गुरू तेगबहादुर चल दिये अपना बलिदान देने दिल्ली

‘धर्मवीरों’ की दृष्टि गुरू तेगबहादुर पर पड़ी
कश्मीर और कश्मीरी संस्कृति को विनष्ट करने की सौगंध उठा लेने वाले शेर अफगान के विरूद्घ कश्मीरी पंडितों में विरोध का लावा उबल रहा था पर विरोध में प्रतिरोध का अभाव था। इसलिए विरोध प्रतिरोध के लिए किसी का बोध (मार्गदर्शन) प्राप्त करने का अभिलाषी था। तब इन ‘धर्मवीरों’ की दृष्टि गुरू तेगबहादुर पर पड़ी।
कश्मीरी पंडितों ने अपने मनोरथ की सफलता के लिए सर्वप्रथम अपने लोगों की एक बैठक आहूत की, जिसमें निर्णय लिया गया कि कश्मीर में हिंदू धर्म की रक्षा के लिए और वैदिक संस्कृति के संरक्षण के लिए गुरू तेगबहादुर को अपनी समस्या से अवगत कराया जाए। इन लोगों को आशा थी कि गुरूजी उनकी समस्या पर पूर्ण गंभीरता से विचार करेंगे, और बहुत संभव है कि वह बादशाह से हमारी पीड़ा को कहकर हमें इन कष्टों से मुक्त भी करा दें।
प्रतिनिधिमंडल आनंदपुर साहिब के लिए भेजा
अपने इस मनोरथ की प्राप्ति के लिए कश्मीरी पंडितों ने कृपाराम नामक एक व्यक्ति के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल पंजाब में आनंदपुर साहिब के लिए भेजा। जहां इस प्रतिनिधिमंडल ने अपनी सारी व्यथा-कथा का पूर्ण विवरण गुरू तेगबहादुर के समक्ष प्रस्तुत किया। कहानी में इतनी वेदना थी कि वह गुरू के हृदय को झकझोरने लगी। उनका हृदय अपने धर्मबंधुओं की पीड़ा को सुनकर कराह उठा। प्रतिनिधिमंडल जितना ही अधिक अपनी व्यथा-कथा को सुनाता, गुरूजी की संवेदनाएं उतनी ही अधिक अपने धर्मबंधुओं के प्रति करूणामयी होती जाती थीं। गुरूतेगबहादुर जिस आर्य धर्म=हिंदू धर्म के एक अंग थे उसमें धर्म प्रचार का अभिप्राय अपने सत्य का मानवता की सीमाओं में रहकर दूसरों के जीवनोद्वार के लिए प्रचार करना था, पर जब उन्होंने मजहब परिवर्तन का अथवा अपनी मजहबी मान्यताओं का प्रचार-प्रसार दूसरों के जीवन का मूल्य लेकर या उनका संहार करने से होता सुना तो वह मजहबी दानवता और धर्म की मानवता के अंतर में तुरंत अंतर कर गये।
गुरूजी ढूंढऩे लगे उपाय
गुरूजी कश्मीरी पंडितों के कथनों को सुनकर चिंतन में डूब गये। वह समझ नही पा रहे थे कि कश्मीरी पंडितों के घावों पर वह कैसे और किस प्रकार मरहम लगायें? गुरूजी इन पंडितों के रोग का उपचार तो करना चाह रहे थे पर अभी उन्हें कोई उपाय समझ नही आ रहा था कि अंतत: ऐसा सटीक उपाय क्या हो सकता है जो इन पीडि़त पंडितों के रोग का निवारण भी करा सकें और बादशाह को वह समझाने में भी सफल हो सकें। इससे पूर्व कि हम गुरू तेगबहादुर और कश्मीरी पंडितों के मिलन के फलितार्थ पर विचार करें, सर्वप्रथम साप्ताहिक ‘वीर अर्जुन’ (9-10-19 पृष्ठ 8) का यह उद्घरण देना उचित समझते हैं :-
