18 57 में ही फट गई थी क्रांतिकारी आर्य समाज की पौ

1857 की क्रांति न केवल भारत के राष्ट्रीय इतिहास के लिए अपितु आर्य समाज जैसी क्रांतिकारी संस्था के लिए भी एक महत्वपूर्ण वर्ष है । इस समय भारत के उस समय के चार सुप्रसिद्ध संन्यासी देश में नई क्रांति का सूत्रपात कर रहे थे। इनमें से स्वामी आत्मानंद जी की अवस्था उस समय 160 वर्ष थी। जबकि स्वामी आत्मानंद जी के शिष्य स्वामी पूर्णानंद जी की अवस्था 110 वर्ष थी । उनके शिष्य स्वामी विरजानंद जी उस समय 79 वर्ष के थे तो महर्षि दयानंद की अवस्था उस समय 33 वर्ष थी।

बहुत कम लोग जानते हैं कि इन्हीं चारों संन्यासियों ने 1857 की क्रांति के लिए कमल का फूल और चपाती बांटने की व्यवस्था की थी ।

कमल का फूल बांटने का अर्थ था कि जैसे कीचड़ में कमल का फूल अपने आपको कीचड़ से अलग रखने में सफल होता है , वैसे ही हमें संसार में रहना चाहिए अर्थात हम गुलामी के कीचड़ में रहकर भी स्वाधीनता की अनुभूति करें और अपने आपको इस पवित्र कार्य के लिए समर्पित कर दें । गुलामी की पीड़ा को अपनी आत्मा पर न पड़ने दें बल्कि उसे एक स्वतंत्र सत्ता स्वीकार कर स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए साधना में लगा दें।

इसी प्रकार चपाती बांटने का अर्थ था कि जैसे रोटी व्यवहार में और संकट में पहले दूसरे को ही खिलाई जाती है , वैसे ही अपने इस जीवन को हम दूसरों के लिए समर्पित कर दें । हमारा जीवन दूसरों के लिए समर्पित हो जाए , राष्ट्र के लिए समर्पित हो जाए ,लोगों की स्वाधीनता के लिए समर्पित हो जाए। ऐसा हमारा व्यवहार बन जाए और इस व्यवहार को अर्थात यज्ञीय कार्य को अपने जीवन का श्रंगार बना लें कि जो भी कुछ हमारे पास है वह राष्ट्र के लिए है , समाज के लिए है , जन कल्याण के लिए है।

इस सर्वजन हितकारी नियम को भारत की आध्यात्मिक परंपरा ही समझ सकती है कि इसका वास्तविक अर्थ क्या है ? इसे आध्यात्मिक परंपरा के प्रतीक राष्ट्रपुरुष योगीजन ही जनता के लिए एक संदेश के रूप में प्रचारित प्रसारित कर सकते हैं ।

यह एक दुर्लभ संयोग था कि देश के चार ऋषि 1857 की क्रांति के समय वैसे ही खड़े थे जैसे सृष्टि प्रारंभ में अग्नि , वायु ,आदित्य व अंगिरा खड़े थे यानी नए युग का शुभारंभ कर रहे थे। मानो इन चारों ऋषियों के अंतः करण में ही ईश्वर ने स्वतंत्रता का ज्ञान देकर मां भारती की गुलामी की बेड़ियों को काटने की प्रेरणा दी।

हमारे इन चारों ऋषियों के कमल और रोटी बांटने के आध्यात्मिक संदेश को हमारे क्रांतिकारियों ने अंगीकृत कर लिया था । उन्होंने संसार में रहकर भी संसार से अलग रहने की सौगंध उठा ली और चपाती की भांति ही अपना जीवन बना लिया। 1857 में यद्यपि आर्य समाज की स्थापना नहीं हुई थी , परंतु वह संस्कार रूप में देश के हिरण्यगर्भ में निर्मित तो हो ही रहा था । तब उसके इस संस्कार ने यह स्पष्ट कर दिया था कि निकट भविष्य में वैसे ही एक महान घटना आर्य समाज की स्थापना के रूप में होगी जैसे पौ फटने के पश्चात सूर्य उदय होता है और वह फिर समस्त संसार के अंधकार को हर लेता है।

यह भी एक संयोग ही था कि 57 के अंक को यदि उल्टा कर दें तो 75 हो जाता है ।1857 के सही 18 वर्ष पश्चात देश में आर्य समाज की स्थापना हुई अर्थात सूर्योदय हो गया। यह ऐसे ही नहीं कहा जाता कि भारत की स्वाधीनता में आर्य समाज का सबसे प्रमुख योगदान रहा ? इतिहास को सही संदर्भ और सही अर्थों के साथ तथ्यात्मक ढंग से समझने की आवश्यकता है।

आर्य समाज के इस सूर्योदय ने देश में गुलामी के छाए हुए अंधकार को हरण कर लिया और रोटी व चपाती बांटने का वह संदेश 1947 में उस समय साकार हो उठा जब अंग्रेज को यहां से हमारे क्रांतिकारी आंदोलन से भयभीत होकर भागना पड़ा।

सृष्टि के आदि ऋषियों का तो हमें ऋणी होना ही चाहिए , साथ ही हमें 1857 की क्रांति की बुनियाद रखने वाले इन चारों ऋषियों के प्रति भी कृतज्ञ होना चाहिए ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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