स्वर्गीय पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा द्वारा स्वामी दयानंद सरस्वती जी के सम्बन्ध में दिए गए भाषण को पढ़कर गौरवान्वित होइए -:

images (84)

🕉
➡ शंकर दयाल शर्मा —- “हमारे देश के अग्रणी चिंतक और महान् समाज-सुधारक महर्षि दयानन्‍द सरस्‍वती के जन्‍म-दिन पर आयोजित इस समारोह में उपस्‍थित होकर मुझे प्रसन्‍नता हो रही है। मैं दयानन्‍द सरस्‍वती जी के प्रति अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित करता हूँ।
दयानंद सरस्‍वती जी ने जब सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया था, तब देश में विदेशी हुकूमत थी। अंग्रेजी सत्ता ने भारतीय सभ्‍यता और संकृति की आलोचना करके भारतीयों के मन में हीन भावना पैदा कर दी थी। वैसे भी चूंकि वे सत्ता में थे, और हम गुलाम थे, इसलिए हममे आत्‍मविश्‍वास की कमी आ गई थी। महर्षि दयानंद सरस्‍वती का सबसे बड़ा योगदान मैं यह मानता हूँ कि उन्‍होंने उस समय भारतीयों के खोए हुए आत्‍मविश्‍वास को फिर जागृत किया, और उनकी सोयी हुई शक्‍ति को झकझोरा। उन्‍होंने ‘वेदों की ओर लौट चलो’ का नारा देकर यह बताया कि भारत की प्राचीन संस्‍कृति और चिंतन विश्‍व की सर्वश्रेष्‍ठ संस्‍कृति और चिंतन में से एक हैं।
मुझे यह बात भी महत्‍वपूर्ण लगती है कि उन्‍होंने अपनी बात उपदेश-पद्धति के द्वारा ही नहीं, बल्‍कि वाद-विवाद और तर्क-वितर्क के द्वारा कही। इस बारे में उनकी शक्‍ति अद्भुत थी। उन्‍होंने लोगों को केवल आस्‍थावान नहीं बनाया, बल्‍कि बात सप्रमाण कहकर ज्ञानवान बनाया। लोग प्रश्‍न पूछते थे, और वे उनका सप्रमाण उत्तर देते थे। चूंकि उनके उत्तर तर्क पर आधारित होते थे, इसलिए लोगों पर उनका प्रभाव पड़ता था।
तर्क को वे ज्ञान का मुख्‍य आधार मानते थे। दिनांक 24 जुलाई, 1877 को बंबई में आर्य समाज के जो 10 मूल सिद्धांत बनाए गए थे, उनमें चौथा और पाँचवा सिद्धांत तर्क की प्रधानता वाले हैं। चौथे सिद्धांत के अंतर्गत कहा गया है-
‘‘हमें हमेशा सत्‍य को स्‍वीकार करने, तथा असत्‍य को अस्‍वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए।’’
अगले नियम में कहा गया है-
‘‘हमारे प्रत्‍येक कार्य सही एवं गलत का निर्णय करने के बाद धर्मा के अनुकूल होने चाहिए।’’
यहां तक कि उन्‍होंने ईश्‍वर पर भी विश्‍वास करने की बात नहीं कही, बल्‍कि ज्ञान के आधार पर उसे जानने की बात कही। आर्य समाज के पहले नियम में उन्‍होंने स्‍पष्‍ट रूप से कहा-
‘‘ईश्‍वर उन सभी सच्‍चे ज्ञान और सभी वस्‍तुओं का आदि स्‍त्रोत है, जिन्‍हें ज्ञान द्वारा जाना जा सकता है।’’
दयानंद सरस्‍वती जी ने उस समय समाज की कुरीतियों, अंधविश्‍वासों और जड़ताओं के विरोध का जो बीड़ा उठाया, उसका भी मूल आधार तर्क ही था। स्‍वाभाविक है कि इसलिए उन्‍होंने शिक्षा पर बहुत अधिक जोर दिया। वे शिक्षा को व्‍यक्‍ति और राष्‍ट्र की उन्‍नति का आधार मानते थे। ‘सत्‍यार्थ प्रकाश’ के तृतीय समुल्‍लास में हमें शिक्षा के बारे में उनके विचार जानने को मिलते हैं। उन्‍होंने तृतीय समुल्‍लास के आरंभ में ही लिखा है-