”इस्लाम तथा ईसाई धर्म केवल मतांतर नही कराते अपितु समाजांतर भी कराते हैं। कोई जैन वैष्णव बनकर गले में कण्ठी पहने कृष्ण मंदिर में जाये और भगवत गीता पढ़े, या वैष्णव जैन बनकर कण्ठी तोड़े, अपासरे (जैन साधुओं के रहने का स्थान) में जाय और जैन पुराण सुने, तब भी उसके सामाजिक और घरेलू धर्म-कर्म तथा स्थान, वंश विरासत वगैरा के अधिकार आदि में फेरफार नही होता। उसका नाम धाम नही बदलता। मगर मुसलमान या ईसाई होते ही यह सब बदल जाता है। तब उसकी पत्नी-पत्नी नही रह जाती, पति पति नही रहता। उसके सम्मिलित कुटुम्ब के विरासत के तथा मिल्कियत के अधिकारों में फर्क पड़ जाता है, इस तरह मतांतर के साथ समाजांतर होने से प्रजा में समाज भेद का निर्माण हुआ है, होता है। इस प्रकार समाज की एकता भंग होने का परिणाम दो प्रजाओं, दो नेशंस का वाद और उसके फल है।”
मतांतर से समाजांतर पर गंभीर हुए गुरूजी
हमने यह उद्घरण यहां बहुत सोच समझ कर प्रस्तुत किया है। गुरू तेगबहादुर जिस प्रकार कश्मीरी पंडितों की व्यथा-कथा को सुनकर व्यथित हुए यह उद्घरण उनके उस व्यथित भाव को स्पष्ट करता है। पंजाब का कोई भी गुरू सिख पंथी सिखों को ‘दो नेशंस’ या दो प्रजाओं के मध्य वैमनस्य स्थापित करके मतांतर से समाजांतर की ओर नहीं ले जा रहा था, इसलिए सिख बनने पर हिंदू समाज को किसी भी व्यक्ति से कोई घृणा नहीं होती थी और ना ही सिख बने किसी व्यक्ति को हिंदू समाज के किसी व्यक्ति से कोई शिकायत या घृणा होती थी। पर जब गुरू तेगबहादुर के समक्ष कश्मीर के पंडितों के बलात मतांतर की यह मर्मांतक कहानी आयी तो उन्हें लगा कि अब समाजांतर की प्रक्रिया भी आरंभ हो सकती है। जिसे रोका जाना अनिवार्य है।
सामान्यत: समाजांतर की इस प्रक्रिया के विरूद्घ गुरू तेगबहादुर की इस चिंता को प्रचलित इतिहास ने उपेक्षित किया है। जिसे उचित नहीं कहा जा सकता। क्योंकि इस समाजांतर की प्रक्रिया के प्रति उदासीनता दिखाने वाले गुरू तेगबहादुर का हम उचित मूल्यांकन नहीं कर पाएंगे।
बाल गोबिन्दराय ने किया पिता से प्रश्न
गुरू तेगबहादुर जिस समय कश्मीरी पंडितों की व्यथा-कथा को सुनकर स्वयं व्यथित दिख रहे थे उस समय उनका अल्पव्यस्क पुत्र गोबिंदराय उनके पास ही खड़ा था। बाल गोबिन्दराय को पिता की चिंता मग्न मुख मुद्रा देखकर कुछ कौतूहल हुआ और उसने पिता से सभी लोगों के समक्ष पूछ ही लिया-”पिताजी आपके दरबार में नित्य प्रति ईश्वर चिंतन और मानव निर्माण की बातें होती रहती थीं पर आज ऐसा न होकर यहां निराशापूर्ण परिवेश क्यों हैं? ऐसी क्या बात है कि जिससे आपके दरबार का उत्साहपूर्ण परिवेश आज नीरसता और निराशा में परिवर्तित हो गया है?”
