गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-27

गीता का चौथा अध्याय और विश्व समाज

इसी आनन्दमयी सांसारिक परिवेश को ‘विश्वशान्ति’ कहा जाता है। जिनका चित्त मैला कुचैला है, हिंसक है, दूसरों पर अत्याचार करने वाला है-उनका भीतरी जगत उपद्रवी और उग्रवादी होने से हिंसक हो जाता है, जिसमें शुद्घता नाम मात्र को भी नहीं होती। फलस्वरूप उनका बाहरी जगत भी तदनुरूप बन जाता है। मन दूषण से प्रदूषण फैलता है।
मैला कुचैला चित्त हो, हिंसक हों विचार।
भीतर जगत उपद्रवी हो करता अत्याचार।।
यह जो आज के संसार में पर्यावरण प्रदूषण हमें बढ़ता दिख रहा है-इसके पीछे मन दूषण एक प्रमुख कारण है। यह मन दूषण यदि ठीक हो जाए तो बाहय जगत का प्रदूषण तो स्वयं ही ठीक हो जाएगा और यह मन दूषण आत्मशुद्घि से अर्थात संध्या के नित्यकर्म को अपनाने से ही हो पाना संभव है।
मनदूषण से बढ़ रहा जगत में दुष्ट विचार।
आत्मशुद्घि से होत है सुन्दर यह संसार।।
आज के संसार को शान्ति की चाह तो है पर वह यह नहीं जानता कि यह शान्ति क्या होती है और यह किस वृक्ष पर लगती है? या कैसे पायी जा सकती है? हमारा मानना है कि यदि संसार अपने नित्यकर्मों को ठीक कर ले और उनमें भारत के वैदिक धर्म के संध्यादि नित्य कर्मों को सम्मिलित कर ले तो उसे सफलता मिल सकती है।
निष्काम कर्म की व्याख्या
‘निष्काम कर्म’ गीता की विश्व को सबसे उत्तम देन है। इसे समझ लेने से जीवन दर्शन को समझने में सहायता मिलना निश्चित है। निष्काम कर्म पर पूर्व में भी प्रकाश डाल चुके हैं। अब इस पर विशेष विचार करते हैं।
गीता के चौथे अध्याय में ही योगेश्वर श्रीकृष्णजी इस विषय पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि जिस व्यक्ति के सभी कार्य, कामना अर्थात फलेच्छा के संकल्प से अर्थात दृढ़ भावना से रहित होते हैं अर्थात जिनमें फलासक्ति का अभाव होता है और जिसके कर्म ज्ञान रूपी अग्नि में भस्म हो गये हैं, उसे संसार के बुद्घिमान लोग पंडित कहते हैं।
योगेश्वर श्रीकृष्ण जी की मान्यता है कि कर्म के फल के प्रति व्यक्ति को आसक्ति को त्यागना ही होगा। यह ‘आसक्ति’ ही व्यक्ति पर आशिकी के राग का भूत चढ़ाती है। जिससे फिर द्वेषादि का वितण्डावाद उठ खड़ा होता है। संसार में आशिकी को चाहे कितना ही अच्छा माना जाए पर यह भी सत्य है कि आशिकों को ही यह संसार पीटता भी है। तब उन्हें परमात्मा ही क्यों छोडऩे लगा है? लोग अपने बुरे कामों को यह कहकर छिपाने का प्रयास करते हैं कि यह मेरे निजी जीवन का अंग हैं, इन पर किसी को कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है, परन्तु जब उनका यह ‘निजी जीवन’ सार्वजनिक होता है तो लोग उन पर थूकने लगते हैं। जिनका कर्म आशिकी का हो गया-आसक्ति पूर्ण हो गया, समझो उसने अपने पतन का रास्ता स्वयं ही पकड़ लिया है। आजकल कई तथाकथित धर्मगुरू आशिकी के इसी रास्ते को अपनाकर जेलों की हवा खा रहे हैं। अपने निजी जीवन के पापों को बहुत देर तक उन्होंने छुपाया पर जब वे उजागर हुए तो उन्होंने धर्मगुरूओं को जेलों के भीतर ले जाकर पटक दिया।
श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि अर्जुन! तुझे ज्ञान पूर्वक अपने कर्मों के बीज को ज्ञानरूपी अग्नि में भून देना चाहिए। फिर जैसे भुना हुआ चना उपजने योग्य नहीं रह पाता है, उनसे आसक्ति का राग समाप्त हो जाता है वैसे ही तेरे कर्म हो जाएंगे-जिनका कोई फल तुझे नहीं मिलेगा। पर ध्यान रख यह एक बहुत बड़ी साधना है। तुझे उस साधना में पारंगत होना होगा। तू जितना आसक्ति विहीन साधक बनता जाएगा-उतना ही तू निष्काम कर्मी बनता जाएगा।
