दिग्गी राजा और भारत की विधि व्यवस्था

आजकल हमारे देश में ऐसे लोग कानून की बात करते हैं जिन्हें कानून का क , ख , ग पता नहीं होता , इसी प्रकार ऐसे लोग भी हमारे देश में पर्याप्त हैं जो चिकित्सा विज्ञान के विषय में कुछ भी नहीं जानते परंतु दूसरों को उनकी बीमारियों का उपचार बताते रहते हैं । इतना ही नहीं कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो दूसरों के हाथों की लकीरों को देखकर उनके बारे में भविष्यवाणी करते दिखाई देते हैं अर्थात ज्योतिषी का कार्य भी करते हुए देखे जाते हैं ।
वास्तव में यह तीनों प्रकार के लोग ही समाज के लिए अच्छे नहीं कहे जा सकते और जब समाज ऐसे लोगों के कारण दिशा लेने लगता है तो उस समय देश का नैतिक पतन होना आरंभ हो जाता है । अधिवक्ता अधिवक्ता इसलिए नहीं है कि उसे किसी व्यक्ति या किसी संस्था ने अपनी ओर से अधिकृत वक्ता के रूप में बोलने के लिए नियुक्त कर दिया है , अपितु वह अधिवक्ता इसलिए है कि वह वही अधिकृत और न्यायसंगत बात रखेगा जिसके लिए न्याय उसे अधिकृत करता है । समझो कि वह न्याय का प्रवक्ता है । वह विधिवेत्ता है , और विधि जिस प्रकार उसे न्याय तक ले जाए वह उस बात को न्यायालय के समक्ष रखने का प्रयास करता है । इस प्रकार अधिवक्ता केवल अपने व्यवहारी अर्थात मुवक्किल को येन केन प्रकारेण जिताने की किसी अप्रत्यक्ष अनिवार्य शर्त से बंधा हुआ नहीं है , अपितु वह समाज के प्रति इस न्याय सिद्धांत से भी बंधा हुआ है कि वह ऐसा कोई कार्य न तो करेगा और न होने देगा जिसके होने से समाज की व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़े। इस संबंध में निम्नलिखित श्लोक अवलोकनीय है –

ज्योतिषं व्यवहारंच प्रायश्चित्तं चिकित्सितं।अजानन् यो नरो ब्रूयात् अपराधं किं अतः परं।।

