गोकरुणानिधि पुस्तक ऋषि दयानंद के सच्चा गौ भक्त होने का प्रमाण है

ओ३म्

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ऋषि दयानन्द वेदों के मर्मज्ञ विद्वान, वेदमन्त्रों के द्रष्टा एवं भाष्यकार होने सहित एक सच्चे एवं आदर्श मनुष्य वा महापुरुष थे। वह वेदोद्धारक, धर्माचार्य, धर्म के सिद्धान्तों को तर्क की तराजू पर तोल कर प्रस्तुत करने वाले देवपुरुष भी थे। तर्क-युक्ति से रहित, मनुष्य समाज के लिए अहितकर तथा समाज के किसी एक वर्ग का स्वार्थ सिद्ध करने वाली मान्यताओं के विरोधी होने सहित वह एक सच्चे समाज सुधारक एवं अन्धविश्वासों के उन्मूलक थे। ऋषि दयानन्द ने समाज के सभी वर्गों स्त्री, पुरुष, ज्ञानी, अज्ञानी, देवता व राक्षस, देशभक्त एवं देशद्रोहियों आदि के प्रति न्यायपूर्ण एवं सन्तुलित विचार व्यक्त किये। आज का आधुनिक समाज ऋषि दयानन्द के विचारों का ऋणी है। ऋषि दयानन्द ने जहां नारियों को उनके सभी वैध अधिकार प्रदान कराये, उन्हें बाल विवाह व बेमेल विवाह से बचाया, विधवाओं से मानवीय व्यवहार करने की प्रेरणा की, दलितों को अस्पर्शयता से मुक्त किया, दलितों व स्त्रियों को वेदाध्ययन सहित समान रूप से शिक्षा का अधिकार दिया, राजा व प्रजा के कर्तव्यों पर प्रकाश डाला, वहीं उन्होंने वेदों की उत्तमोत्तम शिक्षाओं से युक्त आधुनिक समाज बनाने का सूत्रपात भी किया था। उनके जैसा मनुष्य विगत पांच हजार वर्षों में अन्य नहीं हुआ। उन्हें देखकर तो स्पष्ट लगता है कि वह ऐसे मनुष्य हुए हैं जो न तो भूतकाल में हुआ और न भविष्यकाल में होगा।

