शिवाजी ने अपने कृतित्व से सिद्घ किया कि वह उस समय के नायक थे

शिवाजी के राज्य विषयक सिद्घांत
शिवाजी के राज्य विषयक सिद्घांत ‘आज्ञापत्र’ या ‘शिवराज की राजनीति’ से स्पष्ट होते हैं। उसके अध्याय 3 में कहा गया है-”परस्पर विरोध उत्पन्न होकर जिससे विनाश हो ऐसा नही करना चाहिए। सकल प्रजा सुरक्षित और संरक्षित रहनी चाहिए। धर्म पथ-प्रवत्र्तक बनना चाहिए। इस प्रजा की करूणा के लिए ईश्वर ने संपूर्ण कृपानुग्रह से हमें राज्य दिया है। इस ईश्वर आज्ञा का प्रयोग अन्यथा करने से ईश्वर का क्षोभ होगा। यह संपूर्ण भय चित्त में रखकर राज्य मदारूढ़ न होकर सब समय के लिए अप्रमत्त होकर प्रजाहित कार्य में प्रस्तुत होना चाहिए।”
‘आज्ञापत्र’ की इन पंक्तियों का एक-एक शब्द बड़ी सावधानी से रखा गया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि प्रजाजनों के मध्य परस्पर विरोध उत्पन्न करने वाली और असमानता के भाव को प्रकट करने वाली नीतियों से शासक और शासन को बचना चाहिए। यह उस समय की मुगलों की उस शासकीय नीति के सर्वथा विपरीत धारणा और नीति थी जिसमें वे लोग जनता के मध्य विरोध को बढ़ाने वाली नीतियों का अनुकरण करते थे। उन नीतियों का परिणाम यही आ रहा था कि जनता में परस्पर प्रेमभाव और सदभाव समाप्त हो रहा था। इसलिए शिवाजी ने अपने राज्यारोहण के पश्चात वास्तविक पंथ निरपेक्ष शासन की प्राचीन भारतीय राजनीतिक प्रणाली को अपने लिए उचित माना और प्रत्येक प्रजाजन को उसके निजी विश्वास और मत को शासन की मान्यता प्रदान की। इससे शिवाजी अपने सभी प्रजाजनों के विश्वास को जीतने में सफल रहे।
हिन्दुत्व का मानवतावाद शिवाजी के लिए आदर्श था
शिवाजी यह भली भांति जानते थे कि इस्लाम और हिंदुत्व का आध्यात्मिक दर्शन सर्वथा विपरीत दिशा में बहता है। हिंदुत्व का वैदिक दर्शन जहां निरे मानवतावाद को अपना आदर्श मानता है, वहीं इस्लामिक दर्शन में मानवतावाद अपने लोगों के लिए ही है। कहने का अर्थ है कि इस्लामिक भ्रातृत्ववाद मताग्रही है। इसी बात को अब्दुल रहमान अज्जम के शब्दों में स्पष्टत: समझा जा सकता है। वह कहते हैं : ”इस्लाम मुसलमानों और मूत्र्ति पूजकों में भेद करता है, जिन्हें सम्मान के योग्य नही समझा जाता है….दया और भ्रातृत्व केवल मुसलमानों के लिए हैं…जब मुसलमान काफिरों के विरूद्घ युद्घ करते हैं तो यह भी इस्लाम के मानव भ्रातृत्ववाद के अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्घांत के अनुकूल ही होता है। मुसलमानों की दृष्टि में बहुतदेवतावाद अत्यंत निकृष्ट व्यवहार है। मुसलमान की आत्मा, बुद्घि और नियति बहुदेवतावादी को अल्लाह के कोप से बचाने के साथ जुड़ी है। यद्यपि वह काफिर से मानव बंधुत्व का नाता स्वीकार करता है, वह उसको तब तक प्रताडि़त करता है, जब तक कि वह अल्लाह में विश्वास लाकर अपने पुराने धर्म (खुदा की अनेकता और पैगंबर के प्रति अविश्वास) को त्याग न दें अर्थात इस्लाम स्वीकार न करे।”
