भारतीय संस्कृति, दयानंद और संविधान के मूल अधिकार

भारतीय संस्कृति मानव की स्वतंत्रता की ही नही अपितु प्राणि-मात्र की स्वतंत्रता की भी उद्घोष है। जिस देशकी संस्कृति में पग-पग पर पशुओं और वनस्पतियों की रक्षा करने के लिए मनुष्य को प्रेरित किया जाता हो उस देश के लिए यह कहना सर्वथा अनुचित ही है कि इस देश में मानव के मौलिक अधिकारों का कोई उल्लेख नही है। हमने समष्टि के कल्याणार्थ जिन उत्कृष्ट मानवीय मूल्यों को अपनाया वस्तुत: भारतीय संस्कृति में मानव के वही मूल्य उसके लिए मौलिक अधिकार हैं।
किसी भी वस्तु का मूल्य उसके कूल में उसके भाव में, उसकी निजता में, उसके स्वत्व में निहित होता है। भारतीय संस्कृति का मूल, उसका भाव, उसकी निजता, उसका स्वत्व वेद है। वेद ही भारतीय संस्कृति के प्राण हैं। इस प्राणतत्व के बिना भारतीय संस्कृति निर्मूल्य ही सिद्घ होगी। वेदों में ऋषियों का समष्टिवादचिंतन मुखरित हुआ है। उस समष्टिगत चिंतन में समष्टिवाद इस प्रकार से ओत प्रोत है, कि उसे इस संस्कृति से अलग किया जाना असंभव है। जिस प्रकार समुद्र से मिलकर नदी अस्तित्वविहीन हो जाती है औरर उसका अस्तित्व समुद्र की महानता के साथ एकाकार हो जाता है उसी प्रकार समष्टिगत चिंतन रूपी समुद्र में व्यष्टिगत चिंतन एकाकार होकर उसका अपना स्वरूप समष्टिवाद की महानता के स्वरूप में मिलकर और भी महान हो जाता है। इसलिए वेद समष्टि के कल्याणार्थ व्यष्टि के स्वार्थों को समाप्त करने पर बल देते हैं।
वेद व्यक्ति से बार-बार बुलवाते हैं-इदन्नमम् स्वाहा। अर्थात यह मेरा नही है। मैं अपने स्वार्थ की आहूति देता हूं। व्यक्ति कहता है कि यज्ञ में (वृहत रूप में संसार रूपी यज्ञ में भी) मैं जिसे छोड़ रहा हूं अर्थात जिस वस्तु की आहुति दे रहा हूं, वह मेरा नही है। व्यक्ति का समष्टि के लिए यह त्याग यज्ञमयी जीवन है। यज्ञ का सीधा सा और सरल सा अर्थ है कि यहां दूसरों के लिए कुछ न कुछ छोड़ो, त्याग करो, स्वयं को समर्पित करो, दूसरों के विकास के लिए। आपकी यह स्थिति अपने बच्चों तक ही सीमित न रह जाए, अपितु यह संसार और संसार के प्रत्येक प्राणी तक के लिए बन जाए। अपने बच्चों के लिए तो संसार का हर व्यक्ति कुछ न कुछ त्याग करता है। परंतु आनंद तो दूसरों के लिए कुछ करने में है।
परिवारगत मोह समष्टिïगत मानस में जाकर वास्तविक प्रेम बन जाता है। कहने का अभिप्राय है कि मोह का पूर्ण विस्तार भी वास्तविक प्रेम है। इसी प्रेम के लिए संसार का प्रत्येक प्राणी तड़प रहा है। भारतीय ऋषियों ने मोह को मारने की बात नही की अपितु उसे प्रेम के रूप में परिवर्तित कर विस्तार देने की बात कही है। यह अलग बात है कि हम अपने मोह को जितना अधिक विस्तार देते जाते हें यह उतना ही हमारे व्यक्तित्व को सोने से कुंदन बनाता चला जाता है। अंत में हम देखते हैं कि जब हम वास्तविक प्रेम के सागर में गोते लगा रहे होते हैं तो मोह भी वास्तवकि प्रेम के सागर में उसी प्रकार विलीन हो जाता है जिस प्रकार सागर में नदियां विलीन हो जाती हैं। ध्यान देने योग्य बात ये है कि सागर में भी नदियों का अस्तित्व है, पर अब आप उसे ढूंढ नही सकते। इसी प्रकार वास्तविक प्रेम में भी, कहीं न कहीं मोह है पर अब आप उसे भी ढूंढ नही पाओगे। इसलिए कई बार ऐसा लगता है कि हमें हमारे महापुरूष मोह को मारने की शिक्षा दे रहे हैं। पर हम यह नही समझ पा रहे हैं कि मोह को मारना किस प्रकार है?
