शाहीन बाग के शिकारी एक बहाने के सहारे आसमान में ऊंची उड़ान भरते और घात लगाते

विजय मनोहर तिवारी

जो दिखता है, वो बिकता है। दिखाऊ माल ही बिकाऊ माल है। शाहीनबाग दिख रहा है। शाहीनबाग बिक रहा है। एक महीना हो गया। शो हाऊसफुल है। एक समीक्षा में किसी परम ज्ञानी ने शाहीन का मतलब लिखा- “एक ऐसी चिड़िया जो बहुत ऊँचाई पर उड़ती है और अपने शिकार को उड़ते हुए खाती है।”

नोट कर लीजिए- शाहीनबाग किसी इलाके का नाम नहीं है, जो दिल्ली में है और अभी अचानक सबको दिखाई दे रहा है। शाहीनबाग शिकारियों के ठिकानों का नाम है। सिर्फ दिल्ली में नहीं है। सारे हिंदुस्तान में हैं। दुनिया में हर कहीं हैं। कहीं कम हैं। कहीं ज्यादा हैं। कहीं वे ही वे हैं। अपने शिकार को उड़ते हुए खाने वाले शातिर शिकारी। शिकार की फिक्र मत कीजिए, वह तो लजीज ही है। शिकारी की भूख की सोचिए।

वे सन् 47 में हिंदुस्तान नाम के शिकार को दो टुकड़ों में चट कर चुके हैं। एक टुकड़ा हज़म हो चुका है। वह पाकिस्तान है। हज़म होने के बाद आमाशय में उस टुकड़े के भी दो टुकड़े कर लिए। वह बांग्लादेश है। अब किस्मत से बाहर बच गया दूसरा बड़ा टुकड़ा बहुत जोर मार रहा है। यह कम्बख्त हिंदुस्तान है!

एक बहाना मिल गया है। शाहीनबाग के शिकारी आसमान में दिलकश उड़ानें भर रहे हैं। इस बाग के पंछियों के परों में हैरतअंगेज़ ताकत है। कमाल की नज़र है। वे बहुत ऊँचाई से शिकार पर पैनी नज़र रखने में माहिर हैं। हवा में घात लगाते हैं। उनके हमले अचूक होते हैं। वे उड़ते हुए ही अपना लजीज शिकार हज़म कर जाते हैं। परदे के पीछे काम करने वाले उनके हुनरमंद ट्रेनर को दाद देनी ही पड़ेगी। जैसे रिमोट से ड्रोन उड़ाए जा रहे हैं।

इन लाजवाब शिकारियों को बेहद कमज़ोर शिकार की तरह पेश करना बड़े हुनर का काम है। यह मुल्क हुनरमंदों से भरा हुआ है। वे बताएँगे कि ये शिकारी तो बिल्कुल ही नहीं हैं, ये तो खुद शिकार हैं। फिराकपरस्तों के शिकार। गरीबी के शिकार। अशिक्षा के शिकार। सेहत के शिकार। बेरोज़गारी के शिकार।

इनपर सबसे पहले रहम ज़रूरी है। इनकी सबसे ज्यादा मदद ज़रूरी है। ये कितने कमज़ोर हैं। ये कितने कम हैं। अल्प हैं। अल्प संख्या में हैं। अल्पसंख्यक हैं। 20 या 25 करोड़। हैं तो क्या हुआ जी। गरीबी और पिछड़ेपन के तो आजीवन पात्र हैं। जनाब, यकीन न हो तो सच्चर कमेटी की गवाहियाँ देख लीजिए। आँख से आँसू बह निकलेंगे।

कुछ खास किस्म के कैमरे शाहीनबाग के शातिर शिकारियों को एक ऐसे जख्मी शिकार की तरह फिल्माने की तकनीक से लैस हैं, जिन्हें बेवजह शिकार किया जा रहा है। जिन्हें उनके बाग से बेदखल करने की साजिशें हो रही हैं। वे बेचैन हैं। रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा हुआ है। वे तो पुश्तों से इस बाग में पंख फड़फड़ा रहे हैं। इनमें बहुत सारे नन्हें चूजे हैं, जिनके पंख भी नहीं आए हैं। कड़ाके की सर्दी में वे बिना पंखों के ही अपनी माँओं की गोद में नुमाया हैं। सबसे कम उम्र के शाहीन। इन्हाेंने किसका क्या बिगाड़ा है? बेचारे मासूम!

