देश का विभाजन और सावरकर, अध्याय -9 ( ख ) सिक्खों के लिए सेना बनाने हेतु लिखा पत्र

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हिंदुओं का सैनिकीकरण करने के अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित होते हुए उन्होंने तारीख ४ जून, १९४० के दिन सेना खड़ी करो, संगमेंस यूनियन के कार्यवाहों को एक उत्तेजक पत्र भेजा। उसका सारांश ‘सावरकर समग्र’ (खंड – 8 ) में इस प्रकार दिया गया है-
” आपने मुझे परिषद् के लिए निमंत्रित किया इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ। यद्यपि मैं आपके निमंत्रण को आज स्वीकार नहीं कर सकता, परंतु आपकी विनती के अनुसार मैं सिक्ख बंधुओं के लिए एक संदेश भेज रहा हूँ। उसमें से मुख्य विधेयक इस प्रकार हैं-
“सिक्ख बांधव कांग्रेस के मिथ्या राष्ट्रवाद से मानसिक दृष्टि से मुक्त हों। इस देश में अनेक मुसलमानी राज्य निर्माण करने का मुसलमानों ने दृढ़ निश्चय कर लिया है। अतः हिंदी राष्ट्रीयत्व – केवल कल्पना मात्र रह गई है। कांग्रेस के प्रयत्नों का परिणाम यह हुआ है कि केवल हिंदू नि:शस्त्र, असंघटित एवं दुर्बल बनकर आत्म सुरक्षा की उपेक्षा कर रहे हैं। यह जानकर कि मुसलमानों को उनका स्वतंत्र राष्ट्र निर्माण करना है, हिंदुओं को भी इस बात की चिंता करनी चाहिए कि प्रयत्नपूर्वक संपूर्ण भारत में अपनी नाक ऊँची कैसे रहेगी।”
इस उद्धरण से स्पष्ट है कि सावरकर जी ने कांग्रेस के राष्ट्रवाद को कभी भारत का राष्ट्रवाद स्वीकार किया ही नहीं। उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रवाद को हमेशा मिथ्या कहकर संबोधित किया। जब सावरकर जी ऐसा कर रहे थे तो इसमें वह कुछ भी गलत नहीं कर रहे थे। क्योंकि भारत और भारतीयता से सर्वथा दूर रहने वाली कांग्रेस भारतीय आत्मा और भारत की हिरण्यगर्भ: चेतना शक्ति के माध्यम से समर्थ भारत के समानार्थक राष्ट्रवाद का कभी समर्थन नहीं कर पाई। वह कभी नहीं समझ पाई कि भारत की चेतना में बसने वाला हिरण्यगर्भ क्या है? वह ब्रह्मा अर्थात मां भारती के गर्भ में बसने वाले हिरण्यगर्भ अर्थात कमल को कभी समझ नहीं पाई। वास्तव में यह हिरण्यगर्भ ही वह पारसमणि है जिसके संसर्ग और संपर्क को पाकर प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र भक्त बन जाता है। उसके भीतर की कायरता उड़न छू हो जाती है। उसका डर निकल जाता है और वह निर्भीक होकर एक राष्ट्रभक्त की भांति जीवन यापन करने लगता है।

राष्ट्रवादी शक्तियों का किया आवाहन

सावरकर जी ने सिख बंधुओं को सचेत किया कि मुसलमानों ने अपने अनेक राज्य स्थापित करने का संकल्प ले लिया है। ऐसी स्थिति में देश में हिंदुत्व को मजबूत करने वाली शक्तियों को एक साथ आने की आवश्यकता है। वे एक साथ आकर हाथ में हाथ डालकर आगे बढ़ने का संकल्प लें। जिससे भारत के विरोधी परास्त हों और भारत को आगे बढ़ाने वाली शक्तियों को नई ऊर्जा प्राप्त हो।
 सावरकर जी ने आगे लिखा कि 'इसलिए ही हिंदू की इसी स्पष्ट नीति से आप पंजाब में कांग्रेस से नाता तोड़कर एक स्वतंत्र सिक्ख पक्ष संघटित करो। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए आपके स्वतंत्र मतदाता संघ की इस माँग को ही मेरा समर्थन है। आप ऐसे एक भी सिक्ख को निर्वाचित नहीं होने दें जो कांग्रेस-दर्शिका पर खड़ा रहा है; क्योंकि कांग्रेस के भ्रांत राष्ट्रवाद से सीमा प्रदेश, सिंध, पंजाब तथा कश्मीर स्थित हिंदुओं की सत्ता और हित संबंधों का घात किया जाता है तथा बंगाल और अन्य इलाके के हिंदुओं को भी वही खतरा है। तथापि पंजाब विधान सभा में यदि युद्ध के लिए तैयार रहनेवाला सिक्ख गुट निर्माण हुआ तभी आप सफलतापूर्वक मुसलिम गुट का प्रतिकार कर सकेंगे।"