‘‘संतानों को उत्तम विद्या, शिक्षा, गुण, कर्म और स्‍वभावरूप आभूषणों का धारण कराना माता, पिता, आचार्य और सम्‍बन्‍धियों का मुख्‍य कर्म है।’’
उन्‍होंने यहां तक लिखा है-
‘‘राजनियम और जातिनियम होना चाहिए कि पाँचवे-आठवें वर्ष की आगे अपने लड़कों ओर लड़कियों को घर में न रखें। पाठशाला में अवश्‍य भेज देवें। जो न भेजे, वह दंडनीय हो।’’
दयानंद सरस्‍वती ने जिस ‘आर्य समाज’ की स्‍थापना की थी, उसका हमारे देश में शिक्षा के विकास में अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है। मुझे इससे भी अधिक महत्‍वपूर्ण बात यह लगती है कि दयानंन्‍द सरस्‍वती ने लड़कियों के लिए शिक्षा की बात कहकर अपने समय के समाज में एक हलचल पैदा की थी। अभी मैंने जो उदाहरण दिया, उसमें उन्‍होंने लड़कियों के लिए भी शिक्षा की बात कही है। केवल इतना ही नहीं, बल्‍कि उन्‍होंने नारी-विकास के लिए अन्‍य अनेक महत्‍वपूर्ण बातें कहीं। इनका उल्‍लेख ‘सत्‍यार्थ प्रकाश’ में मिलता है। उन्‍होंने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा-
लड़कियों को भी लड़कों के समान पढ़ाना चाहिए।
प्रत्‍येक कन्‍या का अपने भाई के समान यज्ञोपवित संस्‍कार होना चाहिए।
लड़कियों का विवाह न तो बाल्‍यावस्‍था में हो, न हो उसकी इच्छा के विपरीत हो।
पुत्री भी अपने भाई के समान दायभाग में अधिकारिणी हो।
विधवा को भी विधुर के समान विवाह का अधिकार है।
उन्‍होंने स्‍पष्‍ट रूप से कहा-
‘‘विवाह लड़के और लड़की की पसंद के बिना नहीं होना चाहिए, क्‍योंकि एक-दूसरे की पसंद से विवाह होने से विरोध बहुत कम होता है, और संतान उत्तम होती है।’’
निश्‍चित रूप में आर्य समाज ने इस दिशा में महत्‍वपूर्ण काम किया। दयानन्‍द जी के इन प्रगतिशील विचारों का प्रभाव समाज पर पड़ने से धीरे-धीरे नारी के प्रति समाज का दृष्‍टिकोण बदला। यह बात अत्‍यंत महत्‍व की है कि दयानंद सरस्‍वती के निधन से पचास वर्ष से भी पहले बाल-विवाह को रोकने के लिए ‘शारदा विवाह कानून’ पारित हुआ। इसी प्रकार अंतर्जातीय विवाहों को वैध घोषित करने के लिए ‘आर्य विवाह कानून’ भी पारित किया गया।
यदि वेदों का आश्रय लिया जाए, और तर्क के आधार पर सोचा जाए, तो मानव-मानव में कोई भेद मालूम नहीं पड़ता। वेदों में कहा गया है- ‘‘एकैव मानुषि जाति’’। स्‍वामी दयानन्‍द सरस्‍वती ने भी संपूर्ण मानव-जाति को एक मानते हुए, उनके आचारण को प्रधानता दी है। ‘सत्‍यार्थ प्रकाश’ में उन्‍होंने स्‍पष्‍ट रूप से लिखा-
‘‘जो दुष्‍टकर्मकारी-द्विज को श्रेष्‍ठ और श्रेष्‍ठकर्मकारी-शूद्र को नीच माने, तो इससे परे पक्षपात, अन्‍याय, अधर्म दूसरा अधिक क्‍या होगा।’’
