गीता का तेरहवां अध्याय और विश्व समाज

श्री अरविन्द का कहना है कि कर्म को और ज्ञान को हम अपनी इच्छा से चलायें या इन्हें भगवान की इच्छा में लीन कर दें? -गीता ने इस प्रश्न को उठाकर इसका उत्तर दिया है। हमारा कर्म, हमारा ज्ञान कितना संकुचित है, कितना छोटा है? मशीन का छोटा सा पुर्जा मेरे छोटे से हाथ से घूमेगा तो कितना घूम लेगा, कितने चक्कर काट लेगा? वही पुर्जा जब बड़ी मशीन के पट्टे के साथ जुड़ जाता है-तब एक सैकंड में उतने चक्कर काट जाता है-जितना मेरे हाथ से छुपाने पर दो घण्टों में भी नहीं काटता। अपने कर्म और ज्ञान को मैं अपने छोटे से हाथ से चलाऊं इसकी जगह जब मैं इस पुर्जे को मशीन के बड़े पट्टे के साथ जोड़ देता हूं, अपने कर्म और ज्ञान के पुर्जे को भगवान के पट्टे के साथ जोड़ देता हूं-तब मैं भक्तिमार्ग के मार्ग पर चल पड़ता हूं। तब कर्म, ज्ञान और भक्ति इन तीनों का समन्वय हो जाता है। गीता का कहना है कि ‘कर्म’ और ‘ज्ञान’ को अलग नहीं किया जा सकता, कर्म के बिना ज्ञान अधूरा है ज्ञान के बिना कर्म अधूरा है। परन्तु कर्म और ज्ञान अपने आधार पर नहीं टिक सकते। ‘कर्म’ और ‘ज्ञान’ का रूख भगवान की ओर करना होगा, अपने ‘कर्म’ और ‘ज्ञान’ को ईश्वराभिमुख करना होगा, अपने को इस भव चक्र से परे हटाकर इस चक्र को चलाने वाले भगवान के ‘कर्म’ और ‘ज्ञान’ के साथ अपने को एक कर देना होगा। इसी का नाम भक्ति है, इसी को गीता (15-11) में ‘सर्वभावेन’-सब तरह से ‘कर्म’ और ‘ज्ञान’ भक्ति से अपने को परमात्मा के अर्पण कर देना कहा गया है।
गीता का भक्तियोग का प्रकरण अध्याय 6 से चलकर 12 पर आकर इसी ऊंचाई पर जाकर समाप्त हो जाता है।
गीता का 13वां अध्याय
भारत प्रारंभ से ही भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पोषक और समर्थक देश रहा है। इसका कारण यह था कि भारत ऋत और सत्य का उपासक देश रहा है। सत्योपासक ज्ञानोपासक होता है। वह सत्य पर मिथ्यावाद, पाखण्डवाद, आडम्बरवाद और असत्य की परछाई तक भी नहीं पडऩे देना चाहता है। यही कारण है कि सत्यपोसाक सत्य ज्ञान को निर्बाध बहने देना चाहता है। उस पर किसी का पहरा नहीं होना चाहिए, वह खुला घूमे और जहां भी अज्ञानान्धकार है-उसे मिटो दे। यह सोच रही-भारत में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देने की। जहां यह सत्य कि भारत ने विश्व को सर्वप्रथम भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी-वहीं यह भी सत्य है कि भारत में ही इस स्वतन्त्रता का दुरूपयोग किया गया।
लोगों ने अपनी अपनी मान्यताओं के आधार पर ग्रन्थों की और सिद्घान्तों की रचना कर ली और उन्हें अपने आप ही प्रमाणित कर लिया। तर्क और शास्त्रार्थ की परम्परा पीछे छूट गयी-जिन से भारतवर्ष में सिद्घान्त तय किये जाते थे। ऐसी परिस्थितियों में भारत की वैदिक सिद्घान्त परम्परा में घुन लगने लगा। जहां भारत का यह वैदिक सिद्घांत कार्य कर रहा था कि ईश्वर, जीव और प्रकृति ये तीनों अनादि, अजर और अमर हैं। वहीं इन तीनों के विषय में लोगों ने अपने-अपने अलग-अलग मत व्यक्त करने आरम्भ कर दिये। कुछ लोग ईश्वर के अस्तित्व में ही विश्वास न करने वाले आ गये, तो कुछ ने आत्मा की सत्ता पर प्रश्न लगा दिया। कुछ इन दोनों को मानने वाले हुए तो कुछ इन दोनों की सत्ता को नकारने वाले हुए।