इस उद्धरण में सावरकर जी ने कांग्रेस के राष्ट्रवाद को भ्रांत राष्ट्रवाद की संज्ञा दी है। नेहरू और गांधी की नीतियों की यदि समीक्षा की जाए तो सचमुच कांग्रेस के ये दोनों बड़े नेता भ्रान्तियों का ही शिकार बने दिखाई देते हैं। उन्होंने इस बात को कभी ना तो समझा और ना समझने का प्रयास किया कि राष्ट्र की रक्षा के लिए शस्त्र और शास्त्र के उचित समन्वय की आवश्यकता होती है। वे शास्त्र को लेकर भी भ्रान्तियों का शिकार थे और शस्त्र के समुचित उपयोग को लेकर भी भ्रान्तियों का शिकार बने रहे। यही कारण रहा कि कांग्रेस के ये दोनों बड़े नेता न तो कभी शास्त्र की ही राजनीति कर सके और ना शस्त्र की ही राजनीति कर सके। जबकि भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में शास्त्र और शस्त्र के उचित समन्वय को बहुत अधिक स्थान दिया गया है। यदि यह कहा जाए कि भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद शास्त्र और शस्त्र के उचित समन्वय पर ही आधृत है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह सावरकर जी के लिए ही संभव था कि वह उन परिस्थितियों में सिक्खों को अपने हिंदू समाज का एक अटूट अंग घोषित करते हुए उन्हें इस बात के लिए प्रेरित करते रहे कि वे मुसलमानों की देश विरोधी मांगों और शर्तों का पुरजोर विरोध करें।
उन्हें कदम कदम पर मुस्लिम चुनौती खड़ी दिखाई दे रही थी।
वह इस चुनौती के उद्देश्य को भी समझ रहे थे और इसकी अंतिम परिणति को भी समझ रहे थे। मुस्लिम सांप्रदायिकता के कारण उन्हें देश बहुत जल्दी टूटता हुआ दिखाई दे रहा था। उस खतरे को वह बड़ी गहराई से और स्पष्टता के साथ अनुभव कर रहे थे। वह जान रहे थे कि भारत के राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकता व अखंडता के शत्रु के रूप में काम करने वाले मुसलमान और ईसाई अंग्रेज निश्चय ही हमारी राष्ट्रीय अखंडता को चोटिल करेंगे। यही कारण था कि वह सिक्ख बंधुओं को यह परामर्श दे रहे थे कि वह मुस्लिम सांप्रदायिकता के विरोध में अपनी सेना खड़ी करें।

सेना की करो तैयारी

"सेना में भी यह सावधानी बरतें कि सिक्खों को उचित स्थान मिले, क्योंकि उस क्षेत्र में भी कांग्रेस के अहिंसक विचारों से हिंदू पिछड़े हुए हैं।"

