उठो , जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक संघर्ष करते रहो

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आज समय नहीं सोने का है ,
आज समय नहीं खोने का है,
युग के प्रहरी जाग कि मंजिल तेरी पास है।
शूल सुसज्जित डोली पर विजय की चढ़ी बारात है।
उपनिषद कहते हैं- चरैवेति, चरैवेति अर्थात् चलते रहो। चलते रहने का नाम जीवन है। हर स्थिति और परिस्थिति में आगे ही आगे बढ़ते चलने का नाम जीवन है। जो आगे बढ़ने से रुक जाते हैं वह जीते जी मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं । चलना ही जीवन है और जीवन की निरंतरता ही हमें अपने जीवन लक्ष्य तक पहुंचाती है । जीवन में निराश और हताश होकर लक्ष्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती। बीते हुए कल पर आंसू बहाने से कोई लाभ नहीं , आने वाले पल का स्वागत करने के लिए वर्तमान को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए । इससे हमारा शेष जीवन सुंदर और श्रेष्ठ बनता जाता है। जीवन की इस निरंतरता को सकारात्मक ऊर्जा के साथ प्रवाहित करना अपने जीवन को फूल जैसा कोमल बनाना होता है। शुभ कर्म करना ही अपने आप में एक तृप्ति है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि जब तक हम सोते रहेंगे तो हमारा भाग्य भी सोता रहता है और जब हम उठ कर चल पड़ते हैं, तो हमारा भाग्य भी साथ चलता है। यही कारण रहा कि हमारे ऋषियों ने जीवन का सबसे बेहतर पक्ष चलते रहने में खोजा । चलते रहने का अभिप्राय है कि अपनी मानसिक , आध्यात्मिक, शारीरिक , सामाजिक चौमुखी उन्नति के लिए सदैव प्रयासरत रहना , सजग रहना , जागरूक रहना ।यदि कहीं भी किसी भी क्षेत्र में हम पिछड़ गए या रुक गए या थक गए या थम गए तो समझो कि उस क्षेत्र में हमारी मृत्यु हो गई।
पुरुषार्थी आलस्यरहित रहना ठीक समझता है।

साधारणतया जिसे हम भाग्य या प्रारब्ध कहते हैं, वह हमारे पूर्व-संचित कर्म ही होते हैं। श्रेष्ठ पुरुष दौड़ लगाते हैं, आगे चलते हैं। जो दौड़ता है उसे लक्ष्य मिलन की संभावना अधिक होती है। घर में निकम्मा होकर पड़े रहने का अर्थ है कि घरवालों से व्यक्ति झगड़ा करेगा , कोई न कोई ऐसा अनिष्ट करेगा जिसका परिणाम घर की शांति , एकता और भाईचारे को मिटाने में दिखाई देगा। शेर भी जब तक अपने भोजन के लिए स्वयं प्रयास नहीं करता, अपने आप उसके मुंह में कोई पशु नहीं आएगा। जो ईश्वर पर विश्वास रख कर कर्म और पुरुषार्थ करते हैं, उन्हें सफलता मिल जाती है। संसार का बनना-बिगड़ना ईश्वर के ही आधीन है। ईश्वर का हर काम नियमानुसार है। ईश्वर का सानिध्य पाकर, पुरुषार्थी बन कर, कर्म करते हुए हम सुखी रह सकते हैं। यह कर युग है, कलियुग नहीं । इस हाथ दें और उस हाथ लें ।
अपने सद उद्देश्य एवं जीवन के ध्येय को प्राप्त करने के लिए सदैव चलते रहो। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की इच्छा प्रयास और साहस हमेशा करते रहना चाहिए। जैसे दीपक में जब तक तेल की अंतिम बूंद होती है , तब तक भी वह प्रकाश देता है । वैसे ही मनुष्य को अंतिम सांस तक उन्नति के मार्ग पर चलने के लिए प्रयास करना चाहिए ।
जो अपनी गति विपरीत परिस्थितियों में निरंतर बनाए रखते हैं और उन्नति के मार्ग पर चलते रहते हैं वह एक दिन अवश्य ही सफलता को प्राप्त करते हैं। हमारे ऋषि और मुनियों ने चरैवेति चरैवेति का सिद्धांत दिया है अर्थात निरंतर श्रम करते रहो, प्रयास करते रहो, कर्म करते रहो ,उस रास्ते पर आगे बढ़ते रहो – सफलता अवश्य मिलेगी।