 एम.आर.ए. बेग इसी बात को इस प्रकार कहते हैं=”इस्लामिक समानतावाद केवल मुस्लिमों के लिए है और इस्लाम इतना एक पक्षीय है कि वह मुसलमानों के गैर मुस्लिमों के साथ सहअस्तित्व की अनुमति तब तक नहीं देता, जब तक कि वह उन्हीं शर्तों पर रहना स्वीकार न करें। इसलिए वह केवल मुस्लिम देशों के लिए ही उपयुक्त है।”
इस्लाम का मताग्रही शासन शिवाजी को अस्वीकार्य था
शिवाजी ने मुगलों के इस माताग्रही शासन के स्वरूप को अपने निरे मानवतावादी शासन की स्थापना करके चुनौती दी। एक प्रकार से उन्हें समझाया कि हमारा स्वराज्य प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता का जीवन जीने देने के लिए है हम किसी भी व्यक्ति के मध्य साम्प्रदायिक आधार पर अंतर नही करेंगे। आज का इतिहास शिवाजी के चिंतन की और स्वराज्य स्थापना के उनके उद्देश्य की जितनी सारगर्भित व्याख्या प्रस्तुत कर सकेगा, उतना ही उस समय स्वराज्य के लिए संघर्ष कर रही हिंदू जनता के साथ न्याय कर सकेगा। वैसे भी इतिहास का मूल उद्देश्य किसी भी काल की जनता के संघर्ष को उचित स्थान देकर उनकी न्यायसंगत मांगों और अपेक्षाओं का सम्मान करना ही होता है।
आज का प्रचलित इतिहास भारत में हिंदू मुस्लिम वैमनस्य के वास्तविक आध्यात्मिक कारणों पर चिंतन करने से या तो बचता है, या उस पर चबाते -चबाते अपना चिंतन प्रस्तुत करता है। जबकि इस बात को विभाजन के समय डा. भीमराव अंबेडकर ने बड़े स्पष्ट शब्दों में तत्कालीन भारतीय नेतृत्व के समक्ष रखते हुए कहा था-”हिंदू मुस्लिम वैमनस्य के कारण भौतिक नहीं हंै। उसके कारण आध्यात्मिक हैं। उनकी ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विचारधारायें एक दूसरे के विपरीत बहती हैं। राजनीतिक वैमनस्य तो उस विरोध की परछाई मात्र है…..हिंदू और मुसलमानों के मध्य इस विरोध के स्थान पर एकता की आशा करना अस्वाभाविक है, दूसरे शब्दों में इस्लाम कभी इस बात की इजाजत नही दे सकता कि ‘एक सच्चा मुसलमान’ भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना रिश्ते नातेदार स्वीकार करे।”
शिवाजी को मिलना चाहिए एक उचित स्थान
शिवाजी ने मुगल शासकों की अनुदारवादी और धार्मिक असहिष्णुता की नीतियों का विरोध करते हुए स्वराज्य की स्थापना की। उनका प्रयास उस समय देश में एक ऐसी हिंदू क्रांति का बिगुल फूंकना था, जिसके माध्यम से वह प्रत्येक प्रकार की अनुदारता तथा असहिष्णुता को समाप्त करने का संकल्प लेकर आगे बढऩा चाहते थे। पर दुर्भाग्य इस देश का यह रहा कि शिवाजी के महान प्रयास को औरंगजेब की अनुदारता तथा असहिष्णुता की निंदनीय नीतियों के बोझ तले दबाकर रख दिया गया। आज हमें उनकी ऐसी मानवतावादी नीतियों की सिसकियां सुनाई देती हैं, जब कोई राष्ट्रभक्त उधर से निकलता है तो उसका ध्यान ये सिसकियां अनयास ही अपनी ओर खींच लेती हैं।….और उससे भावांजलि का, श्रद्घांजलि का और पुष्पांजलि का एक आलेख तैयार हो जाता है, पर ऐसे आलेख भी हमारे शिवाजी को उसका उचित सम्मानपूर्ण स्थान नहीं दिला पा रहे हैं। ऐसा केवल इसलिए है कि राजनीतिक नेतृत्व पूर्णत: इच्छाशक्ति विहीन रहा है।