स्‍पष्‍ट है कि उनके लिए आचारण महत्‍वपूर्ण था, जन्‍म नहीं। वे धर्म को भी सीधे-सीधे आचारण से जोड़ते थे। उन्‍होंने धर्म से जुड़े सभी आडंबरों, पाखंडों और अंधविश्‍वासों का अपने तर्क के बल पर खण्‍डन किया, और धर्म को सीधे-सीधे जीवन-व्‍यवहार का अंग बनाया। उन्‍होंने ‘स्‍वमन्‍तव्‍यामन्‍तव्‍यप्रकाश’ के अनुच्‍छेद 3 में लिखा है-
‘‘जो पक्षपातरहित न्‍यायाचरण, सत्‍यभाषणादियुक्‍त ईश्‍वराज्ञा वेदों से अविरुद्ध है, उसको धर्म…… मानता हूँ।’’
इसी प्रकार ‘‘ऋग्‍वेदादिभाष्‍य’’ के पृष्‍ठ के 395 पर धर्म के लक्षण की चर्चा करते हुए वे लिखते है-
‘‘सत्‍यभाषणात् सत्‍याचरणाच्‍च परं धर्म लक्षणां किचिंन्‍नास्‍त्‍येव’’
अर्थात्, सत्‍यभाषण और सत्‍याचरण के अतिरिक्‍त धर्म का कोई दूसरा लक्षण नहीं है।
👉🏼 मैंने ये उद्धरण यहां इसलिए दिये हैं, ताकि इस बात को अच्‍छी तरह से समझा जा सके कि महर्षि दयानंद सरस्‍वती का धर्म न तो किसी जाति, क्षेत्र और लोगों तक सीमित था, और न ही उसका संबंध किसी प्रकार की संकीर्णता और अव्‍यवहारिकता से था। उनके लिए धर्म व्‍यक्‍ति के आचरण का निर्माण करने वाला तत्‍व था। इसके साथ ही वह समाज का विधान करने वाली व्‍यवस्‍था थी। मैं समझता हूं कि दयानंद सरस्‍वती के विचारों को इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए। विशेषकर एक ऐसे समय में, जबकि निहित स्‍वार्थ धर्म की अपनी-अपनी दृष्‍टि से व्‍याख्‍या कर रहे हों, यह जरूरी हो जाता है कि दयानंद सरस्‍वती जैसे महापुरुषों के विचार लोगों के सामने रखे जाएं, ताकि लोग धर्म के सच्‍चे स्‍वरूप को समझ सकें, और उसके अनुकूल आचरण कर सकें।
यदि दयानंद सरस्‍वती जी की स्‍वराज्‍य का प्रवक्‍ता कहा जाए, तो गलत नहीं होगा।
श्रीमती एनी बेसेंट ने ‘इडिया ए नेशन’ से बिल्‍कुल सही लिखा है-
‘‘स्‍वामी दयानंद जी ने सर्वप्रथम घोषणा की कि भारत भारतीयों के लिए है।’’
ठीक इसी प्रकार लोकमान्‍य तिलक ने उन्‍हें ‘‘स्‍वराज्‍य का प्रथम संदेशवाहक तथा मानवता का उपासक’’ कहा।
मातृभाषा, मातृसंस्‍कृति, मातृभूमि और मातृशक्‍ति के प्रति दयानंद जी के मन में अगाध और गहरा लगाव था। वे स्‍वेदशी के समर्थक थे। उन्‍होंने विदेशी कपड़ों के बहिष्‍कार की बात कही थी। संस्‍कृति के प्रकांड विद्वान और गुजरातीभाषी होने के बावजूद उन्‍होंने लोगों की सुविधा की दृष्‍टि से अपनी बात हिन्‍दी में कही, और ‘सत्‍यार्थ प्रकाश’ हिन्‍दी में लिखी। निश्चित रूप से इससे उस समय के भारतीयों की आत्‍मशक्‍ति जाग्रत हुई, और उनका आत्‍मविश्‍वास बढ़ा। हमारे देश की सोई हुई शक्‍ति को उन्‍होंने सक्रिय करके राष्‍ट्रीय आंदोलन तथा सामाजिक एवं सांस्‍कृतिक क्रांति की दिशा में प्रेरित किया।
