चीन की कुटिल नजर के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता:’ के वेदवाक्य की घोषणा

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राकेश सैन

दुनिया की सभी सरकारें कंपनियों की अवसरवादी खरीद से निपटने में जुटी हुई हैं। महामारी के दौरान दुनिया भर में कंपनियों की कीमत 50 से 60 प्रतिशत तक गिर गई है। हालांकि, शेयर बाजार में कंपनियों का यह भाव उनकी वास्तविक कीमत नहीं है।
केंद्र सरकार ने फैसला लिया है कि भारत की भौगौलिक सीमा के साथ लगते देशों से प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश से पहले केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी होगी। सरकार की अधिसूचना में चाहे किसी देश का नाम नहीं लिया गया है परन्तु यह साफ है कि सरकार ने चीन और पाकिस्तान को ध्यान में रख कर यह निर्णय लिया है। चाहे कुछ अर्थ विशेषज्ञों ने देश की कथित खराब अर्थव्यवस्था के चलते सरकार के इस फैसले पर किंतु परन्तु किया है लेकिन इसमें संदेह नहीं है कि सरकार ने एक मजबूत व दूरदृष्टिपूर्ण कदम उठा कर देश की आर्थिकता में चीन जैसे देश के बढ़ने वाले हस्तक्षेप की आशंका को निर्मूल करने का प्रयास किया है। कोरोना वायरस के चलते तालाबंदी का सख्ती से पालन करने की अपील करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता:’ के वेदवाक्य की घोषणा करते हुए सतत् जागरूक होने व देश को जागरूक रहने को कहा था और सरकार ने उक्त फैसले से इस वाक्य को चरितार्थ भी करने का प्रयास तो किया है परन्तु इस खतरे को लेकर सरकार को अभी भी अपनी आंख, नाक और कान खोल कर रखने होंगे क्योंकि हमसे ज्यादा और कौन जान सकता है कि चाल, चरित्र और चेहरा बदलने में चीन का कोई सानी नहीं है।
‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता:’ सुक्ति यजुर्वेद के नौवें अध्याय की 23वीं कंडिका से ली गई है। इसका अर्थ है, हम पुरोहित राष्ट्र को जीवंत और जाग्रत बनाए रखेंगे। पुरोहित का अर्थ होता है जो इस पुर का हित करता है यानि ऐसा व्यक्ति जो राष्ट्र का दूरगामी हित समझकर उसकी प्राप्तिकी व्यवस्था करे। पुरोहित में चिन्तक और साधक दोनों के गुण होते हैं, जो सही परामर्श दे और निर्णय ले सकें। केंद्र सरकार ने नए दिशा-निर्देश के जरिये यह साबित कर दिया है कि चीन और उस जैसे दूसरे पड़ोसी देशों से अपने देश की कंपनियों में बिना मंजूरी के निवेश की इजाजत नहीं होगी। दरअसल, कोरोना संकट के दौर में भरतीय कंपनियों के शेयर की कीमत काफी घट गई है। ऐसे में आशंका है कि चीन खुद या फिर दूसरे किसी पड़ोसी देश के जरिये भारत में अपना निवेश बढ़ा सकता है। साथ ही नई कंपनियां खरीद कर भारतीय अर्थव्यवस्था में सीधा दखल दे सकता है। इसी को रोकने के लिए प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश अधिनियम में बदलाव की जरूरत पड़ी।
इंडस्ट्री चैंबर एसोचैम के महासचिव श्री दीपक सूद ने एक साक्षात्कार में बताया कि दुनिया की सभी सरकारें कंपनियों की अवसरवादी खरीद से निपटने में जुटी हुई हैं। महामारी के दौरान दुनिया भर में कंपनियों की कीमत 50 से 60 प्रतिशत तक गिर गई है। हालांकि, शेयर बाजार में कंपनियों का यह भाव उनकी वास्तविक कीमत नहीं है, लेकिन इसे अवसरवादी खरीद-फरोख्त के जरिये प्रबंधन नियंत्रण के लिए मौके की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। यूं तो उद्योग जगत हमेशा आसान प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश नीति के पक्ष में रहता