गुरू तेगबहादुर ने अपने पुत्र के मुंह से ऐसे कौतूहल भरे प्रश्नों को सुनकर उसे टालने का प्रयास किया। गुरू तेगबहादुर बालक गोविन्दराय की जिन बातों को केवल बाल सुलभ मन की उपज समझकर यूं ही टाल देना चाहते थे, उनके विषय में उन्हें भी ज्ञात नहीं था कि उनसे प्रश्न पूछने वाला एक बालक न होकर बालक के भीतर का बहुत ही गंभीर और अपने दायित्व के प्रति पूर्णत: संवेदनशील एक व्यक्ति बोल रहा था। इसलिए उस बच्चे ने पिता की टालमटोल करने वाली मानसिकता को पुन: नकारते हुए पिता को अपने प्रश्नों के प्रति गंभीर बनाने का प्रयास करते हुए कहा-‘पिताजी! ये लोग कौन हैं? और आपसे क्या कह रहे हैं? आपसे ये क्या चाहते हैं?’ इस बार बच्चा गोबिन्दराय का संकेत सीधे कश्मीरी पंडितों की ओर था। बच्चा कश्मीरी पंडितों की उदासी का कारण जानना चाहता था।
पुत्र की बात पर पिता ने ध्यान दिया
इस बार गुरूदेव अपने पुत्र के प्रश्न के प्रति गंभीर हो गये। उन्हें लगा कि उनसे एक बच्चा बात नही कर रहा है, अपितु एक उत्तरदायी और गंभीर व्यक्ति प्रश्न कर रहा है। जिसके प्रश्नों का उत्तर देना ही चाहिए।
अत: गुरूतेगबहादुर ने अपने पुत्र के प्रश्न के उत्तर में कहा कि पुत्र ये लोग कश्मीरी पंडित हैं। जहां पर औरंगजेब ने हिंदू धर्म को मिटाने की राजाज्ञा जारी कर दी है और अब इन लोगों का कश्मीर में अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है। ये लोग चाहते हैं कि कोई ऐसा उपाय खोजा जाये जिससे कश्मीर का प्राचीन वैदिक धर्म वहां सुरक्षित रह सके, और सभी हिंदुओं का सम्मान भी बचाया जा सके। गोविन्दराय अब अपने मंतव्य के और निकट पहुंच गया। उसे लगा कि पिताजी से तुरंत अगला प्रश्न कर लिया जाए, जिससे कि पिताजी की चिंता समाप्त हो और वह अपना संशय समाप्त कर अपना कोई सटीक निर्णय पूरी संगत के सामने स्पष्ट कर सकें। इसलिए बालक गोबिन्दराय ने अगला प्रश्न करते हुए गुरूजी से पूछ लिया-”पिताजी इन कश्मीरी पंडितों की समस्या के समाधान के लिए अंतत: आपने क्या निर्णय लिया है?”
पुत्र ने दिया पिता को बलिदान का परामर्श
इस प्रश्न पर पिताश्री (गुरू तेगबहादुर) और भी अधिक संभल गये। उन्होंने संगत के सामने ही पुत्र से संवाद आरंभ कर दिया। उन्हें लगा कि गोविन्दराय अब उनका महामंत्री हो गया है और संभवत: उसके साथ होने वाले संवाद के पश्चात वैसे ही कोई मार्ग खोज लिया जाएगा जैसे कभी कोई सम्राट अपने शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए हर समस्या का समाधान अपने महामंत्री से मंत्रणा करने के उपरांत निकाल लिया करता था। इसलिए उन्होंने पुत्र के प्रश्न के उत्तर में कहा-”पुत्र मैं सोच रहा हूं कि कश्मीर में इन पंडितों कीऔर हिंदूधर्म की रक्षा तभी संभव है जब मुगल बादशाह औरंगजेब की अनीतियों के विरूद्घ देश का कोई महान व्यक्तित्व अपना बलिदान दे दे।”
गुरू तेगबहादुर निश्चय ही अपने भीतर चलने वाले मंथन में अपने स्वयं के बलिदान का निर्णय ले चुके थे। इतना बड़ा बलिदान देने का निर्णय तभी लिया जाता है जब व्यक्ति को लगे कि सत्ता अपने राजधर्म का उल्लंघन कर रही है और उसे सही मार्ग पर लाने के लिए तथा जनता में अपने आदर्शों (यथा स्वतंत्रता, स्वराज्य और राष्ट्रीय अस्मिता) के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिए किसी महान व्यक्तित्व को अपना बलिदान कर देना चाहिए। अब जब गुरू तेगबहादुर का पुत्र स्वयं उनसे पूछ रहा है कि आसन्न संकट का सामना करने के लिए आपने क्या निर्णय लिया है तो उन्होंने उसे स्पष्ट बता दिया कि इस संकट का उपाय क्या है?