यह प्रेम बड़ा ही पवित्र शब्द है। संसार के शब्दकोश में इससे सुंदर शब्द नही है। इसके विषय में यह भी सत्य है कि इसे दिया है भारतीय संस्कृति ने ही। ये मोह, माया, ममता, वासनात्मक लगाव और ऐसे ही अन्य मानसिक भाव तो इस प्रेम के बहुत ही छोटे स्वरूप हैं। संसार का मनुष्य प्रेम के इन लघुतम स्वरूपों में ही भटक कर रह जाता है और इन्हीं की उपासना में लगा रह जाता है। इसलिए वह अपने स्वरूप का और अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नही कर पाता है। परवाने दीपक पर आ आकर बार-बार मर रहे हैं तो यह उनकी महानता नही है, यह उनकी उपासना का सर्वोत्कृष्ट ढंग भी नही है, अपितु यह उनकी निरी अज्ञानता है। किसी की अज्ञानता किसी कवि के द्वारा महिमा मंडित की जा सकती है-परंतु वह किसी विद्वान के द्वारा महिमा मंडित नही की जा सकती है-विद्वान उस पर शांत रहेगा। उसके प्रति तटस्थ रहेगा। निरपेक्ष रहेगा। यही कारण है कि प्रेम के निम्नतम स्वरूप वासना के उपासक युवा और युवतियों की अज्ञानता जनित गतिविधियां या मनोदशा कई बार कवियों के लिए कविता करने का माध्यम तो बन जाती है परंतु वह विद्वानों के लिए चर्चा का विषय तक नही बन पातीं।
हमारी संस्कृति हमें बताती हैं कि लघु से विशाल की ओर चलो। सरल से कठिन की ओर चलो। पशु जगत में छोटी मछली बड़ी मछली को खा रही हैं तो यह बात तुम्हारे चिंतन को प्रभावित करने वाली नही होनी चाहिए। क्योंकि यह स्वार्थ का भी अति लघु स्वरूप है। कारण कि मछली की योनि भोग योनि है, इसलिए उसकी ऐसी गतिविधि पर या जीवनचर्या पर भोग के अज्ञान की काली छाया पड़ी है। इसलिए मनुष्य से भारतीय संस्कृति अपेक्षा करती है कि तू अज्ञान की ऐसी काली चादरों को फाड़कर फेंक दे, और उसमें से स्वयं को बाहर निकाल। क्योंकि तेरी योनि योग योनि भी है? स्मरण रख कि भोग से रोग लगेगा, जीवन मरण का चक्र चलेगा और योग से रोग भगेगा। जीवन मरण का चक्र छूटेगा।बस यही तो है जीवन का वास्तविक रहस्य और जीवन का वास्तविक उद्देश्य।
पश्चिम की संस्कृति ने वेद के इस रहस्य को नही समझा। इसलिए उसकी उपासना का और आराधना का केन्द्र सदा ही व्यक्ति का लघु स्वरूप रहा है। उसने वासना की उपासना प्रेम समझकर की है। उसने रसना की आराधना प्रेम समझकर की है-परिणाम दोनों का आया है-मृत्यु। जहां मोक्ष का नितांत अभाव है। जहां मोक्ष की सारी संभावनाएं क्षीण हैं। जहां मोक्ष की कल्पना तक नही की जा सकती। पश्चिमी जगत भारत के वेदों के इस निर्देश को अपने जीवन का और अपनी जीवन शैली का आधार नही बना पाया कि परस्पर ऐसे प्रेम करो जैसे एक गाय अपने नवजात बछड़े को करती है। जबकि भारतीय ऋषियों की ऐसी एक बहुत लंबी परंपरा रही है, एक बहुत बड़ी श्रंखला है जो इसी प्रकार के वास्तविक प्रेम में विश्वास करती रही है। यही कारण है कि महानता ने पश्चिम की अपेक्षा सदा ही पूरब का वरण किया है। यह केवल और केवल जीवन शैली का ही अंतर है, जिसने हमें कहां से उठाकर कहां पहुंचा दिया? ऐसी उत्कृष्ट मानव जीवन शैली में मानव के मौलिक अधिकार भी बड़े ही पवित्र और सर्वोत्कृष्ट हैं। इन सारे मौलिक अधिकारों का आधार हमारे यहां सर्वप्रथम प्रेम है। प्रेम की पहली ईंट पर ही मानवता का भव्य भवन रखने वाली भारतीय संस्कृति को नमन करना इसीलिए प्रत्येक भारतीय का प्रथम कर्तव्य है। जिसे अक्षुण्ण रखने और बनाये रखने की बात हमारे संविधान ने कही है।