यह श्लोक बृहद पराशर स्मृति में हमारे भारतीय प्राचीन ग्रंथ में लिखा हुआ है । इस श्लोक में बताया गया है कि समाज और पूरी व्यवस्था के विरुद्ध यह एक गंभीर अपराध होगा कि कोई व्यक्ति अपने विषय का पर्याप्त और गंभीर ज्ञान रखे बिना अर्थात उसमें पूर्ण दक्षता प्राप्त किए बिना अधिवक्ता , ज्योतिषी या एक चिकित्सक का कार्य करने लगे ।
परंतु आज हम देख रहे हैं कि राजनीतिक पार्टियों ने भी अपने-अपने अधिवक्ता नियुक्त कर दिए हैं । इन अधिवक्ताओं के पास कोई डिग्री नहीं होती , कोई दक्षता नहीं होती , कोई योग्यता नहीं होती, परंतु इस सब के उपरांत भी यह समाज में मंचों पर खड़े होकर खुले में अपने भाषणों के माध्यम से दूसरों को अपराधी सिद्ध कर देते हैं । इससे समाज की व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है । एक उदाहरण के रूप में हम कांग्रेस के नेता दिग्विजयसिंह को ले सकते हैं । जिन्होंने अभी कुछ समय पहले ही कहा है कि भगवा धारी व्यक्ति बलात्कारी होता है। इसमें आपराधिक मनोवृत्ति को झलकाने वाला एक संदेश निहित है ।
कांग्रेस के इस नेता को यह किसने बता दिया और कौन से आधारों पर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि भगवाधारी व्यक्ति बलात्कारी होता है ?
शुद्ध दृष्टिकोण से यदि देखा जाए तो ऐसा कहने का अधिकार तो किसी अधिवक्ता को भी नहीं है , यद्यपि अधिवक्ता अपने व्यवहारी के बचाव में न्यायिक सिद्धांतों की मर्यादा में रहते हुए हर प्रकार के तर्क देने का प्रयास करता है । इसके उपरांत भी वह न्यायालय से बाहर निकलकर दावे के साथ यह नहीं कह सकता कि अमुक व्यक्ति अपराधी है और मेरा व्यवहारी अपराधी नहीं है।
राजनीति में अपने विरोधी पर आरोप लगाना एक बात है और अपने विरोधी विचारधारा के लोगों , सत्ता प्रतिष्ठान में बैठे लोगों या उनके समर्थक लोगों को या उनकी विचारधारा को पोषित करने वाले जन सामान्य में से किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति को दोषी के रूप में स्थापित करने का प्रयास करना एक अलग बात है।
दिग्विजय सिंह जैसे लोग भारतीय राजनीति के स्तर को गिराने वाले लोग हैं, जो आरोप नहीं लगाते हैं अपितु किसी भी व्यक्ति को दोषसिद्ध करते हैं । भारतीय लोकतंत्र के लिए दिग्विजय सिंह जैसे राजनीतिज्ञों की ऐसी प्रवृत्ति बहुत ही खतरनाक है। यह दुष्प्रवृत्ति हमारे आने वाली पीढ़ी के लिए घातक सिद्ध होगी व मानव समाज के लिए अभिशाप होगी। भगवा में छुपा हुआ कोई व्यक्ति अपराधी हो सकता है , उसकी सोच निम्न हो सकती है , उसका दृष्टिकोण संकीर्ण हो सकता है , परंतु सारे भगवाधारी लोगों को एक साथ एक लाठी से हांकने का प्रयास करना समाज के साथ और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ करने जैसा है । दिग्विजय सिंह का ऐसा कहना तब और भी अधिक आपत्तिजनक हो जाता है जब वह किसी मौलवी या पादरी के विषय में ऐसा कुछ नहीं कहते हैं और उन्हें शांति व भाईचारे का पुजारी होने का प्रमाण पत्र सौंप देते हैं । बुराई सर्वत्र है तो इसके साथ-साथ यह भी मानना चाहिए कि अच्छाई भी सर्वत्र है । इस न्यायपरक दृष्टिकोण के साथ चिंतन करना और टिप्पणियां करना दिग्विजय सिंह जैसे लोगों के लिए अच्छा लगता है।
किसी राज्य का मुख्यमंत्री या केंद्र में मंत्री हो जाने का अभिप्राय यह नहीं है कि व्यक्ति अपने विषय में पारंगत है या कुशल है या दक्ष है । किसी भी व्यक्ति की कुशलता , दक्षता या पारंगत होने का उसका गुण तभी सार्थक दिखाई देता है जब वह न्यायपरक दृष्टिकोण अपनाये , अन्यथा ऐसे लोग व्यवस्था में एक कोढ़ ही होते हैं । लोग उनसे इसी प्रकार घृणा करते हैं जैसे कोढ़ से घृणा की जाती है । अब समय आ गया है जब भारतीय राजनीतिक लोगों के आचरण को सुधारने के लिए भी कठोर विधिक उपाय किए जाएं । इसके लिए राजनीतिज्ञों के लिए एक आचार संहिता लागू करनी आवश्यक है । इस आचार संहिता में यह अनिवार्य रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए कि यदि कोई भी राजनीतिक व्यक्ति अपने किसी भी विरोधी को या समाज के किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति , संस्थान आदि पर दोषसिद्धि की शैली में आरोप लगाता है तो उसके विरूद्ध कठोर कानूनी कार्यवाही होगी।
हमने ऊपर जिस श्लोक को उद्धृत किया है , उसकी व्यवस्था भी एक विधिक व्यवस्था है ।आज के कानून की दृष्टि में यह किसी धर्म ग्रंथ का एक श्लोक मात्र है, जबकि वास्तविकता यह है कि इसे भारत में विधिक व्यवस्था का एक अनूठा और उत्कृष्ट उदाहरण कहा जा सकता है । हमारी सारी की सारी विधिक व्यवस्था इन्हीं जैसे श्लोकों में अंतर्निहित है । जिन्हें आज के परिप्रेक्ष्य में पठनीय घोषित किया जाना आवश्यक है। जिससे कि विधिक और नैतिक दोनों व्यवस्थाओं में सुधार हो सके। यदि ऐसा होता है तो निश्चित ही दिग्विजय सिंह जैसे लोगों की बोलती अपने आप बंद हो जाएगी ।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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