इस देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि देश में ईश्वरीय ज्ञान वेद को मानने वाले लोग भी अपनी अविद्या व अन्य दोषों के कारण नारियों, गाय, बकरी, अश्व आदि हितकारी पशुओं सहित मनुष्य समाज के एक महत्वपूर्ण अंग को दलित बनाकर उन पर लम्बे समय तक अत्याचार करते रहे। आज भी यह लोग व पशु आदि अत्याचार से मुक्त नहीं हुए। सभी मतों में यह अज्ञानता व दोष पाया जाता है। नारियों को मध्यकाल में शिक्षा प्राप्त करने सहित वेदाध्ययन का अधिकार नहीं था और न ही पुरुषों के समान इनकी शिक्षा का प्रबन्ध था। गाय, बकरी तथा अश्व आदि पशु मनुष्य के अनेक प्रयोजनों को पूरा करते हैं। परमात्मा ने उन प्रयोजनों यथा दुग्ध, गोबर, खाद, गोमूत्र आदि के लिये गाय, इसी प्रकार ओषधियुक्त दुग्ध के लिये बकरी को तथा अश्व को रथों आदि में उपयोग कर गमनागमन करने के लिये बनाया था। लेकिन हमारे देश व विदेशों के ज्ञानी व समझदार लोगों ने इनकी हत्या करना अनुचित नही माना। हत्या का प्रयोजन अत्यधिक अनुचित था। इन्हें अपनी जीभ के स्वाद के लिये मारा जाता रहा है। इन पशुओं को हत्या से कितनी पीड़ा होती है, इसका किसी धर्मगुरु, मत प्रवर्तक तथा मांसाहारी मनुष्य ने शायद ही कभी विचार किया हो? ऐसे मनुष्य को मनुष्य कहना भी उचित नहीं है। जिस मनुष्य के अन्दर मनुष्यता वा हितकारी पशुओं के प्रति दया, प्रेम एवं करूणा के भाव नहीं हैं, उन्हें किस आधार पर मनुष्य कहा जा सकता है। यह लोग या तो कर्मफल सिद्धान्त को जानते नहीं और यदि जानते हैं तो उसकी परवाह नहीं करते। आज जो मनुष्य निर्दोष पशुओं को अपनी जिह्वा के स्वाद के लिये मांसाहार करते हैं, इस संसार को बनाने वाला सृष्टिकर्ता उनको इसका दण्ड अवश्य देगा। सम्भव है कि यह सब मरने के बाद मांसाहारियों मनुष्यों के निकट ही उन्हीं पशु योनियों में उत्पन्न हों और वह दुःख झेले वा अनुभव करें जो इन्होंने अपने पूर्वजन्म में अपने समान पशुओं को दिये थे। यही न्याय है। यदि ऐसा नहीं है तो फिर ईश्वर को मानने की कोई आवश्यकता नहीं है। विचार करने पर ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है और यह भी सिद्ध होता है कि वह न्यायकारी एवं सब जीवों के कर्मों का साक्षी है। उसकी न्याय एवं दण्ड व्यवस्था से कोई मनुष्य व जीव बच नहीं सकता। प्रत्येक मांसाहारी मनुष्य को मांसाहार करते हुए प्रथम कर्मफल व्यवस्था विषयक इस प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक को अर्थ सहित बोल लेना चाहिये। श्लोक है ‘अवश्यमेव ही भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभं’। उन्हें कहना चाहिये ‘हे ईश्वर! आप सब प्राणियों के सभी कर्मों के साक्षी हैं। मैं जो मांसाहार कर रहा हूं इसका न्यायपूर्वक फल सुख व दुःख मुझे अवश्य मिलेगा। मैं उस फल को भोगने के लिये सहमत या तैयार हूं।’