शाहीन का बाग छोटा होगा। लेकिन उनके पीछे काम कर रहे दिमाग बड़े हैं। वे बहुत खुराफातों से भरे दिमाग हैं। उन्हें पूरे हक से फैलने-पसरने का तजुर्बा 70 साल का है। वे शाही सेक्युलर गोद में पले हैं। उनकी खास खिदमतें हुई हैं।

आज़ादी के बाद से हुकूमत के लिए वे एक ऐसी पवित्र मजार थे, जिन पर सेक्युलरिज्म की चादरें सबने चढ़ाई हैं। अब यह उनकी आदत बन गई कि जो तख्त पर आए चादर चढ़ाए। सिक्के चढ़ाए। नजराने दे। हुकूमत में रहने की मन्नत मांगे। इधर कुछ बरस हुए बाग के आसपास की हवा बदल गई है। मगर बुरी आदतों का क्या, शाहीन बाग में बुरी आदतें जोर मार रही हैं। दिल्ली की सड़कों पर वही जोर नुमाया है। असलियत उजागर होने की खीज।

खबरदार, मुल्क के बाग को बचाने की सबकी जिम्मेदारियों की बात मत कीजिए। शाहीन सिर्फ हक की जबान जानते हैं। शिकार पर उनका हक जन्मजात है। मजाल है कि उनके बाग-बगीचों, घोंसलों और मांद में कोई संपत्ति कर लेने पहुँच जाए। बिजली, पानी, इलाज, नौकरी, जियारत, नकद सब मुफ्त चाहिए।

अपनी बदहाली ठीक से बयां कर सकें इसलिए लाउड स्पीकरों पर दिन-रात की चीख-पुकार बेरोकटोक चाहिए। चुनाव के वक्त थोक चाहिए। इन सारे हक-हकूक के लिए सारे दस्तावेज उनके पास तैयार हैं। बोलिए क्या चाहिए, बर्थ, वोटर, आधार, राशन, पैन, ड्राइविंग, इनकम? सब बनवाए हुए हैं।

शाहीनों को पता है कब बाग से बाहर आना है। कब पंख फड़फड़ाना है। कब चोंच को नुकीला करना है। कब पैनी नज़र से हमलावर होना है। कब तक खामोशी से बाग में ही बने रहना है, कब बाहर झाँकना है।

1990 में जब कश्मीर के पुराने मालिक खदेड़कर बाहर निकाले गए और उनके पीढ़ियों से बसे-बसाए बाग उजाड़े गए तब दिल्ली के इन शाहीनों का पवित्र नाम किसने सुना था? किसे पता था कि वे इंसानी हक के लिए लड़ने वाली इतनी बुलंद आवाज हैं? हकीकत यह है कि वे सिर्फ अपने शिकार की घात में हैं। उन्हें दूसरों के आघातों से क्या लेना-देना? वे चीख-चीखकर कहेंगे कि वे मुल्क के असली मालिक हैं!

