images (59)

भारतीय मनीषा में प्रत्येक पर्व के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण है। इसका कारण भारतीय धर्म का वैज्ञानिक स्वरूप है। भारतीय संस्कृति का पावन भवन कर्म और विज्ञान के समुच्चय पर खड़ा किया गया है। इस समुच्चय को ही ‘सत्य’ और ‘धर्म’ माना गया है। कर्म को जीवन का आधार बनाकर ज्ञान-विज्ञान से उसका परिष्कार किया जाये। श्रेष्ठ समाज की संरचना का इससे बढ़िया मूल मंत्र और क्या हो सकता है? भारतीय धर्म में विज्ञान का, विवेक का और विचार का हमेशा से सम्मान किया गया है। विज्ञान, विवेक और विचार की इसी त्रिवेणी से भारतीय संस्कृति की धारा निकलती है। यह धारा अनादिकाल से भारत की पुण्य भूमि को सींचती चली आ रही है। ‘कर्म’ में ‘त्रुटि’ का समावेश संभव है। जबकि विज्ञानवाद में किसी पाखण्ड का प्रवेश संभव नहीं है। इसीलिए कर्म पर ‘विज्ञान’ की नकेल आवश्यक है।

हमारा कर्म तर्क तुला पर भी खरा हो। सोने सा खरा । यदि ऐसा है तो हमारा जीवन वास्तव में पवित्रता, निर्मलता और शुद्धता का प्रतीक है। मध्यकाल में हमारा धर्म पाखण्ड, ढोंग और अंधविश्वासों का कूड़ा करकट बन गया जो कि दुर्भाग्य से आज तक भी है। ‘विज्ञानवाद’ की कैंची यदि इसके अवांछित आवरण पर चलाई जाये तो इसका शुद्ध स्वरूप उपलब्ध होना संभव है। इसमें समस्या ये है कि भारत के ‘पोप’ अपनी रोजी-रोटी पर संकट आता देख पाखण्ड, ढोंग और अंधविश्वासों को यथावत बनाये रखने के लिए तो सचेष्ट होते हैं, पर भारतीय जनसाधारण को उसके धर्म का वास्तविक स्वरूप समझाने के लिए नहीं होते। सुधारक एक होता है, विध्वंसक अनेक होते हैं। इससे भारतीय धर्म का वैज्ञानिक स्वरूप अपने अधिकांश रूप में दृष्टि से ओझल हो गया है। हमारे पर्व और त्यौहार भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। पर्वों के यौगिक अर्थ भुला दिये गये

हैं-सबकुछ रूढ़िवाद में ढालकर किया जा रहा है। किसी से पूछिये आपकी अमुक पर्व में इतनी श्रद्धा क्यों है तो उत्तर मिलेगा कि परंपरा से पूर्वज मनाते चले आ रहे हैं इसीलिए हम मनाते हैं। यह ‘परंपरा’ का भूत वास्तव में हमारे लिए अंधविश्वासों का जनक बन गया है। कोई भी मूर्खता इसी परंपरा के भूत से ही भारतीय समाज में प्रसारित होती है। कभी-कभी तो परंपरा से भी परे जाकर यहां गणेश जी दूध तक पी लेते हैं। विज्ञानवाद से परे हट गया भारतीय जन साधारण ‘अंधविश्वासों’ में फंसा होने के कारण ऐसी अवैज्ञानिक और मूर्खतापूर्ण बातों को भी ‘दैवीय चमत्कार’ मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेता है। जो सब में है, और जिसमें सब हैं, जो गणेश में भी है अर्थात मूर्ति में भी है और दूध में भी है, जो सबको ग्रहण किए हुए है और जिसे सब ग्रहण किए हुए हैं, उसे भी दूध पिला दिया जाता है- बिना तर्क तुला पर बात को तोले। यह कैसा धर्म ? कैसा सत्य? कैसी धार्मिकता? असत्य पर आधृत पाखण्ड धर्म का स्थानापन्न नहीं हो सकता। अनुचरत्व में सीमाएं लांघ जाना- अनुचर स्वामी का स्वामी बनने लगे तो यह कैसा लोकाचार ?

