पंडित शिवपूजन सिंह कुशवाहा के 50 ग्रंथों का तीन खंडों में प्रकाशन

ओ३म्
-जिज्ञासु स्वाध्यायशील पाठकों के लिये हर्षप्रद समाचार-

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पं. शिवपूजनसिंह कुशवाह जी आर्यसमाज के उच्च कोटि के वैदिक विद्वानों में अग्रणीय विद्वान थे। आपने शास्त्रों का अध्ययन कर उच्च कोटि की विद्वता प्राप्त कर आर्यसमाज के वैदिक सिद्धान्तों वा विचारधारा का लेखनी के द्वारा समर्पण भाव से प्रचार किया। आचार्य कुशवाह जी ने लगभग 50 ग्रन्थों का प्रणयन किया जो कई दशकों तक पृथक पृथक पुस्तक रूप में प्रकाशित होते रहे। वर्तमान में आचार्य जी के ग्रन्थ सुलभ नहीं होते। ऐसी स्थिति में कुशवाह जी के सभी ग्रन्थों को पुरानी व नई पीढ़ी के लाभार्थ प्रकाशित करने की महती आवश्यकता अनुभव की जा रही थी। इस अभाव की पूर्ति करने का शुभ संकल्प आर्यजगत के सुप्रसिद्ध यशस्वी प्रकाशक श्री प्रभाकरदेव आर्य जी ने अपने प्रकाशन संस्थान ‘‘हितकारी प्रकाशन समिति, हिण्डोन सिटी” की ओर से लिया है। वह पं. शिवपूजनसिह कुशवाह जी के सभी ग्रन्थों वा लिखित सामग्री को तीन वृहद खण्डों में प्रकाशित कर रहे हैं। इस कार्य में ग्रन्थों के सम्पादक के रूप में उनके सहयोगी आर्यजगत के यशस्वी एवं सुप्रसिद्ध विद्वान डा. ज्वलन्तकुमार शास्त्री, अमेठी सहयोग कर रहे हैं। यह आर्यसमाज के लिए सौभाग्य का समाचार व घटना है। यदि यह कार्य न होता, तो हमें लगता है कि वर्तमान व भावी पीढ़ियां इस वैदिक ज्ञान राशि से वंचित ही रह जाती। इस महद् कार्य के लिये हम बन्धुवर श्री प्रभाकरदेव आर्य एवं आर्य विद्वान डा. ज्वलन्तकुमार शास्त्री जी का आभार व्यक्त करने सहित उनको हार्दिक धन्यवाद देते हैं। उनके इस सत्कार्य के लिये आर्यजगत एवं सभी स्वाध्यायशील पाठक उनके ऋणी रहेंगे।

यह भी हर्ष प्रदान करने वाला समाचार है कि पं. शिवपूजनसिंह कुशवाह-ग्रन्थावली का प्रथम खण्ड आगामी महीने अगस्त, 2020 में पाठकों को उपलब्ध करा दिया जायेगा। शेष दो खण्ड इसके बाद प्रकाशित किये जायेंगे। प्रथम खण्ड में आचार्य शिवपूजनसिंह कुशवाह जी की 16 पुस्तकों को समाहित किया गया हैं। इन पुस्तकों के नाम निम्न तालिका के अनुसार हैं:-

1- महर्षि दयानन्दजी कृत वेदभाष्यानुशीलन
2- महर्षि दयानन्दजी की दृष्टि में ‘‘यज्ञ”।
3- सामवेद का स्वरूप
4- अथर्ववेद की प्राचीनता
5- ऋग्वेद के दशम् मण्डल पर पाश्चात्य विद्वानों का कुठाराघात
6- वामनावतार की कल्पना
7- वैदिक एज (टमकपब ।हम) पर एक समीक्षात्मक दृष्टि
8- भारतीय साहित्य और संस्कृति एक मूल्यांकन
9- वैदिक शासन पद्धति
10- उपनिषदों की उत्कृष्टता,
11- भारतीय इतिहास और वेद
12- ‘आर्यसमाज में मूर्तिपूजा’ ध्वान्त निवारण,
13- बाइबल में वर्णित बर्बरता तथा अश्लीलता का दिग्दर्शन
14- पाश्चात्यों की दृष्टि में इस्लामी मत प्रवर्तक
15- आर्यों का आदि जन्म स्थान निर्णय
16- नीर झीर विवेक।

हमने ग्रन्थावली के प्रकाशक महोदय श्री प्रभाकरदेव आर्य जी से फोन पर बात की है। उनसे हमें इस ग्रन्थावली के प्रकाशन विषयक निम्न जानकारी भी प्राप्त हुई है।

कीर्तिशेष प्रसिद्ध वैदिक विद्वान डा॰ शिवपूजन सिंह कुशवाह ने अपने अथाह ज्ञान-भण्डार से पचास से अधिक छोटी-बड़ी पुस्तकें लिखीं। हितकारी प्रकाशन समिति, हिण्डोन सिटी द्वारा इन सभी ग्रन्थों का तीन खण्डों में प्रकाशन किया जा रहा है। यह ऐतिहासिक ग्रन्थमाला सैद्धान्तिक दृष्टि से परिपक्व तथा अध्ययन में रुचि रखनेवाले जिज्ञासु पाठकों के लिये बहुत उपयोगी हैं।