अनासक्ति, आसक्ति, विरक्ति

मनुष्य को अपने जीवन में अनासक्त होना चाहिए। जब मनुष्य राग और द्वेष से छूट जाता है तो उस स्थिति को अनासक्ति कहते हैं। अनासक्ति में मनुष्य कर्म करते समय निस्पृह भाव में होता है अर्थात कर्म करते हुए उसके फल की इच्छा नहीं कर रहा। अनासक्ति की स्थिति में न तो आकर्षण हैं ना विकर्षण है। महात्मा बुद्ध इसी को उपेक्षा भाव कहते हैं। स्वामी विवेकानंद परिव्राजक अपने उपदेश में कहते हैं कि भोजन को प्राप्त करना शरीर के लिए आवश्यक है परंतु भोजन में स्वाद की तलाश करना उसके प्रति आसक्ति है। अर्थात भोजन भी अनासक्त होकर के लें ।उसमें भी साधना है।
अनासक्त का तात्पर्य कदापि यह नहीं है कि भोजन नहीं लेना है या जीवन से भाग जाना है , बल्कि अनासक्ति का तात्पर्य यह है कि भोजन लेना है परंतु उसके स्वाद में नहीं जाना। जीवन जीना है , परंतु जीवन से भागना नहीं है। जीवन को एक साधन के रूप में जीना है। उसको अपनी नौका बनाना है।
शरीर को सभी नश्वर कहते हैं , लेकिन शरीर को प्राप्त करके जो लोग इसको नौका के रूप में , साधन के रूप में प्रयोग करते हैं – उनका जीवन सफल होता है। यह नश्वर होते हुए भी मनुष्य के लिए आवश्यक है । मनुष्य शरीर के बिना व्यक्ति की मुक्ति नहीं। क्योंकि अनासक्त साधक सांसारिक घटनाओं का केवल साक्षी है, तटस्थ दृष्टा है , जिसमें आत्मीय चेतना है।
अनासक्ति का समानार्थक विरक्ति है। जिस वस्तु में आकर्षण है वह आसक्ति है। चाहे यह आकर्षण शरीर के प्रति है और चाहे यह आकर्षण भौतिक वस्तुओं के प्रति है।
जहां राग और द्वेष संसार में दोनों साथ – साथ चलते रहते हैं उसी रागमय संसार में अनुरागमय जीवन जी लेना एक सदगृहस्थ की विशेषता है। क्योंकि महर्षि दयानंद ने गृहस्थ आश्रम को सभी आश्रमों से श्रेष्ठ कहा है , इसलिए गृहस्थी में रहते हुए भी विरक्ति ,त्याग, इच्छाओं का दमन, इंद्रियों का संयम सभी संभव है।
व्यक्ति में अर्थात वैराग्य में विमुक्त होने की संभावना प्रबल होती है। मोह से मुक्ति ही वैराग्य का आंतरिक सौंदर्य है । जहां वह है वहां बैराग नहीं , वास्तव में निर्मोही व्यक्ति ही विरक्ति को प्राप्त कर सकता है, वैरागी हो सकता है। वैराग्य में भी परमार्थ युक्त चिंतन आवश्यक है । उसके बिना वैराग्य अधूरा है । केवल निर्मोही होना ही काफी नहीं है।