याद रखिए, शाहीन सिर्फ दिल्ली के एक बाग में नहीं हैं। वे मुशायरों में शायरों का वेश धरे बैठे हैं। सिनेमा के संसार में भी उनकी पहुँच-पकड़ सेक्युलर लेखक-शायरों के मार्फत है। वे उन जमातों में भी जमे हैं, जो खिसियाकर अवार्ड लौटाती है। वामपंथ की लहरों में तो उनके झंडे के ही चांद से ज्वार-भाटे आते हैं। उनपर ओढ़ाई गई बदहाली पर स्यापा करने वाले मार्क्स और मैगसेसे मीडिया की हर शाख पर बैठे गर्दन घुमा रहे हैं।

परजीवी एनजीओ में उनके ही बीजों की बहार है। जेएनयू में 10 रुपये की भारी-भरकम फीस पर गांजे के गहरे कश में गम भुलाने वाले बदनाम अधेड़ों में उनकी ही रूह कैद है। शाहीन बाग में सब समाए हुए हैं। वे गरीब हैं। वे पिछड़े हैं। वे कई दिनों के भूखे हैं। वे गम में हैं। वे गुस्से में हैं।

दिल्ली के किले से बेदखल और बेनकाब हो चुके शातिर सियासी खानदानों की आखिरी उम्मीद इन्हीं शाहीनों पर टिकी है। आग को जितनी हवा दे पाएँ! लाल किले से शपथ की जल्दबाजी में एक दिन वे ही मुल्क के दो टुकड़े करके आए थे।

फिर जन्नत समझकर वे चैन से 60 साल तक सियासत के हरे-भरे बाग के फल चखते रहे। वे खुद को बाग का एकमात्र और असली मालिक मान बैठे। उनकी औलादों को शपथ की पांच साला रस्म पुश्तैनी हक में मिली। अब परेशान पब्लिक ने उनके बाग उजाड़ दिए हैं। कुर्सियों से खदेड़ दिए गए हैं। वे बेसहारा हैं। अब तो शाहीन बाग का ही आसरा है।

शाहीन बाग के जो परिंदे सामने हैं। वे या तो बेकसूर हैं या शातिर हैं। लेकिन उन्हें पता ही नहीं कि वे हैं किस दुनिया में। दुनिया जा कहाँ रही है। दुनिया में चल क्या रहा है। बाग के रखवालों ने उन्हें दुनिया की असलियत से काट कर रखा था ऐसे ही मौकों पर आगे करने के लिए। जब बाग के रखवालों का वजूद मुश्किल में पड़े तो शिकारी परिदों को उड़ान भरने के लिए निकालो। ठिठुरती ठंड में परिंदे अपने लिए नहीं अपने आकाओं के लिए पंख फड़फड़ा रहे हैं।

शाहीनबाग का तमाशा जारी है। मदारी और जमूरे सब अपने काम पर हैं। वे ढपली बजा रहे हैं। नुक्कड़ों पर ड्रामे कर रहे हैं। नारों का शोर है। कश्मीर की कर्कश धुन पर ये नारे आज़ादी के हैं। मीडिया की शाखों पर उल्लुओं को काम मिल गया है। शायर असरदार शेर रच रहे हैं। एएमयू और जेएनयू की जमात का एक्सटेंशन काउंटर खुल गया है।

सियासत और सिनेमा वाले टिवट्रर पर फड़फड़ा रहे हैं। उन्हें लोकतंत्र खतरे में नज़र आ रहा है। मखमली टोपियाँ और खूबसूरत शेरवानियाँ हिटलर की आहट से हिल रही हैं। परदे पर जितना दिख रहा है, परदे के पीछे उससे ज्यादा चल रहा है। सीएए नाम का ख्वाब ताज़ा है। ख्वाब में बच्चे डर रहे हैं। चिल्ला रहे हैं। कभी हंस रहे हैं। कभी गा रहे हैं।

तो देवियो-सज्जनों, शाहीनबाग का तमाशा ‘अवार्ड वापसी’ और ‘चौकीदार चोर’ के फ्लॉप शो की अगली कड़ी है। क्या पता हिट हो जाए। तो कहीं मत जाइए। प्राइम टाइम में हमारे साथ बने रहिए। ब्रेक के बाद हम सीधे चलेंगे शाहीनबाग…

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