इसी प्रकार कुछ ने प्रकृति को ही सब कुछ मान लिया और कर्मफल व्यवस्था सहित पुनर्जन्म की व्यवस्था को भी मिथ्या बता दिया। इसी प्रकार कुछ ने जगत को मिथ्या कहकर ब्रह्म को सत्य कहना आरम्भ कर दिया तो कुछ ने आत्मा को परमात्मा का अंश मान लिया। इस प्रकार के अनेकों विचारों के प्रतिपादकों के चले जाने के पश्चात उनके अनुयायियों ने इन कथित सिद्घांतों को उनके पश्चात भी जीवित रखा है।
कुछ लोगों ने ऐसे बहुलतावादी विपरीतार्थी कथित सिद्घान्तों से निर्मित समाज को ही ‘हिन्दू समाज’ कहना आरम्भ कर दिया। उनका तर्क है कि ‘हिन्दू समाज’ इतना महान है कि वह सभी प्रकार की विचारधाराओं को समाविष्ट कर लेता है-सहन कर लेता है। इससे वास्तव में ‘हिन्दू समाज’ की दुर्बलता झलकती है। मानो वह सत्य को सुनना नहीं चाहता है। यह नहीं हो सकता है कि कुछ लोग तो कहें कि आत्मा है और कुछ कहें कि आत्मा नहीं है। ‘हिन्दू समाज’ वैदिक आर्यों का उत्तराधिकारी है तो उसे इन दोनों में से किसी एक को स्वीकार करना होगा, इसके लिए उसे अपनी शास्त्रार्थ परम्परा को पुनर्जीवित करना होगा। शास्त्रार्थ में जो सत्य स्थापित हो उसे वह अपनाने और असत्य को मिटाये। यही ज्ञानोपासना है। ज्ञान की साधना है।
अब जो आगे का विषय गीता के शेष छह अध्यायों में स्पष्ट किया जाएगा वह इसी प्रकार के ज्ञान पर आधारित होगा। इसी पर प्रश्न होंगे और फिर उनका उत्तर दिया जाएगा।
तेरहवें अध्याय का प्रारम्भ करते हुए अर्जुन ने कहा-हे केशव! मैं यह जानना चाहता हूं कि प्रकृति क्या है? पुरूष क्या है? क्षेत्र क्या है? क्षेत्रज्ञ क्या है? ज्ञान क्या है और ज्ञेय क्या है?
बड़े गूढ़ प्रश्नों के साथ तेरहवें अध्याय का प्रारम्भ किया गया है। प्रश्नकत्र्ता अर्जुन ने अपनी ज्ञान की प्यास को स्पष्ट कर दिया है। वह चाहता है कि लोक कल्याण के लिए और लोगों के ज्ञान वर्धन के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से इन प्रश्नों का उत्तर दिया जाए। अर्जुन के प्रश्नों को सुनकर श्रीकृष्णजी ने बोलना आरम्भ किया। उन्होंने कहा कि-हे कौन्तेय! यह शरीर क्षेत्र है, और यह आत्मा क्षेत्रज्ञ है। क्योंकि वह इस क्षेत्र को जानता है। तत्वज्ञानी लोग उसे इसीलिए क्षेत्रज्ञ कहते हैं।
क्षेत्र शब्द से बिगडक़र ही खेत शब्द बन गया है। अब इसे सरल भाषा में ऐसे समझ लें कि यदि यह शरीर एक खेत है तो इस खेत का स्वामी आत्मा है। यह खेत क्या है? सीधी सी भाषा में खेत वह है जो हमारे जीवन को चलाने के लिए अन्न, फल, शाकादि हमें देता है और जिससे अच्छी फसल लेने के लिए हम उसकी भली प्रकार जुताई-गुड़ाई करते हैं। बस यही हमारा शरीर है जीवन की नैया इसी शरीर के सहारे चल रही है। अत: हम शरीर की उपयोगिता को समझकर इसकी ‘जुताई-गुड़ाई’ अर्थात साफ सफाई अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखकर करते हैं। स्वास्थ्य का ध्यान रखने में केवल नहाना-धोना कुल्ला दांतुन शौचादि ही सम्मिलित नहीं है -अपितु ब्रह्मचर्य का पालन करना इन्द्रिय संयमादि भी सम्मिलित है। जब हमारी प्रवृत्ति ऐसी बन जाती है तो वह शरीर रूपी खेत सही प्रकार से तैयार होता है और तभी इससे आत्मा को वास्तविक प्रसन्नता होती है। इस प्रकार के गूढ़ रहस्यों को लेकर अर्जुन ने अपने गुरू श्रीकृष्णजी को उनका उत्तर देने के लिए विवश कर दिया। वास्तव में अर्जुन के मुंह से बहुत से प्रश्न गीताकार ने स्वयं उठवाये हैं, जिससे कि इन प्रश्नों के सटीक उत्तरों को पाकर पाठकों का कल्याण हो सके। क्रमश:

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