पिताश्री के मुख से ऐसे शब्द सुनकर मानो बालक गोबिन्दराय को अपने मन की बात कहने का सही अवसर ही मिल गया। इसलिए उसने झट से कह दिया-‘पिताश्री इस समय देश में आपसे बड़ा धर्म रक्षक और सतपुरूष भला कौन हो सकता है? ये लोग अपने भीतर इन्हीं गुणों का दर्शन करके ही आपके पास आये हैं। इसलिए यदि इनके संकट को टालने के लिए किसी महापुरूष के बलिदान को आप आवश्यक और उचित मानते हैं तो आपको अपने आपको ही इसके लिए प्रस्तुत करना पड़ेगा। इन पंडितों की रक्षा आप करें। क्योंकि गुरू नानकदेव जी के उत्तराधिकारी होने के नाते उनके सिद्घांतों की रक्षा करना इस समय आपका सबसे बड़ा कत्र्तव्य है। यह भारत की सनातन संस्कृति की परंपरा रही है कि शरणागत की रक्षा निज प्राण देकर भी करनी चाहिए। गुरू नानक देव ने भी कहा है-जो शरण आये तिस कंठ लाये।”
पिता बलिदान के लिए तैयार हो गये
अपने पुत्र के मुंह से ऐसे शब्द सुनकर गुरूजी की प्रसन्नता का ठिकाना नही रहा।
यह है-भारतीय संस्कृति की पंरपरा, जो पुत्र को पिता का मार्गदर्शन करने की भी पूरी स्वतंत्रता प्रदान करती है। यहां ‘देवव्रत’ पिता के लिए अपना जीवन बलिदान कर ‘भीष्म’ बन जाता है, पिता की इच्छा मात्र का पालन करने वाला राम वन गमन कर भगवान ‘राम’ बन जाता है, तो समय आने पर मर्यादा और धर्म का पालन करने वाला बालक गोबिन्दराय पिता को ही बलिदान के लिए प्रेरित करने लगता है। यद्यपि उसे पता है कि पिता के बलिदान का अर्थ होगा स्वयं अपने जीवन को भी संकटों में फंसा लेना। परंतु वीर लोग कभी भी आने वाले संकटों का ध्यान नहीं करते हैं, अपितु आने वाले हर संकट का सामना करने के लिए स्वयं को समर्पित कर देते हैं। बालक गोबिन्दराय आज पिता को बलिदान के लिए प्रेरित ही नहीं कर रहा है, अपितु स्वयं को आने वाले संकटों में झोंक भी रहा है।
गुरूजी ने पुत्र के प्रति असीम स्नेह प्रकट करते हुए उसकी वीरता की बातों पर संतोष और प्रसन्नता प्रकट की। उन्होंने बालक गोबिन्दराय की पीठ थपथपाते हुए कहा कि पुत्र मैं स्वयं भी तुमसे ऐसी ही अपेक्षा करता था और तुमसे ऐसा ही सुनना चाहता था।
पिता-पुत्र के वीरोचित और देशभक्तिपूर्ण संवाद को सुनकर सारी संगत भी भावुक हो गयी। सभी लोग अपनी आंखों से एक ऐतिहासिक क्षण का इतिहास द्वारा ही अभिषेक होता देख रहे थे और एक अदभुद दृश्य के दृष्टा बन रहे थे। उन्हें ऐसा पता नहीं था कि आज उनकी उपस्थिति में एक ऐसा निर्णय लिया जाएगा जो भारत के इतिहास की दिशा को ही परिवर्तित कर देगा।
औरंगजेब के लिए भिजवाया संदेश
गुरू तेबगहाुदर भली भांति जानते थे-
ब्रजन्ति ते मूढतिय: पराभवम्
भवन्ति माया विषु ये न मामिन:।