वेदों ने गाय को अवध्य बताया है। किसी भी स्थिति में गाय को मारना अनुचित अथवा पाप है। वेदों ने गाय को विश्व की माता कहा गया है। विश्व की माता का अर्थ विश्व के सभी मनुष्यों की माता है। वस्तुतः गाय अपने दुग्ध से मनुष्य को न केवल शैशवास्था में अपितु बाल, किशोर, युवा व वृद्ध अवस्था में रोगरहित एवं बलवर्धक पोषण देती है। देशी गाय का दुग्ध पीने वाले लोग बहुत कम रोगी होते हैं, वह औरों से अधिक बलशाली एवं दीर्घजीवी भी होते हैं। गाय का पालन करने से मनुष्य को पुण्य लाभ होता है जिसका परिणाम उसे व उसके सभी परिवारजनों को जन्म-जन्मान्तरों में सुख के रूप में प्राप्त होता है। गाय का दुग्ध व दुग्ध से बने पदार्थ दही, छाछ, मक्खन, घृत, पनीर, मावा आदि मांस से कहीं अधिक स्वादिष्ट एवं स्वास्थ्य एवं बलवर्धक होने सहित आयुवर्धक भी होते हैं। यही कारण था कि राम व कृष्ण व उनके पूर्वज गोपालक थे। हम तो यह भी अनुमान करते हैं कि राम राज्य में यदि कोई गो की हत्या करता होगा तो उसे मृत्यु दण्ड से कम दण्ड नहीं मिल सकता था। आजकल एक चिकित्सा चली है जिसमें रोगीजन गाय पर हाथ फेरकर स्वस्थ होते हैं। विशेषज्ञ बता रहे हैं कि ऐसा करने से तनाव तथा अवसाद आदि अनेक रोग ठीक हो जाते हैं। ऋषि दयानन्द ने कहा है कि परमात्मा ने सृष्टि के सभी पदार्थ एक व अनेक प्रयोजन सिद्ध करने के लिये बनाये हैं। सृष्टि के पदार्थों से वही प्रयोजन सिद्ध करने चाहियें। मांस बिना पशुओं की हिंसा वा हत्या एवं उनको दुःख दिये प्राप्त नहीं होता। इससे पशु व पक्षियों आदि को ईश्वर-प्रदत्त जीने का अधिकार छीनता है तथा पर्यावरण को हानि होती है। अतः ऐसे कृत्य को जारी रखना उचित नहीं है। हमारे पास एक विदेशी लगभग पांच वर्ष की कन्या का एक वीडीयो है जिसमें वह प्रश्नकर्ता को बता रही है कि वह किसी भी स्थिति में किसी पशु पक्षी व मछली आदि के मांस का सेवन नहीं करेगी चाहे वह मर क्यों न जाये। वह बच्ची कहती है कि वह ऐसा इसलिये कह रही है क्योंकि मांस के लिये पशुओं आदि को मारा जाता है जिससे उन्हें पीड़ा व कष्ट होता है। इस बच्ची की भाव भंगिमा बता रही है कि इसे यह बातें बोलने के लिये उसे इसका अभ्यास नहीं कराया गया है। वह जो कह रही है वह अपने मन व हृदय की भावनाओं के अनुरूप कह रही है। आश्चर्य होता है कि एक पांच वर्ष की यूरोप की कन्या को इन पशुओं की पीड़ा की चिन्ता है परन्तु हमारे अन्य पढ़े लिखे व अनेक मत-सम्प्रदायों के लोगों को इसका न तो ज्ञान नहीं है और न उन्हें इनकी पीड़ा की चिन्ता है।

ऋषि दयानन्द ने सभी उपयोगी पशुओं की हत्या के लिये मांसाहार को मुख्य कारण माना है। इसलिये उन्होंने अपने समय में गोहत्या के विरुद्ध कानून बनाने के लिये एक आन्दोलन चलाया था। उन्होंने देश भर में आर्यसमाज के अधिकारियों को ज्ञापन भेज कर गोहत्या बन्द करने के समर्थन में लाखों व करोड़ों लोगों के हस्ताक्षर कराने की प्रेरणा की थी। इस कार्य में वह निजी रूप से प्रयत्नशील थे। अनेक बड़े अंग्रेज अधिकारियों से भी वह गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने के लिये मिले थे। वह ऋषि दयानन्द के तर्कों से सहमत भी हुए थे। उन्होंने ज्ञापन का जो प्रारूप तैयार किया था उसे इंग्लैण्ड की साम्राज्ञी महारानी विक्टोरिया को भेजने की योजना थी। दुर्भाग्य से इस काम को करते हुए ही उनका विष देकर उनका जीवन समाप्त कर दिया गया। गोरक्षा के उपाय करने के लिये उन्होंने ‘गो-कृषि आदि रक्षिणी सभा’ का गठन कर उसके नियम भी बनाये थे। उनके समय में ही रिवाड़ी में एक गोशाला भी खोली गई थी। सम्भवतः आज भी वह गोशाला चल रही है। स्वामी दयानंद जी ने जो गोकरूणानिधि पुस्तक लिखी है वह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस पुस्तक का एक एक शब्द पठनीय है। इस पुस्तक में गो व बकरी से होने वाले लाभों का उन्होंने आर्थिक आधार पर महत्व बताया है। एक गाय की एक पीढ़ी से एक समय में लगभग 4.10 लाख लोगों की एक समय की क्षुधानिवृत्ति वा भरपेट भोजन होता है। गाय का दूध शरीर के हर अंग आंख, कान, नाक, जिह्वा, मस्तिष्क, बुद्धि, हृदय, उदर आदि को पुष्ट करता है। गोदुग्ध के समान एलोपैथी या अन्य किसी पैथी में कोई ओषधि नहीं है जिससे गोदुग्ध जितने लाभ होते हों। अतः गोदुग्ध के लिये गोरक्षा करना व गोवध को रुकवाना हमारा परम पुनीत कर्तव्य व धर्म है।