इस देश में औरंगजेब के नाती संबंधियों ने ‘औरंगजेब’ उत्पन्न करने नही छोड़े और हमने शिवाजी के नाम पर अपनी परंपरागत झिझक नही छोड़ी। इससे ‘भगवा’ हमारे लिए ही एक अपराध हो गया है।
अपने समय में चूंकि शिवाजी ‘भगवाकरण’ की बातें कर रहे थे तो शिवाजी भी हमारे लिए झिझक का विषय बन गये। जबकि सच यह है कि शिवाजी का इतिहास साम्प्रदायिकता से संघर्ष करने का इतिहास है। उन्होंने अपने भाई व्यंकोजी को लिखे एक पत्र में कहा है-”मैं यह पत्र अपने पिता शाहजी की पांच लाख होण की संपदा के दो भाग करके आधे अढा़ई लाख तुमसे मांगने के लिए नहीं लिख रहा हूं। खानदेश, बरार, दौलताबाद आदि का मुल्क लूटकर हम उससे कर ले रहे हैं। हमारे राज्य में 180 दुर्गों पर ‘भगवा ध्वज’ है, हमारे पास 32,000 अपने अस्तबल के घोड़े हैं।”
शिवाजी ने 180 किलों पर भगवा ध्वज फहराया तो यह तभी संभव हो पाया था जब उन्होंने साम्प्रदायिकता के विरूद्घ विद्रोह किया। हमने उस साम्प्रदायिकता के गीत गाने आरंभ कर दिये तो हमसे मजहब के नाम पर देश को बांटते हुए और काटते हुए पहले पाकिस्तान गया, फिर बांगलादेश गया और कश्मीर का हिंदू आज तक गुलाम है, वह संघर्ष कर रहा है, पर उसके प्रति हम सभी संवेदनाशून्य हैं। क्यों हैं? क्योंकि हम अपने शिवाजी के प्रति संवेदनाशून्य हो गये।
शिवाजी का राज्य विस्तार
शिवाजी ने नवंबर 1677 तक व्यंकोजी को परास्त कर दिया था और बीजापुर वालों का पाईन घाट का सारा प्रदेश प्राप्त कर लिया था। इस प्रदेश का कुल क्षेत्रफल दस हजार वर्गमील का था। इसके अतिरिक्त शिवाजी का विजय अभियान दक्षिण में मद्रास (चैन्नई) तक पहुंच गया था। लिखा है-”मद्रास की शिवाजी की छावनी बहुत सादी थी। दो मोटे खद्दर के तम्बू एक राजा के लिए, एक कचहरी के लिए और सारी छावनी खुले में। देवनापट्टण के डच व्यापारी जब शिवाजी से मिलने आये तो बड़े ठाटबाट के साथ शिवाजी के अधिकारियों ने उनसे खासी रकमें लीं, तभी वे छूट सके। शिवाजी जब मद्रास से लौट रहे थे, तो उनके नाम का इतना आतंक था कि मुसलमान किले छोडक़र भाग जाते, ऐसा अंग्रेज वात्र्ताकार कहते हैं।…..उत्तर कर्नाटक का बहुत बड़ा क्षेत्र शिवाजी ने स्वतंत्र करा लिया था। इस काम को कहां दत्ताजी त्रिबेंक वाकनीस ने पूर्ण किया था। शिवाजी ने जितने परिश्रम से अपना स्वतंत्र हिंदू राज्य खड़ा किया, उसका उदाहरण मिलना कठिन है। निस्संदेह उनका प्रयास सराहनीय था।”
शिवाजी का हिंदू नायक का राष्ट्रीय स्वरूप
शिवाजी हिंदू समाज के नायक थे और वह उस काल में दलित, शोषित और उपेक्षित हिंदू समाज की एक आवाज भी थे। हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों को देखकर उनकी आत्मा कराह उठती थी। उनकी राष्ट्रीय निर्माण की प्रबल इच्छा थी। जिसे उनका एक पत्र स्पष्ट करता है। यह पत्र उन्होंने 30 नवंबर 1679 को औरंगजेब के लिए लिखा था। इसमें लिखा था-