है, लेकिन इस तरह की चालाकी से की जाने वाली खरीद-फरोख्त को रोकने के लिए यह कदम उठाना जरूरी था। विशेषज्ञ बताते हैं कि पिछले एक साल में चीन की तरफ से देश में करीब 15 हजार करोड़ रुपये का निवेश आया। चीन ने उच्च स्तर पर स्टार्टअप में भी पैसा लगाया है। चीन के निवेश की गति बाकी देशों के मुकाबले ज्यादा ही तेज रहती है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि कोरोना संकट के दौर में चीन और उसके जैसे तमाम देश, जिनके पास खरीदने की ताकत मौजूद है, अपने से कमजोर देशों में तेजी से अधिग्रहण करने में जुटे हैं। इससे निपटने के लिए जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन और इटली जैसे देशों ने भी इसी तरह के कदम उठाए हैं। आने वाले दिनों में तमाम और देश भी अपनी कंपनियों को बचाने के लिए ऐसे कदम उठाने को मजबूर होंगे। भारत से भूगोलीय सीमा से सटे देशों में चीन, बांग्लादेश, पाकिस्तान, भूटान, नेपाल, म्यांमार और अफगानिस्तान शामिल हैं। इन देशों के निकाय भारत सरकार की मंजूरी के बिना निवेश नहीं कर सकेंगे। सरकार के इस निर्णय से चीन जैसे देशों पर प्रभाव पड़ सकता है। पाक के निवेशकों पर शर्त पहले से लागू है।
भारत और चीन के बीच चल रहे व्यापार में पहले ही भारी असंतुलन है और भारत को हर साल अरबों रूपयों का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। चीन के सस्ते सामान के चक्कर में भारतीय कुटीर उद्योग कराह रहा है। विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, साल 2018 में भारत चीन के बीच 95.54 अरब डॉलर का कारोबार हुआ लेकिन इसमें भारत ने जो सामान निर्यात किया उसकी कीमत 18.84 अरब डॉलर थी। यानि भारत ने 76.7 अरब डालर का आयात किया। दोनों देशों के बीच का यह व्यापारिक असंतुलन भारत के लिए सरदर्द बन गया है। अगर ऐसे में चीन जैसा देश खुद या हमारे पड़ोस में स्थित श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार जैसे कृतज्ञ राष्ट्रों के जरिए भारतीय कंपनियों को खरीद लेता है तो वह भारतीय अर्थव्यवस्था पर न केवल हावी हो सकता है बल्कि देश की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश कर सकता है। हम जानते हैं कि पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश जैसे देशों को आर्थिक मदद दे कर चीन इस तरह इसकी कीमत वसूलता रहा है कि ये देश चीन के चंगुल में छटपटा रहे और मुक्ति का मार्ग ढूंढ़ रहे हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं कि देश की आर्थिकता को प्रोत्साहित करने के लिए प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश की अपरिहार्यता को कुछ आर्थिक जानकार आवश्यक मानते हैं परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि इसके खतरों पर भी आंखें मूंद ली जाएं।
केंद्र सरकार के इस निर्णय पर एक घटना स्मृतिपटल पर कौंध गई, पाकिस्तान से टाटा सूमो का हजारों गाड़ियों का आर्डर था लेकिन मुम्बई हमले के बाद कंपनी के मालिक जेआरडी टाटा ने गाड़ियों की आपूर्ति रद्द कर दी व यह कह कर गाड़ियां देने से मना कर दिया कि मैं उस देश को गाड़ियां नहीं दे सकता जो मेरे देश के खिलाफ इनको इस्तेमाल करे। आज भी चाहे देश की आर्थिकता को पटरी पर लाने के लिए पूंजी की आवश्यकता है परन्तु केंद्र सरकार ने पूंजी पर संप्रभुता को अधिमान देकर ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता:’ की सुक्ति को फलीभूत कर दिखाया।

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