नीति ,नियत ,नियति

नियति का तात्पर्य है नियंता अर्थात वह परम सत्ता परमपिता परमेश्वर जो इस संसार का विधाता है। वस्तु तः नीति, नीयत और नियति यह तीनों ही अन्योन्याश्रित हैं। जैसे अपनी नीति में सुधार करो, जो अपनी नियत में खोट है, उसको दूर करो , नियंता की कृपा स्वत: प्राप्त हो जाएगी।

संकल्प शक्ति

मनुष्य के अंदर संकल्प शक्ति होनी चाहिए अर्थात उसको संकल्प शक्ति का धनी होना चाहिए । जिस संकल्प को कर ले उसको सदैव पूर्ण करने में प्रयासरत रहना चाहिए और जब तक संकल्प की पूर्ति ना हो जाए तब तक संकल्प को पूरा करने के लिए कार्य करते रहना चाहिए । इच्छाशक्ति को कभी कमजोर नहीं करना चाहिए । प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अवसर की तलाश करनी चाहिए। जैसे मनुष्य के विचार होते हैं । वैसा ही उसका शरीर और स्वास्थ्य भी हो जाता है , क्योंकि विचार से ही भूख का एहसास होता है और भोजन करने के बाद संतुष्टि का अहसास भी विचार ही कराते हैं । संकल्प शक्ति और विचार शक्ति में उसको चरमोत्कर्ष की प्राप्ति कराती है। जीवन में सफलता को प्राप्त करना है तो आपको संकल्प शक्ति का धनवान होना पड़ेगा।

प्रमाद

प्रमाद मनुष्य का सबसे घातक शत्रु है जो व्यक्ति प्रमाद करते हैं उनका व्यक्तित्व नष्ट हो जाता है। क्योंकि प्रमाद से ही व्यक्ति के गुण नष्ट होने लगते हैं। प्रमाद से शरीर एवं संकल्प शक्ति दोनों ही कमजोर होने लगते हैं । कार्य नहीं करना प्रमाद है और जब मनुष्य कार्य नहीं करेगा तो जीवन तो निष्फल होना आवश्यक ही है । यदि जीवन को सफल बनाना चाहते हैं तो प्रमाद को त्यागना होगा। मनुष्य के हाथ से अनेक अवसर निकल जाते हैं ।
कठोपनिषद् का मंत्र है:—

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय 1, वल्ली 3, मंत्र 14 )
(उत्तिष्ठत, जाग्रत, वरान् प्राप्य निबोधत । क्षुरस्य निशिता धारा (यथा) दुरत्यया (तथा एव आत्मज्ञानस्य) तत् पथः दुर्गं (इति) कवयः वदन्ति ।)

जिसका अर्थ हैः उठो, जागो, और जानकार श्रेष्ठ पुरुषों के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्त करो । विद्वान् मनीषी जनों का कहना है कि ज्ञान प्राप्ति का मार्ग उसी प्रकार दुर्गम है जिस प्रकार छुरे के पैना किये गये धार पर चलना ।
कठोपनिषद् में गौतम ऋषि के पुत्र नचिकेता का मृत्युदेवता यम के साथ संवाद का विवरण है । नचिकेता को यम सृष्टि के अंतिम सत्य परमात्मतत्त्व के बारे में बताते हैं । सचमुच ऋषि का यह बहुत गहरा उपदेश है । जब मनुष्य इस उपदेश को हृदयंगम कर लेता है तो वह जीवन में कभी भी निराश नहीं हो सकता , कर्मशीलता उसके रोम – रोम में बस जाती है और उपलब्धियां उसके तलवे चाटती हुई स्वयं उसके पास आती हैं।

भगवान किसे कहते हैं,?

भग और वान दो शब्दों से मिलकर के भगवान शब्द बना है जिसमें भग का तात्पर्य है बुद्धि ,ऐश्वर्य, शांति ,बल ,विद्या और आयु का सामूहिक स्वरूप तथा वान का अर्थ होता है जिसके पास यह सभी शक्तियां विद्यमान हो ,उसी को भगवान कहते हैं।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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