यह नि:संदेह सत्य है कि भारत के संविधान में रखे गये मौलिक अधिकार भारत की सांस्कृतिक परंपरा के अनुकूल है, परंतु इन पर प्रभाव पश्चिम के चिंतकों का है। यदि इन्हें भारतीय मनीषा की भट्टी में तपाकर निकाला जाता है तो सोने से कुंदन बन सकते थे। पर हमें यहां आलोचनात्मक बातें नही करनी हैं। आईए हम देखें कि भारतीय संविधान कौन-कौन से मौलिक अधिकार प्रदान करता है-
संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार
भारत के संविधान द्वारा देश के नागरिकों को निम्नलिखित मूल अधिकार प्रदान किये गये हैं:-समता का अधिकार
अपने संविधान का अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता की बात कहता है। अनुच्छे 15 धर्म, जाति मूलवंश लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नही किया जाएगा।
अनुच्छेद 16 लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता।
अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता की समाप्ति।
अनुच्छेद 18 उपाधियों की समाप्ति।
समता के संदर्भ में भी वेद की व्यवस्था ही अनुकरणीय है। वेद मानव को उन्नतिशील और प्रगतिशील बनाने के लिए जिस समता मूलक समाज की अवधारणा का प्रतिपादन करता है। उसके लिए वह प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर का आलोक देखता है और प्रत्येक मनुष्य को ही अमृतरूप ईश्वर का अमृतपुत्र मानता है। इसलिए वेद प्रत्येक मनुष्य को संबोधित करते हुए कहता है।
शुक्रोअसि, भ्राजोअसि, स्वअसि, ज्योतिरसि आप्नुहि श्रेयां समति समं क्राम।
हे नर! तू तो शुद्घ है, तेजस्वी है, आनंदमय है, ज्योतिष्मान है। अरे, अपने आपको पहचान। बराबर वालों से आगे बढ़ और श्रोष्ठों तक पहुंच।
उत्क्रांमत: पुरूष मावपत्था:
हे मनुष्य उन्नति करता जा, अवनत मत हो।
उद्यानं ते पुरूष नावयानं जीवातुं ते दक्षतातिं कृणोमि।
हे नर! देख जीवन में तेरी उन्नति ही होनी चाहिए। उधोगति नही। मैं तेरे अंदर जीवन स्फूर्ति और बल को फंकता हूं।
ब्रहमास्पतिर्मे आत्मा, नृमणा नाम हृद्य।
मेरी आत्मा बड़ी शक्ति की भंडार है। मैं नेतृत्व शक्ति से भरे मन वाला हूं तथा सबके हृदय को प्रिय लगने वाला हूं।
उग्रो अर्चिषा दिवमारेाह सूर्य।
हे आत्मा बड़ी शक्ति की भंडार है। मैं नेतृत्व से भरे मन वाला हूं तथा सबके हृदय को प्रिय लगने वाला हूं।
उग्रो अर्चिषा दिवमारोह सूर्य।
हे सूर्य समान तेजस्वी मनुष्य। तू अपने तेज के साथ उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर चढ़ जा।
इस प्रकार हम देखते हें कि संविधान का समतावाद तो वेदसम्मत है, परंतु संविधान जिस समता की बात करता है उसके लिए संविधान मेधा का मार्गदर्शन पश्चिम का चिंतन कराता है। महर्षि दयानंद का चिंतन भी समतावादी समाज की स्थापना का था। उन्होंने समाज से अस्पृश्यता के निवारणार्थ और दलित शोषित, एवं उपेक्षित समाज के कल्याणार्थ सतत संघर्ष किया। उनके संघर्ष से प्रेरणा पाकर बहुत से लोगों ने देश से अस्पृश्यता निवारण की दिशा में अथक प्रयास किये।

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