”शहंशाह आलमगीर को उनका खैरख्वाह शिवाजी ईश्वर की कृपा और आपकी सूर्यप्रकाश जैसी स्पष्ट मेहरबानी के लिए गहरी कृतज्ञता ज्ञापित करता है और आपको ससम्मान सूचित करता है कि मैं आपकी इजाजत लिए बिना चला आया यह मेरी बदनसीबी थी। पर अब मैं जैसी आप चाहें आपकी सेवा करने के लिए सहमत हूं। आपकी दयालुता का सबको पता लगे। मैं तो आपके हितैषी के नाते कुछ बातें आपके सामने रखता हूं।
हाल में मेरे कानों पर यह बात आयी है कि मुझसे युद्घ करने के कारण अब आपका खजाना खाली हो गया है। आप उसे पूरा करने के लिए हिंदुओं पर जजिया कर लगाने वाले हैं।
जहांपनाह, आपकी मुगलिया सल्तनत की नींव रखने वाले अकबर ने 50 वर्ष राज्य किया। उन्होंने वह उत्कृष्ट नीति अपनाई थी, जिससे उन्होंने ईसाई, यहूदी, हिंदू, दादूपंथी, मलकी अनीश्वरवादी, ब्राह्मण, जैन सब जमातों को अमन और समानता से देखा था। उनका उद्देश्य था-सबका कल्याण और सबकी सुरक्षा। इसीलिए वे जगदगुरू कहलाये। इस जगह से वे जिस दिशा में गये उधर सफलता और प्रतिष्ठता उनके मार्ग में थी।
उनके पश्चात नुरूद्दीन जहांगीर 22 वर्ष तक राज करते रहे। उन्होंने अच्छे काम करने में पूरी जिंदगी बितायी और अमर हुए। शाहजहां ने 32 वर्ष तक राज किया। उन्होंने अच्छे काम करके जीवन सफल किया। उनके राज्य शासन में कई सूबे तथा किले उनके अधिकार में आये। वे आज नहीं हैं, पर उनका अच्छा नाम और कीर्ति शेष है। उनकी महानता अवर्णनीय है। उनकी महानता का एक लक्षण यह है कि आलमगीर ने उनका अनुकरण करने का प्रयास किया, पर उसे कामयाबी नहीं मिल सकी। वह यह नहीं समझ पाता है कि ऐसा क्यों हुआ?
पहले के सम्राट भी चाहते तो जजिया लगा सकते थे। (यह पत्र वास्तव में शिवाजी ने हिन्दुओं पर बादशाह द्वारा जजिया लगाने की तैयारी करने की बात सुनकर ही लिखा था) पर वे यह मानते थे कि सब लोग चाहे छोटे हों या बड़े ईश्वर के पुत्र हैं, और सारे धर्म ईश्वर की पूजा के मार्ग हैं। उन्होंने धार्मिक विद्वेष की भावना को अपने मार्ग में नहीं आने दिया। (वास्तव में शिवाजी की यह कूटनीतिक भाषा थी) उनकी रहम और अच्छे कामों की याद अब भी सारी दुनिया में ताजी है। सभी बड़े छोटे लोग उनकी प्रशंसा करते हैं और उन्हें दुआ देते हैं। उनकी हुकूमत में जनता शांति और अमन में थी। लेकिन आपकी हुकूमत में कई सूबे और किले आपके हाथ से निकले जा रहे हैं। बचे हुए सूबे और किले भी आपके हाथ से निकल जाएंगे या आप खो देंगे। आपकी रिआया की माली हालत अच्छी नहीं है। आपके परगने और महालों की आमदनी रोज बरोज घटती जा रही है, जहां से पहले एक लाख मिलता था, वहां से एक हजार भी वसूल कर पाना कठिन हो गया है। राजे और राजपुत्रों को गरीबी ने मार दिया है। ……इस वक्त आपके सिपाही आपसे असंतुष्ट हैं। मुस्लिम कष्ट में हैं, और हिन्दू झुलस गये हैं। लोग रोटी के लिए तरस रहे हैं। उनके चेहरे लाल इसलिए हैं कि वे अपने ही हाथों से अपना मुंह पीट ले रहे हैं।
और जब प्रजा इतनी बुरी स्थिति में है तथा फिर भी आपने उन पर ऊपर से जजिया लगाया है, आप ऐसा कैसे कर सके? यह बुरी खबर पूरब से पश्चिम तक फैलेगी। लोग कहेंगे-हिंदुस्तान का शहंशाह भीख का कटोरा लेकर निकल पड़ा है, और ब्राह्मण, जैन, साधु, जोगी, संन्यासी, बैरागी, गरीब और भूखी जनता से जजिया वसूल रहा है, और इस पर उसे गर्व है। तैमूर के घराने का नाम उसने मिट्टी में मिला दिया। जनता की यह भावना गहरी होगी।