प्रविश्च हि ध्यन्ति शठास्तथाविधान असं वृतांगान्निशिता इवेषव: (भैरवी)
अर्थात वे मूर्ख लोग जो अपने धूत्र्त शत्रुओं की चालों का निराकरण करने में कुटिल उपायों के प्रयोग से संकोच करते हैं, नष्ट हो जाते हैं। धूत्र्त लोग अपने असावधान शत्रु के कोमल अंगों पर प्रहार कर उसे उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं जैसे तीक्ष्ण बाण अंग के उस भाग में घुस जाते हैं जो कवच से नहीं ढँका है।
ऐसी परिस्थितियों में गुरू तेगबहादुर ने बादशाह औरंगजेब के पास कश्मीरी पंडितों को यह संदेश लेकर भेजा कि कश्मीर में वह जिस प्रकार धर्म परिवर्तन का खेल जारी रखे हुए है उसके विषय में गुरू तेगबहादुर उससे बात करना चाहते हैं। यदि बादशाह के धर्म परिवर्तन अभियान से सहमत होकर गुरू तेगबहादुर उसका समर्थन करते हैं, तो वे सभी स्वयं ही इस्लाम धर्म (सम्प्रदाय) स्वीकार कर लेंगे।
गुरूजी के प्रस्ताव पर औरंगजेब की प्रसन्नता
जब औरंगजेब को गुरू तेगबहादुर का यह संदेश मिला तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। उसे लगा कि गुरू तेगबहादुर उसकी नीतियों का समर्थन करेंगे और उनके समर्थन का परिणाम यह होगा कि बातों ही बातों में पूरे हिंदुस्थान का इस्लामीकरण हो जाएगा। जिससे उसकी बादशाहत को कोई खतरा नही रहेगा, जिसके लिए औरंगजेब ने अब तक बहुत से उपाय किये थे, पर उसे सफलता नहीं मिली थी, वही कार्य अब उसे अति सरल होता जान पड़ा।
अत: बादशाह ने आनंदपुर साहिब के लिए अपने दूत भेजकर गुरू तेगबहादुर को यथाशीघ्र दिल्ली लाने के लिए अपनी कार्य योजना पर कार्य आरंभ किया। दूत बादशाह का संदेश लेकर आनंदपुर सहित पहुंच गये। जहां गुरू तेगबहादुर ने उनका यथोचित स्वागत सत्कार कराया।
औरंगजेब के निमंत्रण को गुरूजी ने किया स्वीकार
औरंगजेब के दूतों ने गुरू तेगबहादुर को दिल्ली आने का अपने स्वामी का निमंत्रण दिया, जिसे गुरू तेगबहादुर ने स्वीकार तो कर लिया, परंतु तुरंत दिल्ली चलने में असमर्थता व्यक्त की। जिस पर गुरूजी के शिष्यों ने उन्हें समझा दिया कि गुरूजी ने जो कुछ कहा है, उसे अवश्य पूर्ण करेंगे। वचन भंग करने का दोष उनके व्यक्तित्व में नहीं है, पर संगत के कुछ आवश्यक कार्य हैं जिन्हें पूर्ण किया जाना आवश्यक है और तभी बादशाह से भेंट संभव हो पाएगी।
अत: आप निस्संकोच दिल्ली लौट जाएं। गुरूजी अपने दिये वचन के अनुसार बादशाह से भेंट के लिए दिल्ली अवश्य आएंगे।
गुरूजी का वार्ता के लिए प्रस्थान