हमारे देश में प्राचीन काल से पूर्णमासी और अमावस्या के सर्वाधिक प्रचलित त्यौहार हैं। यह दोनों ही पाक्षिक पर्व हैं जो कि हर महीने सामान्यतः 15 दिन के अंतर पर आते हैं। हर महीने आते हैं इसीलिए इनकी महत्ता होते हुए भी इन्हें अधिक महत्व नहीं दिया जाता। यह मानवीय स्वभाव भी है कि जो वस्तु जितनी अधिक सामान्य हो जाती है उसका उतना ही अधिक अवमूल्यन हो जाता है। इस सबके उपरांत भी आज भी हम भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में इन दोनों दिनों को कुछ विशेष बातें देखते हैं। जैसे इन दोनों दिनों को प्रत्येक गृहस्थी घर में क्षीर (खीर) बनाता है। कुछ विद्वानों को इस दिन भोजन पर आमंत्रित कर उन्हें भोजन कराना अपना परम सौभाग्य समझता है। यज्ञ-हवन के आयोजन किए जाते हैं। प्रसाद भी वितरित किए जाते हैं। ऐसा क्यों होता है-हमें इसी पर विचार करना होगा।

हमारी पृथ्वी की दो गतियां हैं। यह सूर्य का चक्कर दो प्रकार से लगाती है। प्रथमतः अपनी कोली पर चौबीस घंटे में घूम जाती है। जिससे दिन और रात का निर्माण होता है। पृथ्वी की इस गति का नाम परिभ्रमण है। द्वितीयतः पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। उसका चक्कर 3641/4 दिन में पूर्ण होता है। पृथ्वी की इस गति से ऋतुओं का निर्माण होता है। जिसे पृथ्वी की परिक्रमण गति कहा जाता है। खगोलविदों के मान्य-सिद्धांतों के अनुसार पृथ्वी और चंद्रमा के भीतर अपना प्रकाश नहीं है। यह चंद्रमा सूर्य की किरणों से चमकता है। पृथ्वी के अंधेरे भाग पर चंद्रमा के प्रकाशित भाग से जो प्रकाश की किरणें परावर्तित होती हैं, उन्हें हम चांदनी कहते हैं। हम यह देखते हैं कि हमारा चंद्रमा कभी घटते-घटते एक दिन पूर्ण ओझल हो जाता है। चंद्रमा का इस प्रकार ओझल हो जाना अमावस्या का और बढ़ते 2 पूर्णता को प्राप्त कर लेना पूर्णिमा का कारण बनता है। घटते चांद के पखवाड़े को कृष्ण पक्ष और बढ़ते चांद के पखवाड़े को शुक्ल पक्ष कहते हैं। इसके घटने-बढ़ने को ही चंद्रकलाएं कहते हैं। यह कलाएं अधिकतम 16 हो सकती हैं। अमावस्या के दिन जब कभी चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के मध्य आ जाता है तो सूर्य ग्रहण होता है। पूर्णिमा के दिन पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के मध्य आ जाती है, जिससे पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है और उस पर अंधेरा छा जाता है। इसी को चंद्रग्रहण कहते हैं। सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के अवसरों पर सम्पूर्ण विश्व के वैज्ञानिक सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की विशेष स्थितियों और परिस्थितियों का आकलन करने के लिए अपनी-अपनी प्रयोगशालाओं में सक्रिय रहते हैं।

आधुनिक समय में हमारे वैज्ञानिकों का इस प्रकार सक्रिय हो उठना भारत की प्राचीन परंपरा का ही अधुनातन स्वरूप है। प्राचीनकाल में इसी कार्य को हमारे ऋषिगण किया करते थे। ऋषि तो होता ही चिंतन का अधिष्ठाता है। प्रत्येक नई घटना पर उसके मानस में गुदगुदी अवश्य होती है। यह गुदगुदी उसके मानस के चिंतन के फव्वारे को फूटने के लिए प्रेरित करती है। आधुनिक काल का वैज्ञानिक तो सूर्य ग्रहण और चंद्रगहण की अमावस्या और पूर्णिमा को ही सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की स्थिति और परिस्थितियों का आकलन करते हैं जबकि प्राचीन भारत के ऋषिगण हर अमावस्या और पूर्णिमा को ऐसा किया करते थे। विद्वानों की प्राचीन भारत में कमी नहीं थी, गली मुहल्लों तक में ये विद्वान लोग सहजता से उपलब्ध रहते थे। ज्योतिष ग्रंथों के अध्ययन में निष्णात ये विद्वज्जन भी सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा को गृहचाल और उसका मानव जाति पर संभावित प्रभाव देखने के लिए अपने- अपने ज्योतिष ग्रंथों में और नई-नई शोधों में डूब जाया करते थे।