जहांपनाह कुरान में खुदा को रब्ब-उल-आलमीन कहा गया है। उसे रब्ब-उल-मुसलमीन नहीं कहा गया है। असल में इस्लाम और हिंदू धर्म एक ही दिव्य परमात्मा के दो सुंदर प्रकट रूप हैं। मस्जिद में अजान दी जाती है, मंदिर में घंटियां बजायी जाती हैं। जो कोई मजहबी कट्टरपन और धर्म द्वेष फैलाता है वह ईश्वर के आदेश के विरूद्घ काम करता है। इन तस्वीरों पर लकीरें खींचना उस दैवी कलाकार की कला को दोष देना है।
अगर आप सृष्टि में दोष निकालते हैं, तो आप सृष्टा को दोष देते हैं। ऐसा आप न करें। इस समय की बात यह है कि जजिया किसी भी हालत में ठीक नहीं कहा जा सकता है। यह हिंदुस्तान में एक नयी चीज है। यह नाइंसाफी है। अगर आप समझते हैं कि मजहब और इंसाफ के नाम पर कर लगाना आवश्यक है तो पहले आप राजा राजसिंह से वसूल कीजिए। वह हिंदुओं का नेता है। वह देगा तो आपके इस हितैषी से भी वसूल करना कठिन नही होगा।”
(संदर्भ : इस पत्र का एक अनुवाद जदुनाथ सरकार की अंग्रेजी में लिखित पुस्तक ‘शिवाजी’ में पृष्ठ 311 पर है, तथा दूसरा अनुवाद ताराबाई पेपर्स पर्शियन लैटर्स, कोल्हापुर की शिवाजी यूनिवर्सिटी के प्रकाशन की भूमिका में पृष्ठ 16 पर है)
शिवाजी महानता की हर कसौटी पर खरे उतरे
इस पत्र से स्पष्ट होता है कि शिवाजी हिन्दू हितों की रक्षार्थ कुछ भी करने को उद्यत रहते थे। उन्होंने औरंगजेब को शालीन भाषा में बता दिया कि निरीह प्रजा पर अत्याचार करके उससे कर लेने की आवश्यकता नहीं है यदि साहस है तो महाराणा राजसिंह और मुझसे कर लेकर दिखाओ?
किसी भी व्यक्ति की महानता की सबसे उत्तम कसौटी यही है कि उसके जीवित रहते उसके लोगों को उसका संरक्षण मिलने से आनंद मिला हो और उसके जाने के पश्चात लोग उसका नाम सम्मान से लेकर गौरव की अनुभूति करते हों। शिवाजी इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। दूसरी कसौटी है-व्यक्ति का जीवन किन्हीं संकीर्णताओं में तो नहीं बंधा रहा अर्थात वह जाति, संप्रदाय क्षेत्र विशेष के लोगों का होकर तो नहीं रहा? शिवाजी इस कसौटी पर भी खरे उतरते हैं। तीसरी कसौटी है-उसका जीवन किन्हीं विशेष वर्ग के लोगों को अपना मित्र मानने की भावना पर तो नही टिका था? शिवाजी यहां भी खरे उतरते हैं और चौथी कसौटी है कि उस व्यक्ति के आने से मानवता का भला हुआ या हानि हुई? शिवाजी इस कसौटी पर भी अपने लिए ताली बजवाने का काम करते हैं।