शिष्यों की बातों से संतुष्ट होकर औरंगजेब के दूत दिल्ली लौट गये। तब गुरूजी ने अपने पुत्र गोबिन्दराय को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और निर्णय लिया कि वे पहले उन स्थानों पर जाएंगे, जहां पर औरंगजेब ने अत्याचार कर-करके हिंदुओं का उत्पीडऩ कर रखा है। गुरू तेगबहादुर के इस प्रकार के निर्णय से स्पष्ट था कि वे यह भली भांति जानते थे कि औरंगजेब के दरबार में जाने का अभिप्राय जीवन को संकट भी हो सकता है, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। दूसरे वह औरंगजेब के अत्याचारों से व्यथित हिंदू लोगों की व्यथा-कथा सुनकर और उनकी सहानुभूति बटोरकर स्वयं को बादशाह की दृष्टि में भारी भरकम सिद्घ करना चाहते थे। गुरूजी के इस प्रकार के चिंतन से उनकी दूरदृष्टि तथा कूटनीतिक कौशल का पता चलता है। गुरूजी के साथ पांच प्यारे-भाई मतीदास जी, भाई दयाला जी, भाई सतीदास जी, भाई गुरदित्ता जी तथा भाई उदधेजी भी यात्रा में साथ चले।
किया भ्रांतियों का निवारण
बादशाह औरंगजेब ने गुरू तेगबहादुर के दिल्ली आने के अभियान को इस प्रकार प्रचारित करा दिया था कि वह दिल्ली मुसलमान बनने आ रहे हैं, और उनके मुसलमान बनते ही सारा हिंदुस्थान मुसलमान बन जाएगा। इससे हिंदू समाज में भांति-भांति की भ्रांतियां उत्पन्न हो गयीं, लोगों में भांति-भांति की चर्चाएं आरंभ हो गयीं। इसलिए भी गुरूजी का अपने हिंदू समाज के लोगों के साथ मिलना और उन्हें यह बताना कि वह बलिदान हो सकते हैं, परंतु धर्म परिवर्तन नही करेंगे और यदि ऐसा होता है कि उनका बलिदान हो जाए तो आप लोगों को उन परिस्थितियों में क्या करना है-और भी आवश्यक हो गया।
गुरू देव आनंदपुर से रोपड़, रोपड़ से सैफाबाद उसके पश्चात समाणा, कैथल, जींद होते हुए दिल्ली की ओर आ रहे थे। मार्ग में लोगों ने गुरूजी से मिलकर अपनी व्यथा कथायें सुनायीं। गुरूजी लोगों का मनोबल बढ़ाते हुए तथा उनका उत्साहवर्धन करते हुए आगे बढ़ते रहे। वह धर्मवीर थे और एक नायक के सारे गुण उनके भीतर विद्यमान थे, इसलिए एक आदर्श नायक की भांति अपने देश की बहुसंख्यक जनता का नेतृत्व करते हुए वह आगे बढ़ रहे थे। उनका प्रस्थान मनुष्यता के मौलिक अधिकारों की सुरक्षार्थ था और वह चाहते थे कि स्वतंत्रता को मनुष्य का मौलिक अधिकार घोषित किया जाए। शासन और शासक को अपनी सीमाएं स्थापित करनी चाहिएं। क्योंकि कोई भी शासक असीमित और अपरिमित अधिकारों के साथ कभी भी शासक नही बन सकता। इसलिए उसे अपनी सीमाएं स्थापित कर ‘सर्व सम्प्रदाय समभाव’ के राजधर्म को स्थापित करने के लिए सचेष्ट रहना चाहिए।
दिल्ली जाने का गुरूजी का उद्देश्य
एक प्रकार से गुरू देव भारत की सनातन संस्कृति के अनुसार राजधर्म को लागू कराने के आदर्श के साथ दिल्ली विजय करने के लिए चले थे।