हम यहां गोकरुणानिधि पुस्तक की भूमिका से ऋषि दयानन्द लिखित कुछ शब्द प्रस्तुत कर रहे हैं। वह लिखते हैं ‘वे धर्मात्मा विद्वान लोग धन्य हैं, जो ईश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव, अभिप्राय, सृष्टि-क्रम, प्रत्यक्षादि प्रमाण और आप्तों के आचार से अविरुद्ध चलके सब संसार को सुख पहुंचाते हैं और शोक है उन पर जो कि इनसे विरुद्ध स्वार्थी, दयाहीन होकर जगत् की हानि करने के लिए वर्तमान हैं। पूजनीय जन वो हैं जो अपनी हानि हो तो भी सबका हित करने में अपना तन, मन, धन सब-कुछ लगाते हैं और तिरस्करणीय वे हैं जो अपने ही लाभ में सन्तुष्ट रहकर अन्य के सुखों का नाश करते हैं। सृष्टि में ऐसा कौन मनुष्य होगा जो सुख और दुःख को स्वयं न मानता हो? क्या ऐसा कोई भी मनुष्य है कि जिसके गले को काटे वा रक्षा करें, वह दुःख और सुख को अनुभव न करे? जब सबको लाभ और सुख ही में प्रसन्नता है, तब विना अपराध किसी प्राणी का प्राण वियोग करके अपना पोषण करना सत्पुरुषों के सामने निन्द्य कर्म क्यों न होवे? सर्वशक्तिमान जगदीश्वर इस सृष्टि में मनुष्यों के आत्माओं में अपनी दया और न्याय को प्रकाशित करे कि जिससे ये सब दया और न्याययुक्त होकर सर्वदा सर्वोपकारक काम करें और स्वार्थपन से पक्षपातयुक्त होकर कृपापात्र गाय आदि पशुओं का विनाश न करें कि जिससे दुग्ध आदि पदार्थों और खेती आदि क्रिया की सिद्धि से युक्त होकर (प्रचुर मात्रा में गोदुग्ध व कृषि से अन्न को प्राप्त होकर) सब मनुष्य आनन्द में रहें।’

गोरक्षा के समर्थन में ऋषि दयानन्द के अनेक महत्वपूर्ण विचार हैं। स्थानाभाव के कारण हम उन्हें छोड़ रहे हैं। यह हमारा कैसा दुर्भाग्य है कि आज नगरों में किसी कीमत पर भी देशी गाय का दुग्ध उपलब्ध नहीं है। शराब की बोतले तो सभी सरकारें जनता को पिलाती रही हैं परन्तु कोई सरकार इच्छुक लोगों को देशी गाय का शुद्ध दुध उपलब्ध कराने में सफल नहीं हो रही है। वह इसकी आवश्यकता भी नहीं समझती। इसका कारण यह है कि गोदुग्ध के प्रेमी सरकारों के वोट बैंक नहीं है। यदि वोट बैंक कहे जाने वाले लोग गोदुग्ध की मांग करते तो सरकार हर कीमत पर उसकी व्यवस्था करती। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह गोमाता सहित अन्य हितकारी पशुओं की मांसाहार के कारण हत्या करने वालों को अपने विधान के अनुसार उचित न्याय वा दण्ड प्रदान करे। ऋषि दयानन्द ने गोरक्षा सहित सभी पशुओं पर दया करने व उनकी किसी प्रकार से हिंसा न करने का जो प्रचार किया उसके कारण वह समस्त मानवजाति की ओर से अभिनन्दन के पात्र हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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