हितकारी प्रकाशन समिति इन सभी 50 ग्रन्थों को तीन खण्डों में लगभग 1800-1900 पृष्ठों में प्रकाशित कर रही है। प्रथम खण्ड अगस्त 2020 में ग्राहकों को प्रेषित कर दिया जायेगा। शेष दो खण्ड इसके बाद प्रकाशित होने पर एक वर्ष के अन्दर भिजवा दिये जायेंगे। ग्रन्थ के तीन खण्डों को उत्तम कोटि के कागज पर प्रकाशित कर इन्हें रैक्जिन की मजबूत जिल्द तथा बहुरंगी जैकेट में आकर्षक रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है जिसे देखकर पाठक प्रफुल्लित हो उठेंगे।

दिनांक 15 अगस्त, 2020 तक जो व्यक्ति, संस्था व पुस्तक विक्रेता ग्रन्थमाला के प्रति सैट की दर से एक हजार रुपये भिजवा देगें उन्हे तीनों भाग एवं उपहार में 380 पृष्ठवाली ‘‘दयानन्द दिग्विजय महाकाव्य का समालोचनात्मक अध्ययन” पुस्तक भी भिजवाई जायेगी। पुस्तक प्रेषण का व्यय प्रकाशक द्वारा वहन किया जायेगा।

दिनांक 15 अगस्त, 2020 के पश्चात् किसी भी व्यक्ति, संस्था अथवा पुस्तक विक्रेता को यह लाभ प्राप्त नहीं होगा।

इस ग्रन्थमाला का कुशल सम्पादन आर्यसमाज के शीर्षस्थ वैदिक विद्वान् डा॰ ज्वलन्त जी शास्त्री, अमेठी कर रहे हैं। पुस्तक बहुत कम संख्या में प्रकाशित की जा रही है। अतः शीघ्रता कर प्रतियां सुरक्षित करवायें जिससे बाद में निराशा न हो।

पुस्तक का अग्रिम मूल्य 1000/- प्रति सैट भेजने के लिये प्रकाशक के बैक खाते का विवरण।

बैंक खाते का नाम: हितकारी प्रकाशन समिति
बैंक का नाम – HDFC हिण्डोन सिटी
खाता संख्या संख्या – 50200027920292
IFS कोड– HDFC0002589

हमने ग्रन्थमाला के प्रकाशन की जानकारी मिलने पर तुरन्त ही पुस्तक मंगाने का निर्णय कर प्रकाशक महोदय को सूचित कर दिया था तथा धनराशि भेज भी दी है। पाठकगण पुस्तक के अग्रिम मूल्य की धनराशि भेजने के बाद श्री प्रभाकरदेव आर्य, हिण्डोन सिटी को उनके मोबाइल न. 7014248035 / 9414034072 पर अवगत करायें और उन्हें अपना डाक का पता नोट करा दें।

हमें अपने जीवन में इस महत्कार्य के सम्पन्न होने की आवश्यकता तो अनुभव होती थी परन्तु इसकी उम्मीद नहीं थी। ईश्वर की कृपा से यह हो रहा है, इसकी हमें प्रसन्नता है। हम ईश्वर सहित इस ग्रन्थ के प्रकाशक एवं सम्पादक महोदय को नमन करते हुए उनका धन्यवाद करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

3 thoughts on “पंडित शिवपूजन सिंह कुशवाहा के 50 ग्रंथों का तीन खंडों में प्रकाशन

  1. डॉ.शिवपूजन सिंह कुशवाहा भारतीय इतिहास के कर्नल टॉड हैं। ऐसा विद्वान् व इतिहासकार हजारों वर्षों में एक दो पैदा होते हैं। बिहार की धरती ने उन्हें जन्म देकर बुद्ध की परंपरा को आगे बढ़ाया है।

  2. श्री शिवपूजन सिंह कुशवाहा लिखित सभी खंड़ इन्टरनेट के माध्यम से उपलब्ध करवाया जाना चाहिए ताकि कुशवाहा समाज के लोग इसे पढ़ सके।

  3. डॉ.शिवपूजन सिंह कुशवाहा का योगदान बहुत बड़ा है.समग्रता से चिंतन करने पर ऐसा लगेगा कि वे स्वयं एक स्कूल हैं.उन्हें पूरे नाम के साथ याद किया जाना चाहिए.कुछ प्रकाशक उनके नाम में लगा ‘कुशवाहा’शब्द हटाकर उनकी किताब का प्रकाशन कर रहे हैं तो इन्हें समझने में भ्रम होता है.लगता है कोई दूसरा लेखक है.”डॉ.शिवपूजन सिंह कुशवाहा”नाम इनकी राष्ट्रीय पहचान बन चुका है.इसी नाम से वे ‘कुशवाहा क्षत्रियोत्पत्ति मीमांसा ‘की इन्होंने रचना की है.

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