पौराणिक हिंदू समाज और सत्य सनातन वैदिक धर्म को मानने वाले आर्य समाज में अंतर

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१. हिन्दू परमात्मा के भिन्न भिन्न प्रकार के अवतारों को मानते है। तैंतीस कोटि का अर्थ तैंतीस करोड देवी देवता लेकर उन्हें भी परमात्मा या परमात्मा का अवतार मानता है।

आर्य एक निराकार ईश्वर को मानते हैं जो अवतार नहीं लेता । राम, कृष्ण, पतंजलि, जैमिनि, कणाद, दयानंद जैसे महापुरुषों के जन्म लेने को अवतरण या अवतार मानते हैं । तैंतीस कोटि का अर्थ तैंतीस प्रकार के देवता मानता है- आठ वसु,ग्यारह रुद्र,बारह आदित्य,इन्द्र(विद्युत),प्रजापति (यज्ञ)। जो दिव्य गुणों से युक्त हो और सुख देवे उसको देवता मानते हैं।

२. हिन्दू कृष्ण और राम को परमात्मा वा परमात्मा का अंश मानते है जो वेद विरुद्ध है।

आर्य राम और कृष्ण जी को योगी व यौद्धा मानते हैं, उनके आदर्शों पर चल कर वे भी उन जैसा आर्य महापुरुष बनने का प्रयास करते हैं।

३. हिन्दू मूर्ति पूजा करके ही इति मान लेते हैं , कभी कभी मूर्ति पूजा करके उल्टे पुल्टे मंत्रों से हवन भी कर लेते हैं यह ऐसे ही है जैसे विष पीकर दूध पी लेना !

आर्य ब्रह्मयज्ञ अर्थात सन्ध्या ध्यान करके शुद्ध वेद मंत्रों से हवन करते हैं, पंचमहायज्ञ करते हैं जिसमें माता पिता आदि जीवित मूर्तियों की पूजा भी आ जाती है।

४. हिन्दू परमात्मा को साकार व निराकार दोनो मानते हैं, परमात्मा की झूठ मूठ की मूर्तियां बनाते हैं, उनमें झूठमूठ की प्राण प्रतिष्ठा कर उन्हें पूजते हैं जो पागलपन है वेदविरुद्ध है।

आर्य ईश्वर को सृष्टि की हर वस्तु में मानते हैं, पूरा ब्राह्मण्ड उसके द्वारा आच्छादित है, वह निराकार अजन्मा अनन्त है – (यजुर्वेद ४०.१,८ ) , प्रकृति व प्रकृति से बने पदार्थ साकार हैं आत्मा और परमात्मा निराकार है। जन्म, अवतरण वा मोक्ष केवल आत्मा का ही होता है। प्रकृति आत्मा और परमात्मा तीनों अनादि हैं।

५. हिन्दू अठारह पुराण व तन्त्र आदि अनार्ष ग्रन्थों को मानते व प्राथमिकता देता है।

आर्य चार वेद, ग्यारह उपनिषद् , छ: दर्शन को मानते हैं।असली पुराण ब्राह्मण ग्रन्थों को मानते है। अठारह पुराण वेदव्यास कृत नहीं हैं उनमे कपोल कल्पित किस्से कहानियों की भरमार है। आर्य राम, कृष्ण, हनुमान आदि के बारे में फैले दुष्प्रचार को दूर करते हैं।

६. हिन्दू उन सभी लोगों को ऋषि मानते है जिनके द्वारा हमे अच्छाई (ज्ञान ) प्राप्त हो। काली मां को बलि देने वाले मांसाहारी रामकृष्ण व विवेकानन्द को भी ऋषि बताते हैं !!

आर्य केवल उन्हीं को ऋषि मानते हैं जिन्होंने वेद मंत्रों का साक्षात्कार कर हमारा मार्गदर्शन किया है, जो योगी हैं, सदाचारी हैं ,परोपकारी हैं । ब्रह्मा से लेकर दयानन्द तक लाखों ऋषि मुनि हुये हैं।

७. हिन्दू छ: सौ वर्ष पूर्व की तुलसीदास रामायण को प्राथमिकता देते हैं जिसमे हनुमान जी जैसे विद्वान को बन्दर बताया गया है । चौपाईयों को महामंत्र बताते है।

आर्य उतर काण्ड को छोड कर मूल बाल्मीकि रामायण को ही प्राथमिकता देते हैं। रामचरितमानस, तन्त्र ,पुराण आदि अनार्ष ग्रन्थों को पढने वाले हिन्दुओं को सत्यार्थप्रकाश पढ़ने को कहते हैं जिसमें वेद उपनिषद् दर्शन आदि सब आर्ष ग्रन्थों का सार है और पुराण कुरान बाईबल आदि सब अनार्ष ग्रन्थों का तर्क व प्रमाण सहित खण्डन किया गया है।

८. हिन्दू ईश्वर के सर्वोत्तम नाम ओम् को मानते तो हैं परन्तु जप राम राम , राधे राधे, कृष्णा कृष्णा आदि का ही करते हैं !

आर्य ईश्वर के सर्वोत्तम नाम ओ३म् का ही जप व ध्यान करते हैं। वेद का भी यही उपदेश है- ओ३म् क्रतो स्मर (यजुर्वेद ४०.१५) अर्थात् हे जीव ! तू ओम् का स्मरण कर ।

९. हिन्दू मुगलों द्वारा दिये हिन्दू नाम पर गर्व करता है जो एक अपशब्द है और जिसका उल्लेख वेदादि किसी आर्ष ग्रन्थ में नहीं मिलता।

आर्य ऋषि मुनियों द्वारा दिये आर्य नाम पर गर्व करता है जिसके बडे सुन्दर अर्थ हैं और जिसका उल्लेख वेद रामायण, महभारत गीता आदि सब प्राचीन शास्त्रों में मिलता है।

१०. हिन्दू फलित ज्योतिष, जन्मपत्री, महूर्त, पिण्डदान, कांवड यात्रा, रथयात्रा, अमरनाथ यात्रा, मूर्ति विसर्जन आदि पाखंड व अन्धविश्वासों पर विश्वास करता है।

आर्य इन सब अन्धविश्वासों व पाखंड को नहीं मानता, ग्रह नक्षत्रों की गति का अध्ययन कर सूर्य ग्रहण,चन्द्र ग्रहण आदि का पूर्वानुमान लगाना अर्थात गणित ज्योतिष को मानता है ।
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– डा मुमुक्षु आर्य

1 thought on “पौराणिक हिंदू समाज और सत्य सनातन वैदिक धर्म को मानने वाले आर्य समाज में अंतर

  1. Arya or Islaam ki mukhay Adhaar ek hi ha. Islaam ka matlab hi hota ha Ek Parmatma ko samarpan.

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