गांधीजी की दृष्टि में राम और कृष्ण काल्पनिक और महाराणा प्रताप और शिवाजी पापी थे

1947 के बाद कांग्रेस ने किस प्रकार के भारत का निर्माण करना आरंभ किया ? यह आज के परिप्रेक्ष्य में बहुत ही प्रासंगिक प्रश्न है । वास्तव में कांग्रेस का चिंतन वैदिक भारत की ओर कभी गया ही नहीं । उसने मुगलों व तुर्को से पिछले इतिहास को भुलाने का प्रयास किया और पश्चिमी विचारकों के इस तर्क से सहमति व्यक्त की कि यह दुनिया केवल 5000 वर्ष पुरानी है । उसने वैदिक सृष्टि संवत को मानने से भी इनकार कर दिया और इस प्रकार पूरा का पूरा वैदिक इतिहास उसकी दृष्टि में अंधकार युग के नाम से जाना गया । जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत का गौरवमयी वैदिक अतीत कहीं विलीन हो गया और मुगलों की तलवारों की खनखनाहट को यहां धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ाकर उसे देश के लिए अनुकूल बनाने का प्रयास किया जाने लगा । परिणाम स्वरूप हमारी युवा पीढ़ी आज यह कह रही है कि इस देश में जो भी कुछ है वह मुगलों , तुर्कों और इन दोनों के बाद आए अंग्रेजों की देन है । हमारा अपने पास कुछ भी नहीं है । जब अपने आप अपने हाथों से ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी जाती है तो उसके परिणाम यही आते हैं कि व्यक्ति अपनी निजता को , अपनी पहचान को , अपनी अस्मिता को भूल जाता है ।

गांधी जी कांग्रेस के आदर्श हैं । उन्हीं के आदर्श चिंतन को लेकर कांग्रेस आगे बढ़ती रही है । उनका भारतीय संस्कृति के विषय में क्या चिंतन था ? यह बहुत विचारणीय है ।

17 जुलाई 1937 को गांधीजी ने ‘हरिजन ‘ में लिखा था कि मुझे अबूबकर और उमर सद्दीकी की कहानियां कह लेने दीजियेगा। कोई राम और कृष्ण की सादगी के बारे में कह सकता है। परंतु ये उस समय के नाम हैं जिसकी तवारीख का हमें पता नहीं है। इसलिए इन्हें मिसाल के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता। तवारीख बताती है कि शिवा और प्रताप बहुत सादगी से जीवन बिताते थे, परंतु इस विषय में इखतलाफ हो सकता है। ताकत के मद में आकर उन्होंने क्या नहीं किया? अगर कोई ऐसे व्यक्ति हैं, जिन पर कोई उंगली नहीं उठा सकता, तो वे अबूबकर और उमर हैं। इनको मैं सादगी के तौर पर पेश करता हूं।

गांधी जी का राम-कृष्ण के प्रति, रामायण और गीता के प्रति, महाराणा प्रताप और शिवाजी के प्रति कैसा चिंतन था, यह उनके उपरोक्त उद्वरण से स्पष्ट हो जाता है। उनके इसी चिंतन ने डा. जाकिर हुसैन जैसे लोगों के माध्यम से वर्धा स्कीम तैयार कराई। इन लोगों ने आजादी से पहले ही आजाद भारत की जिस शिक्षा नीति को अपनाने का सूत्रपात किया उसमें भारतीय संस्कृति के नाश के बीज छिपे पड़े थे। जिस समय यह शिक्षा योजना लायी गयी उस समय भारत में हिंदू 67.7 फीसदी था। शेष में मुसलमान थे, जिनमें ईसाईयों का अनुपात एक प्रतिशत से भी कम था। उस समय भारत के बंटवारे की बातें चल रही थीं। द्वितीय विश्वयुद्घ छिड़ चुका था। मुसलमानों की ओर से निरंतर विभाजन की मांग बढ़ती ही जा रही थी। तब तुष्टिकरण का खेल खेलते हुए गांधी ने वर्धा स्कीम बनवाई, जिसमें हिंदू संस्कृति का सत्यानाश कर दिया गया था। जिसके कुपरिणाम हमारा देश आज तक भुगत रहा है।

भारत की हिंदू संस्कृति का नाश करने के दृष्टिकोण से लाई गई इसी वर्धा शिक्षा योजना का परिणाम रहा कि यहां पर उस सिकंदर को महान कहा गया जिसने अब से 2300 वर्ष पूर्व इस देश की सीमाओं के साथ छेड़छाड़ की और उसके पाप का फल उसे चखाने वाले उन हिंदू योद्धाओं को भुला दिया गया जिनके बुझे हुए तीर के कारण उसे बुखार चढ़ा और वह मर गया । चंद्रगुप्त व चाणक्य के राष्ट्रवन्द्य कार्य को भुला दिया गया जिसके चलते उन्होंने उस समय देश की एकता और अखंडता के लिए घोर परिश्रम किया । उस अशोक को महान कहा गया ,जिसने अपने अनेकों परिजनों को मारकर सत्ता पर बलात अपना नियंत्रण स्थापित किया ।

इसी प्रकार उस कामपिपासु और व्यभिचारी अकबर को महान कहा गया , जिसने अपने हरम में 5000 हिंदू महिलाओं को भर लिया और इसके उपरांत भी उसकी कामपिपासा बुझी नहीं । वह हर सप्ताह दिल्ली में लड़कियां खरीदने के लिए मीना बाजार लगाता था । ऐसे चरित्र भ्रष्ट , धर्मभ्रष्ट , पथभ्रष्ट लोगों को इतिहास ने महान कहा और उन महाराणा प्रताप व शिवाजी को भुलाने का प्रयास किया गया जिनके बारे में गांधी जी ने कहा था कि उन्होंने कौन सा ऐसा पापकार्य नहीं था जो नहीं किया था , अर्थात गांधीजी की दृष्टि में राणा प्रताप और शिवाजी पापी थे और पापी अकबर महान था । इसी सोच से यह देश आज भी संचालित हो रहा है । इसलिए इतिहास का पुनर्लेखन समय की आवश्यकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक उगता भारत

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