लाला लाजपत राय लिखते हैं-”थोड़े ही समय में शिवाजी ने जो कुछ कर दिखाया, वह सब लोगों की आशाओं से बढक़र था। शिवाजी को कई बार सफलता भी हुई, साथ ही निष्फलता भी हुई, परंतु निष्फलता सदैव उनके लिए लाभप्रद होती गयी। वह साहस तथा पुरूषार्थ के ऐसे धनी थे कि कभी निष्फलता में भी हानि नही उठाई। परमात्मा सदा उनकी सहायता करता था। उनका भाग्य उत्तम था। उनकी कीर्ति की पताका और जाति का गौरव उनके देश की भाग्यशीलता का निशान था। मैत्री से वह सभी को आधीन कर लेते थे। वाणी से वह लोगों के हृदयों को खींचते थे। मनुष्यों की वह पूरी पहचान रखते थे, परंतु गुण की पहचान करने में तो कमाल ही करते थे। शत्रुओं को मित्र और विश्वसनीय बना लेते थे। बहुत से योग्य वीर और साहसी मनुष्य उनके साथ रहे लड़े और इनमें से बहुत से उनकी उच्च बुद्घिमत्ता के कायल हो कर उनके ऊपर प्राण निछावर करने वाले सिपाही तथा अफसर बने। शिवाजी की सफलता (तथा महानता) का यही प्रमुख कारण था। ”
माता जीजाबाई और सिंहगढ़ का किला
माता जीजाबाई का अपने पुत्र शिवाजी के जीवन पर बड़ा गहरा प्रभाव था। माता जीजाबाई अत्यंत साहसी महिला थीं। उन्होंने ही अपने पुत्र शिवाजी को सिंहगढ़ का दुर्ग अपने आधीन करने की प्रेरणा दी थी। सिंहगढ़ उस समय उदयभानु के राज्याधीन था। शिवाजी की शक्ति उदयभानु से कम थी। वैसे भी उदयभानु के साथ दिल्ली की मुगल सत्ता भी थी। औरंगजेब ने इस किले में दिखावटी रूप में राजपूत सेना रखी हुई थी। वास्तविक अधिकार तो उसी का था।
माता जीजाबाई एक दिन प्रतापगढ़ के महल पर ऊपर खड़ी थी-जहां से उन्हें सिंहगढ़ किले का बुर्ज दिखाई दे गया। माता ने अपने शिवा को एक संदेशवाहक के द्वारा तुरंत बुला भेजा। शिवा उस समय रायगढ़ में थे। मां की आज्ञा से प्रतापगढ़ पहुंच गये।
मां ने एक सुनियोजित योजना के अंतर्गत शिवा को चौसर खेलने के लिए प्रेरित किया और उसमें पहली बार में ही उसे परास्त कर दिया। पराजित शिवा ने माता से कहा-‘मां आप क्या चाहती हैं? मां ने कहा-शिवा-यह जो सिंहगढ़ का किला दिखता है, न बस इसे ही चाहती हूं।’
शिवा ने मां की शर्त सुनकर कुछ हिचकिचाहट दिखाई, तो मां ने डपट दिया, और स्पष्ट कह दिया कि मुझे केवल सिंहगढ़ चाहिए। मां की आज्ञा से शिवा ने तानाजी को बुलाया। कहा जाता है कि तानाजी उस समय अपने पुत्र के विवाह का निमंत्रण पत्र भी साथ लाये थे। पर शिवाजी ने कहा-कि यह विवाह तो बाद में होगा, पहले तो इस दुर्ग को लेना होगा। तानाजी के द्वारा किला लिया गया, पर वह स्वयं बलिदान हो गया। जिसका उल्लेख हम पूर्व लेख में कर चुके हैं।
लाला लाजपतराय माता जीजाबाई के लिए लिखते हैं :-”जीजाबाई! तू धन्य है! तेरा गर्व धन्य है। तेरी जैसी माता हो तो शिवाजी जैसा पुत्र क्यों न पैदा हो? तेरी जैसी मां छाती का दूध पिलाने वाली हो तो शिवाजी जैसा शूरवीर हिंदुओं के खोये हुए गौरव को दुबारा लाकर अपने उन्नत ललाट पर क्यों न राजतिलक लगवाये? तेरी जैसी गोद हो तो शिवाजी जैसा पुत्र केहरी जैसी शक्ल क्यों न धारण करे? जीजाबाई तू धन्य है, जिसके बेटे ने धर्म की रक्षा की, जाति की रक्षा की, तेरे लिए और अपने लिए यश की धारा बहा दी।”
क्रमश:
(लेखक की पुस्तक प्राप्ति हेतु डायमण्ड पॉकेट बुक्स प्रा. लिमिटेड एक्स-30 ओखला इंडस्ट्रियल एरिया फेस-द्वितीय नई दिल्ली-110020, फोन नं. 011-40712100 पर संपर्क किया जा सकता है।
-साहित्य संपादक)

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