जीर्ण-शीर्ण अवस्था में कुछ अंधविश्वासों और पाखण्डपूर्ण कार्यों के साथ यह परिपाटी भारतीय समाज में आज भी देखने को मिलती है। भारत का सामाजिक ढांचा इतने सुविचारित ढंग से तैयार किया गया था कि जो समाज और राष्ट्र के कल्याण हेतु जीवन होम किए होते थे उन विद्वानों की जीविका का सम्पूर्ण व्यय समाज के वो लोग जो गृहस्थ धर्म के दायित्वों से बंधे होते थे, स्वेच्छा से वहन किया करते थे। इसमें वो गृहस्थ लोग किसी प्रकार का कष्ट अनुभव नहीं करते थे। इससे भारत में विद्वानों की कमी नहीं होती थी। उनका चिंतन परमार्थ में लगा रहता था।

इसी प्रकार गृहस्थ का जीवन भी विद्वानों के सत्कार में व्यतीत होने से ही धन्य माना जाता था अतः उनका जीवन भी परमार्थ में ही लिप्त रहता था। स्वार्थ कहीं नहीं था परमार्थ ही परमार्थ का बोलबाला था। ऐसी सुंदर सामाजिक व्यवस्था थी। कालांतर में धर्म की समीक्षा की परंपरा न अपनाने के कारण सामाजिक ढांचा भी विद्रूपित होने लगा। समीक्षा व्यवस्था की भी आवश्यक है। इस सत्य की उपेक्षा की गई। फलतः समाज में दुर्व्यसनी लोग भी लाल वस्त्र धारण कर विद्वान कहलाकर पूजा के पात्र बनने लगे। अपात्रों की पूजा होने लगी।

हमें यह मानना पड़ेगा-

“यत्र अपूज्य पूज्यते, तत्र दुर्भिक्षं मरणं भयं।” जहां अपूज्यों का पूजन होता है वहां अकाल, भय और मृत्यु का साम्राज्य होता है।

कहना न पड़ेगा कि भारत की तबाही का कारण इन अपूज्यों का पूजन ही बना। भारत की इसी प्राचीन परमार्थ चिंतन से ओतप्रोत सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत आज भी हम पूर्णिमा और अमावस्या को ऐसे विद्वानों का सत्कार कर उन्हें दिव्य भोजन खोर को खिलाते हैं, जो हमारे लिए कल्याण की मंगल कामना कर रहे हैं। उनके प्रति इतनी कृतज्ञता प्रकट करना आवश्यक भी है। आज का वैज्ञानिक वेतनभोगी है। पुरस्कारों का अभिलाषी है। उच्च वेतन और पुरस्कार प्राप्ति की भावना उसे समाज के कल्याणकारी कार्यों के लिए प्रेरित करती है। इस विचारधारा के मूल में स्वार्थ है। फलस्वरूप समाज भी उनके प्रति उदासीन है। समाज भी स्वार्थी है। अतः वैज्ञानिक अपनी शोध करता रहे. समाज उसके प्रति कृतज्ञ नहीं है। कारण कि परमार्थ का चिंतन मूल में नहीं है। आधुनिकता के नाम पर सारा विश्व समुदाय स्वार्थ में डूबता जा रहा है। भारत पर्वो को परंपरा के अनुसार रुदिगत दृष्टिकोण से मनाता जा रहा है-अपने पत्र की वैज्ञानिकता को समझाने और विश्व समुदाय का ध्यान इस ओर आकृष्ट करने में भारत असफल रहा है।