पंडित नेहरू ने अपनी पुस्‍तक ‘भारत एक खोज’ में उन्‍हें बिल्‍कुल सही ‘’विचारों की नयी प्रक्रिया शुरू करनेवाले चिंतकों में से एक’ माना है। डॉ. राधाकृष्‍णन ने उनके कार्यों को ‘’मूक क्रांति’’ का नाम दिया। मुझे इससे कोई दो मत नहीं मालूम पड़ते कि उन्‍होंने चिंतन में जिस दूरदृष्‍टि का परिचय दिया, और जिन कार्यों को शुरुआत की, उसका हमारे देश पर सकारात्‍मक प्रभाव पड़ा। आज हम अपने सामने उन कार्यों की उपयुक्‍तता देख सकते हैं।
मुझे ऐसा लगता है कि एक ऐसे समय मे, जबकि एक नयी विश्‍व व्‍यवस्‍था उभर रही है, स्‍वदेशी की भावना की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। हम विश्‍व-व्‍यवस्‍था में अलग नहीं रह सकते। लेकिन हमें इस बात का भी संकल्‍प लेना होगा कि हम अपनी संस्‍कृति, अपनी जड़ों से भी अलग नहीं रह सकते। मैं समझता हूँ, कि दयानंद सरस्‍वती जी के दर्शन का यह एक महत्‍वपूर्ण संदेश था और आज हमारे देश को इसे पूरे मनोयोग के साथ अपनाना चाहिए। मुझे विश्‍वास है कि इस तरह के समारोह दयानंद सरस्‍वती जी के जीवन-दर्शन को देश के लोगों तक पहुँचाने में सहायक होंगे।
बापू ने ‘हरिजन’ के 5 मई, 1932 के अंक में लिखा था-
‘‘दयानन्‍द जी की आत्‍मा आज भी हमारे बीच काम कर रही हैं। वे आज उस समय से भी अधिक प्रभावशाली हैं, जबकि, वे हमारे बीच सदेह थे।’’
मैं आशा करता हूँ कि देश के लोग भी इसी तरह का अनुभव कर रहे होंगे। हमारे लोगों को ऐसे प्रगतिशील दृष्‍टिकोण वाले समाज की स्‍थापना के लिए काम करना है, जिसमें कोई अशिक्षित नहीं होगा, कोई अस्‍पृश्‍य और छोटा-बड़ा नहीं होगा तथा जिसमें नारी के प्रति पूर्ण सम्‍मान का भाव होगा। और यही इस महापुरुष के प्रति सच्‍ची श्रद्धांजलि होगी।
आप लोगों ने मुझे इस कार्यक्रम में शामिल किया, इसके लिए मैं आप सबका आभारी हूँ।
जय हिन्‍द
डॉ. शंकरदयाल शर्मा
राष्ट्रपति, भारत

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
ngsbahis giriş
artemisbet güncel
bettilt giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betnano güncel giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
Kolaybet Giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
onwin
grandpashabet giriş
bettilt giriş
Betgaranti
sahabet giriş
betgaranti
norabahis giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
Kolaybet Giriş
onwin giriş
onwin giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
grandpashabet giriş
kolaybet giriş
Kolaybet giriş
kolaybet giriş
kolaybet
betgaranti giriş
sahabet
sahabet
marsbahis giriş
onwin
onwin
favorisen giriş
favorisen giriş
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betkanyon
betkanyon
sahabet giriş
betkanyon giriş
betkanyon giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
onwin
onwin
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş