींव रख रहा था तो उसकी नींव की पहली ईंट को ही उखाड़ फेंकने के लिए हमारे योद्धाओं ने कितने बड़े-बड़े बलिदान दिए थे ? उससे पहले और उसके बाद के इतिहास पर यदि हम देखते हैं तो सर्वत्र शौर्य ही शौर्य बिखरा हुआ दिखाई देता है। अपने पूर्वजों के इस शौर्य के कारण ही हम अपना अस्तित्व बचाने में सफल हुए इसलिए इस गौरवपूर्ण इतिहास पर हमें गर्व होना ही चाहिए। यदि अहिंसा की इस परिभाषा को हमारे पूर्वज उस समय अपना चुके होते कि यदि कोई व्यक्ति आपके एक गाल पर चांटा मारे तो दूसरा गाल भी उसके सामने कर दो तो निश्चित रूप से इतिहास हमारे सर्वनाश की कहानी कबका लिख चुका होता ।
(सभी चित्र प्रतीकात्मक हैं )

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

( लेखक भारतीय इतिहास पुनरलेखन समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं )

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