समाज और संसार के कल्याण के शुभ विचारों का चिंतन-स्मरण पूर्णिमा और अमावस्या के दिन करने से उनका बहुत ही अच्छा प्रभाव हमारे मानस पर पड़ता है। यह परंपरा हमें आज भी भारतीय समाज में देखने को मिलती है। शुभ संकल्पों और विचारों को विचारवान लोग आज भी इन दिवसों को पुनः स्मरण करते हैं। यज्ञ और हवनों के आयोजनों में तो शुद्ध परमार्थ का भाव ही निहित होता है।

पूर्णिमा और अमावस्या के पीछे एक ऐतिहासिक कारण भी है। हमारे यहां प्राचीनकाल में सूर्यवंशी और चंद्रवंशी दो राजकुलों की वंश परंपरा मिलती है। राम सूर्यवंशी राजवंश परंपरा के प्रतिनिधि मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, तो कृष्ण चंद्रवंशी, राजवंश परंपरा के परम नीतिवान और योगिराज हैं। उस वंश परंपरा के प्रतिनिधि हैं।

भारतीय सांस्कृतिक और राजनीतिक गगनमण्डल में ये दोनों दैदीप्यमान नक्षत्र सूर्य और चंद्रमा की भांति चक्कर लगा रहे हैं। व्यक्ति-पूजा में परम आस्थावान भारतीय जनता ने इन दोनों आप्त पुरुषों को इतना अधिक सम्मान दिया है कि भावातिरेक में भगवान तक इन्हें मान लिया है। यद्यपि जीव ब्रहम नहीं हो सकता। हां, वह ब्रहम के समान अजन्मा और अमर अर्थात् अविनाशी सत्ता अवश्य है। ब्रह्म मय होकर मोक्ष को प्राप्त कर लेना जहां जीव को परम पद दिलाकर सर्वोच्चता प्रदान करते हुए उसे ईश्वर रूप होने की भ्रांति कराता है वहीं मुक्ति से पुनरावृत्ति के सिद्धांत से जीव की अल्पज्ञता स्वतः प्रमाणित हो जाती है। अतः जीव भगवान नहीं हो सकता।

भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में राम और कृष्ण को इतना महिमामंडित किया गया है कि यदि राम और कृष्ण को इससे निकाल दिया जाये तो (रूढ़िवादी) सनातन धर्म के पास तो कुछ रहेगा ही नहीं। यह सत्य भी है कि राम और कृष्ण का व्यक्तित्व और कृतित्व हम सब भारतीयों के लिए स्तवन और ‘वंदन के योग्य है। ‘मर्यादा’ और ‘नीति’ के प्रतीक इन दोनों आप्त पुरुषों की मर्यादा और नीति की भारत को ही नहीं अपितु समग्र संसार को आवश्यकता रही है और रहेगी भी।

इन दोनों आप्तात्माओं के संबंध में प्रचलित है कि राम बारह कलाओं के तो श्रीकृष्ण सोलह कलाओं के ज्ञाता थे। ये बारह और सोलह कलाएं क्या थीं? हमारा सूर्य बारह राशियों में से निकलकर बारह माहों से गुजरता है। सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते-लगाते जब पृथ्वी अपना परिक्रमण काल पूर्ण करती है तो वह इन सभी राशियों, संक्रांतियों और माहों से गुजर चुकी होती है। यह वास्तव में पृथ्वी का ही सफर है जो हमें सूर्य का यात्रापथ प्रतीत होता है। प्रत्येक माह में हम देखते हैं कि उसका मौसम कुछ अलग ही प्रकार का होता है। प्रत्येक माह के मौसम की भिन्नता सूर्य की बारह कलाओं के कारण होती हैं। जिस राशि और संक्रांति में सूर्य होता है मौसम पर उसी राशि और संक्रांति का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। पृथ्वी की गति और राशि व संक्राति के प्रभाव से हर माह का सूर्य हमें कुछ भिन्न सा लगता है।

इसीलिए 12 आदित्य माने गये हैं। हम हर माह में मौसम और सूर्य की गरमी का वैसा ही अनुभव करते हैं जैसा पिछले वर्ष उस माह में किया गया था। यह सब कुछ सूर्य की कलाओं में ही सम्मिलित है। पृथ्वी की विशेष स्थिति और गति के कारण सूर्य की दो गतियां बनती हैं जो उसके दो मार्ग माने जाते हैं- उत्तरायण और दक्षिणायन । बारह माह चैत्र, बैसाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद,

आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन । बारह राशि- मीन, मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ। इन दोनों मार्गों (उत्तरायण और दक्षिणायन ) का आगे के अध्यायों में वर्णन किया जायेगा। यहां राम के प्रसंग में इतना समझ लेना हो पर्याप्त है कि वो सूर्यवंशी होने के साथ-साथ सूर्य विज्ञानी भी थे। सूर्य का पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व बनाये रखने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान है। इस विज्ञान को श्रीराम जानते थे। सूर्य की बारह कलाओं में इस भूलोक का बहुत बड़ा विज्ञान समाहित है। उस सारे विज्ञान को भी श्रीराम जानते थे। अमावस्या यदि सूर्य से जुड़ी है तो सूर्य श्रीराम से और श्रीराम भारतीय संस्कृति के प्राण बनकर उसमें रमे हैं-रमे हैं तभी तो राम हैं। हर अमावस्या मौन

रूप से कितना बड़ा संदेश लेकर हर माह हमारे दर पर शांतिप्रदायिनी मुद्रा में आ उपस्थित होती है। यह हम भारतीयों का सौभाग्य ही है कि हम अपने इस अनमोल अतिथि का सत्कार हर माह सहज भाव से कर लेते हैं।

चंद्रमा की सोलह कलाएं सर्वविदित हैं। एक पखवाड़े में यद्यपि पंद्रह दिन ही होते हैं किंतु कभी-कभी सोलह दिन का पखवाड़ा (पक्षवार) भी होता है। चंद्रमा का अपनी कलाओं से घटना बढ़ना मानवीय जीवन में उत्थान-पतन को आवश्यक तत्व निरूपित करने के लिए पर्याप्त है। घटने-बढ़ने में चंद्रमा अपनी शीतलता (जो उसका धर्म है) को त्यागता नहीं शांत मना अपने यात्रा पथ पर अग्रसर रहता है। मानो वह कह रहा है- चरेवैति चरेवैति चलते रहो-चलते रहो। मानों वेद का यह संदेश उसने हृदयंगम कर लिया हो। अमावस्या का गहन अंधकार भी उसके मनोबल को तोड़ता नहीं। अपने बौद्धिक चातुर्य से विषमताओं पर नियंत्रण प्राप्त कर विशेष ऊर्जा और नव जीवन के संचार के साथ वह अगले दिन ही हमारे समक्ष आ उपस्थित होता है। ध्येय होता है-पूर्णत्व की प्राप्ति का हमारा जीवन उत्थान-पतन की क्रीड़ा स्थली है। जीवन है तो उत्थान और पतन के द्वंद्व का अस्तित्व भी स्वीकार करना पड़ेगा। हमें पतन के निम्नतम बिंदु पर निराश नहीं होना है। निम्नतम अवस्था ही तो उत्थान का निश्चयात्मक प्रमाण है। इसी प्रकार उच्चतम बिंदु, अर्थात जीवन के स्वर्णिम दिनों में अत्यधिक हर्षित नहीं होना है। क्योंकि उच्चतम अवस्था ही निम्नता की ओर लौटने का निश्चायक बिंदु है। हमें उगते हुए और अस्त होते हुए सूर्य की भांति दोनों अवस्थाओं में समभाव बनाये रखना हैं। सूर्य दोनों अवस्थाओं में लाल रंग का होता है। वैसे ही श्रीराम वन गमन के समय और उससे पूर्व राजतिलक के समय समभाव बनाये रखते हैं।

ऐसी सकारात्मक सोच, जीवन को उच्चता प्रदान करने वाले सृजनशील विचार हम अमावस्था और पूर्णिमा पर संकल्प के रूप में विचार कर सकते हैं। इन विचारों से हमारा चिंतन हमें जीवन की उत्कृष्टता की ओर ले जायेगा। श्रीकृष्ण का जीवन इस समभाव का आदर्श उदाहरण है। चंद्रवंशी ने चंद्रमा के इस गुण को हृदयंगम कर लिया था। प्रश्नोपनिषद में इन 16 कलाओं पर लिखा गया है कि- स प्राणाम सृजत, प्राणाच्छुद्धा खं वायुज्योतिरायः पृथिवीन्द्रिय ।