उधर औरंगजेब की अधीरता बढ़ती जा रही थी। वह तुरंत गुरूदेव को दिल्ली उपस्थित होता हुआ देखना चाहता था। पर गुरूदेव अप्रत्याशित रूप से विलंब करते जा रहे थे जिससे औरंगजेब के मन में भी भ्रांतियां उत्पन्न होती जा रही थीं। उसका मन भयभीत भी था।
गुरूदेव के प्रति लोगों के आकर्षण और उस पर गुरूदेव का उन्हें मनोबल बनाये रखने का उपदेश औरंगजेब को पच नहीं रहा था। उसे लग रहा था कि ‘दाल में कुछ काला है’ और गुरूदेव के आगमन को लेकर अपने भीतर तूने जिन अपेक्षाओं को पैदा कर लिया है, वे निराधार भी सिद्घ हो सकती हंै। इसलिए गुरूदेव के प्रति सशंकित औरंगजेब उनकी गिरफ्तारी की योजना बनाने लगा। उसे स्पष्ट दीखने लगा कि यदि उसने अपना निर्णय लेने में विलंब किया तो इसका परिणाम विपरीत भी आ सकता है। औरंगजेब की यह शंका निर्मूल भी नहीं थी, क्योंकि गुरूदेव के प्रवचन और उपदेश जनता के हृदय को छू रहे थे, और देश में आत्मबलिदानों के लिए बहुत ही रोमांचकारी परिदृश्य बनता जा रहा था। गुरूदेव के पास भले ही साक्षात दीखने वाली सेना का अभाव था, परंतु उनके पास अदृश्य रूप से जितनी बड़ी सेना थी-उसे देखकर वह स्वयं भी अभिभूत थे।
विश्व इतिहास का यह दुर्लभ दृश्य है-जब एक आध्यात्मिक संत अपने साथ एक भी हथियार न लेकर बलिदान के लिए और बलिदानी परंपरा कीरक्षा के लिए क्रूर सत्ता का सामना पूर्ण साहस के साथ करने के लिए चल पड़ा था।
एक ‘जयचंद’ की दुष्टता
बादशाह ने गुरूदेव की गिरफ्तारी पर पुरस्कार बोल दिया था। आगरा में एक सय्यद हसन अली नामक व्यक्ति था जिसकी पोती विवाह योग्य हो रही थी, उसने भी सोचा कि यदि गुरूदेव को किसी प्रकार मैं गिरफ्तार करा दूं तो पुरस्कार की एक हजार की राशि मुझे मिल सकती है, जिससे मैं अपनी पोती का विवाह कर सकता हूं। गुरूदेव इस मुस्लिम के मंतव्य को समझकर स्वयं ही उसके घर पहुंच गये। पर वह तो गुरूजी के व्यक्तित्व को देखकर स्वयं उनके चरणों पर गिर पड़ा। गुरूजी ने कहा कि वह उनकी गिरफ्तारी कराकर पुरस्कार प्राप्त कर ले। पर वह माना नही।
तब गुरूदेव ने उसके पोते को एक हीरे की अंगूठी देकर बाजार से मिठाई लेने भेज दिया। हलवाई ने उस साधारण व्यक्ति के पास अंगूठी देखकर पूछा कि यह कहां से आयी है-तो उसने सच बता दिया। तब पुलिस को सूचना दी गयी और गुरूजी की गिरफ्तारी करा दी गयी। हसन अली को पुरस्कार भी मिल गया और गुरूदेव की युक्ति भी काम कर गयी। वह यही चाहते थे कि हसन को ईनाम मिले।
क्रमश:
(लेखक की पुस्तक प्राप्ति हेतु डायमण्ड पॉकेट बुक्स प्रा. लिमिटेड एक्स-30 ओखला इंडस्ट्रियल एरिया फेस-द्वितीय नई दिल्ली-110020, फोन नं. 011-40712100 पर संपर्क किया जा सकता है।
-साहित्य संपादक)

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