सिक्खों को उचित स्थान दिलवाने की बात कहकर सावरकर जी ने यह स्पष्ट किया कि अपना नेतृत्व अपने हाथों में रहना चाहिए। इतिहास के ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब अपना नेतृत्व हमने विधर्मियों के हाथों में दे दिया और उसके बुरे परिणाम आए।
राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े मुद्दों पर हमें किसी भी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के समुदाय पर अपने आपको निर्भर नहीं करना चाहिए जिनकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो। संदिग्ध व्यक्तियों को महत्वपूर्ण निर्णय और महत्वपूर्ण क्षेत्रों से दूर रखना ही उचित होता है। यदि संदिग्ध व्यक्तियों पर विश्वास करते हुए उन्हें राष्ट्र के हितों से जुड़े हुए महत्वपूर्ण मुद्दों और तथ्यों की जानकारी दी गई तो वह घातक हो सकती है। राष्ट्र की रक्षा उन महत्वपूर्ण विश्वसनीय और सुरक्षित हाथों में होनी चाहिए जिन पर सबको विश्वास हो। राष्ट्र की रक्षा का दायित्व किसी प्रकार की धर्मनिरपेक्षता के भूत को चढ़ाकर या अनावश्यक किसी का तुष्टीकरण करते हुए किसी को सौंपना अपने पैरों पर अपने आप कुल्हाड़ी मारने जैसा होता है।
ऐसी सोच सावरकर जी की इतिहास के गहन अध्ययन के पश्चात बनी थी। जब उन्होंने इतिहास में ऐसे अनेक खलनायकों को देखा जिन्होंने समय आने पर देश की सांस्कृतिक अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया या देश के कर्णधारों के साथ विश्वासघात करते हुए देश को ही बेच डाला। यही कारण था कि उन्होंने सिक्खों को प्रत्येक प्रकार से सजग होकर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उनके लिए सिक्खों पर अटूट विश्वास करने का एकमात्र कारण यही था कि वह सिक्खों की गुरु परंपरा में गहरी आस्था रखते थे और यह जानते थे कि सिक्खों के गुरुओं ने संपूर्ण हिंदू समाज के लिए कितना अनुकरणीय और प्रशंसनीय कार्य किया था?
सावरकर जी ने उन सिक्ख बंधुओं को यह स्पष्ट किया कि “पाकिस्तान के प्रश्न के संबंध में भी कांग्रेस पर निर्भर न रहें, क्योंकि उसके नेता मुसलमानों का विरोध नहीं करेंगे। उनके वचनों से यह स्पष्ट होता है।” ऐसा ही हुआ भी था। कांग्रेस ने कभी मुस्लिम लीग का या मुस्लिमों का विरोध नहीं किया। उन्होंने चाहे जितने बड़े बड़े नरसंहार किए या पहाड़ सी गलतियां भी की तो भी कांग्रेस और उसके नेताओं का दृष्टिकोण उनके प्रति उदार ही बना रहा।
सावरकर जी ने आगे यह भी स्पष्ट किया कि ” ….और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आप तत्काल सिक्ख सेना संघटित करना आरंभ करें। यह सेना खाकसार और खुदाई खिदमतगारों से भी बलशाली हो। इस सेना पर सारा ध्यान केंद्रित करके उसे इस तरह संघटित एवं शिक्षित करें कि आगामी तीन-चार वर्षों में ऐसे संकेत दिखाई देते हैं कि पाकिस्तान की निर्मिति हो रही है, इस सेना का खड़ी सेना में रूपांतर करें। किसी भी सेना को इस प्रकार सबल सेना का समर्थन न हो तो वह सब व्यर्थ होगा।
गुरु गोविंदसिंह का सनसनाता हुआ चैतन्य आपके लिए स्फूर्तिदायी तथा मार्गदर्शक सिद्ध होगा। ऐसी परिस्थितियों में मुसलमानों ने पाकिस्तान निर्मित का प्रयास किया तो उन्हें अटक से लेकर दिल्ली तक एक समर्थ सिक्ख राज्य प्रस्थापित होता हुआ दिखाई देगा। इन सिक्खों का, जो हमारे ही लहू के हैं, सामर्थ्यं पंजाब के अखिल हिंदुओं की ही शक्ति बनेगा, वाह गुरुजी की फतह, वाह गुरुजी का खालसा !”
सावरकर जी के इस सार्थक प्रयास पर चिंतन नहीं किया गया है। कांग्रेसी और कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने उनकी विचारधारा को कोसने और कूड़ेदान में फेंक देने में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली है। उनके यह शब्द बहुत ही महत्वपूर्ण हैं कि इन “सिक्खों का जो हमारे ही लहू के हैं सामर्थ्य पंजाब के अखिल हिंदुओं की शक्ति बनेगा। वाह गुरु जी की फतेह वाहेगुरु जी का खालसा!”

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह लेख मेरी नवीन पुस्तक “देश का विभाजन और सावरकर” से लिया गया है। मेरी यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स दिल्ली से प्रकाशित हुई है जिसका मूल्य ₹200 और पृष्ठ संख्या 152 है।)

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