मनोऽन्नमन्नाद्वीर्य तपोमंत्रा कर्मलोका लोकेषु च नाम च ॥4॥ पुरुष ने पहले पहल प्राण का सर्जन किया। प्राण द्वारा श्रद्धा, पृथ्वी, अप, तेज, वायु, आकाश, इंदियां, मन, अन्न, वीर्य, तप, मंत्र, कर्म, लोक और नाम-इन 16 कलाओं का सर्जन किया उन सोलहों कलाओं का जिनसे ब्रह्माण्ड तथा पिण्ड का निर्माण होता है।”

चंद्रकलाओं के उक्त भौगोलिक और श्रीकृष्ण के रूप में ऐतिहासिक

आप्त पुरुष के जीवन की घटनाओं की सूक्ष्मताओं के साथ प्रश्नोपनिषद के उक्त मंत्र को ध्यानस्थ रखकर पूर्णिमा के दिन यदि गहन चिंतन किया जाये तो हमारे जीवन में अध्यात्मवाद का पुट स्पष्ट परिलक्षित होता है। चंद्रककलाओं के संदर्भ में हम अपने चिंतन को और भी नये आयाम दे सकते हैं।

हमें चाहिए कि अपने विचारों को खुला छोड़ दें। काल पटल की अनंतता पर उन्हें अनंत की ओर बहने दें। उन्हें इतना गहरा होने दें कि वे काल के अनादि स्रोत को ढूंढने में सफल हो सकें। काल के अनादि स्रोत के पश्चात् प्रलय, प्रलय के पश्चात सृष्टि का यह अनवरत क्रम कब से है, कोई नहीं जानता। हम स्वयं असंख्य सृष्टिओं और प्रलयों के साक्षी रहे हैं। हमने उत्थान को अपनी आंखों से देखा है और पतन को भी इस सृष्टि से पूर्व की सृष्टियों में भी हम थे- जो आज काल पटल पर नाम शेष रह गई हैं। उनका इतिहास नहीं मिलता है। मानव का इतिहास खोजने वाले कितने अज्ञानी हैं जो इसी सृष्टि में हजार दो हजार, चार हजार वर्ष का इतिहास खोजकर अपने को धन्य भाग समझते हैं। उत्थान – पतन के इस शाश्वत नियम की ओर पूर्णिमा हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। हमें हर हाल में पूर्णता को प्राप्त करके रहना है। भारतीय धर्म का मर्म भी यही है। महर्षि कणाद के अनुसार अभ्युदय की प्राप्ति और निःश्रेयस की सिद्धि का नाम धर्म है।

हमने लेख का प्रारंभ भारतीय मनीषा के उस पहलू से किया था जिसमें कर्म और विज्ञान के समुच्चय का नाम धर्म है। पूर्णिमा और अमावस्या के इन दोनों पर्वो के विषय में हल्का सा प्रकाश हमने उनकी वैज्ञानिकता और आध्यात्मिकता पर डालने का प्रयास किया है। हम इन दोनों पवों के संदर्भ में अपनी बुद्धि को वैज्ञानिकता प्रदान कर इन्हें रूढ़िवाद से बचाकर यौगिकवाद में ले जाकर मनाने की परंपरा को बलवती करें, यही इस लेख का उद्देश्य है।

(डॉ राकेश कुमार आर्य की पुस्तक भारतीय पर्व और त्योहार से साभार)

Comment:

vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
hiltonbet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
hiltonbet giriş
milosbet giriş
milosbet giriş
milosbet giriş
milosbet giriş
hiltonbet giriş
hiltonbet giriş
hiltonbet
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
royalbet giriş
royalbet giriş
royalbet giriş
royalbet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
galabet giriş
royalbet giriş
royalbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
vaycasino
vaycasino giriş
vaycasino giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
roketbet
norabahis giriş
norabahis giriş
betasus giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
norabahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betorder giriş
betorder giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
betnano giriş