हमारे गायत्री मंत्र के पांच चरण हैं। पहले चरण में है ‘ओ३म्’ दूसरे में ‘भूर्भुव: स्व:।’ तीसरे में है-‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ चौथे में है-‘भर्गोदेवस्य धीमहि।’ और पांचवें में है ‘धियो योन: प्रचोदयात्।’ अब मनुष्य के पांच ही शत्रु हैं-काम, क्रोध, मद, मोह और लोभ। वैदिक संस्कृति के विद्वानों का मानना है कि गायत्री के पांच चरणों का अर्थपूर्वक चिन्तन करने से इन पांच विकारों का शमन होता है। गायत्री के जप से इन पांचों को ज्ञानाग्नि में भून दिया जाता है। ‘ओ३म्’ की साधना से या अर्थपूर्वक चिन्तन से हमारे भीतर का अहंकार रूपी शत्रु पकड़ा जाता है और उसे हम ज्ञानाग्नि में भूनने में सफल हो जाते हैं। ‘भूभुर्व: स्व:’ के निरन्तर जप से हम ‘मोह’ को पटकने मेंं सफल होते हैं। ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ बोलने से या जपने से लोभ की समाप्ति होती है। ‘भर्गो देवस्य धीमहि’-बोलने से अर्थात उसके तेज स्वरूप का ध्यान करने से उसकी ज्ञानाग्नि में हमारा क्रोध नाम का शत्रु भून दिया जाता है या भुन जाता है। इसके पश्चात सबसे भयंकर शत्रु काम बचता है। इसका शमन ‘धियो योन: प्रचोदयात्’ अर्थात हमारी बुद्घियों को सन्मार्गगामिनी बन जाने से होता है। जब ये सारे विकार कोयले बनकर ढेर हो जाते हैं, तब हमारी तब हमारी विजय हो जाती है, हम एक विजयी योद्घा होते हैं।
पर ध्यान रहे ऐसे योद्घा और सांसारिक युद्घों के विजेता योद्घा में आकाश-पाताल का अन्तर होता है। यह योद्घा पूर्णत: शान्त, निभ्र्रान्त और अहंकार शून्य होता है। अब इसके सारे कार्य ईश्वर को समर्पित होकर होने लगते हैं। तब ऐसा योद्घा संसार के किसी भौतिक युद्घ को भी लड़ता है तो वह उसे भी ईश्वर को समर्पित करके लड़ता है। ऐसा योद्घा युद्घ लड़ते समय भी निष्काम कर्म कर रहा होता है। वह किसी महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अर्थात लोककल्याण की भावना से प्रेरित होकर इस याज्ञिक कार्य का सम्पादन व निष्पादन करता है। योगीराज श्री कृष्णजी अर्जुन को यही बता रहे हैं कि तू भी ऐसा ही निष्काम कर्म करने वाला योद्घा बन जा और अपने कत्र्तव्य कर्म को कर डाल। इससे तू भी जीवन्मुक्त हो सकता है।
संसार के लोगों में आज रार-तकरार का वातावरण है। इसका कारण यही है कि उनके कर्म निष्काम भाव से प्रेरित नहीं है। कर्म की पवित्रता भंग है। उद्देश्य की महानता अर्थात लोककल्याण का स्थान स्वकल्याण की स्वार्थप्रेरित भावना ने ले लिया है। इसलिए स्वार्थों में टकराव है। गायत्री से लोग दिन प्रतिदिन मुंह फेरते जा रहे हैं। घटिया स्तर के भद्दे गीत या संगीत को ही उपासना या साधना का आधार मान रहे हैं। जब हम अपने निष्काम भाव के प्रतीक योगीराज श्रीकृष्ण को ही ‘श्याम चूड़ी बेचने आया’-कहकर अपने आप ही बदनाम करने लगेंगे तो उसका प्रभाव भी अच्छा आने वाला नहीं है। इससे युवा पीढ़ी भी ‘चूड़ी बेचने वाली’ आशिक प्रवृत्ति की छलिया बन रही है और अपनी ही बहनों के साथ अशोभनीय कृत्य कर रही है। जिस श्रीकृष्ण का आशय ऐसी वाहियात बातों से दूर-दूर तक भी नहीं था- उसके साथ ऐसा घृणास्पद उपहास करके हमने उनके साथ ही नहीं अपने साथ भी अन्याय किया है। इससे योगीराज का सनातन ज्ञान भंग होकर देश में अनाचार और पाप वासना को बढ़ाने में ही सहायता मिली है। जिसे किसी भी दृष्टिकोण से उचित नही ठहराया जा सकता। हमें वह करना चाहिए था जिसे चौथे अध्याय में ही श्रीकृष्ण जी अर्जुन से कह रहे हैं। वह कहते हैं कि अर्जुन फल की आशा न रखते हुए मन और आत्मा को वश में रखकर सब प्रकार के भोग साधनों को समेटने की भावना को त्यागकर जो व्यक्ति केवल शरीर से कर्म करता है, उसे कोई दोष नहीं लगता। क्रमश:

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