धर्म से अर्थ, काम और मोक्ष तीनों मिलते हैं: डा. रघुवीर वेदालंकार”

IMG-20220606-WA0006

ओ३म्
-श्रीमद्दयानन्द आर्ष ज्योतिर्मठ गुरुकुल के वार्षिकोत्सव का प्रथम दिवस-
==========
श्रीमद्दयानन्द आर्ष ज्योतिर्मठ गुरुकुल, पौन्धा-देहरादून आर्यजगत का एक प्रसिद्ध गुरुकुल है जिसने 22 वर्ष पूर्व अपनी स्थापना के बाद अनेक उल्लेखनीय कार्य किये हैं। इसके छात्रों ने राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रतियोगिताओं में प्रथम व द्वितीय पुरस्कार एवं सम्मान आदि प्राप्त किये हैं। गुरुकुल प्रत्येक वर्ष जून महीने के प्रथम रविवार व उससे पूर्व के शनिवार एवं शुक्रवार तीन दिवसों में अपना वार्षिकोत्सव आयोजित करता आ रहा है। यह परम्परा विगत 21 वर्षों से चली आ रही है जिसमें दिल्ली, हरयाणा, उत्तरप्रदेश सहित पंजाब, हिमाचल प्रदेश एवं देश के अनेक भागों से ऋषिभक्त श्रद्धापूर्वक भाग लेते हैं। गुरुकुल का 22वां वार्षिकोत्सव शुक्रवार दिनांक 3 जून, 2022 को सोल्लास आरम्भ हुआ। प्रातः 7.00 बजे यज्ञोपासना के अन्तर्गत वेदपारायण यज्ञ आरम्भ हुआ जिसमें गुरुकुल के 4 ब्रह्मचारियों ने वेदमन्त्रों का पाठ किया। यज्ञ के ब्रह्मा आर्यजगत के प्रसिद्ध विद्वान डा. सोमदेव शास्त्री जी, मुम्बई थे। यज्ञ का संचालन डा. आचार्य यज्ञवीर जी ने किया। तीन वृहद कुण्डों में यज्ञ किया गया जिसके चारों ओर यजमानों ने बैठकर यज्ञाग्नि में घृत एवं साकल्य की श्रद्धापूर्वक आहुतियां दीं। यज्ञ के मध्य में यज्ञ के ब्रह्मा जी ने अपने उपदेश में कहा कि मनुष्य को अपने शरीर को निषिद्ध कर्मों को करके गन्दा नहीं करना चाहिये अन्यथा परमात्मा यह शरीर छीन लेते हैं और पुनर्जन्म के पश्चात पुनर्जन्म में मनुष्य जन्म नहीं मिलता। आचार्य जी ने कहा कि परमात्मा में अनन्त आंखो, सिर, नाक, पैर आदि ज्ञान एवं कर्मेन्द्रियों के समान कार्य करनी की सामथ्र्य है। आचार्य जी ने कहा कि यदि मनुष्य के हाथों की उंगलियां ठीक न हो तो न तो वह भोजन कर सकता है और न ही अपने सब आवश्यक कार्यों को सुगमतापूर्व कर सकता है। मनुष्य को स्वस्थ शरीर का मिलना परमात्मा की मनुष्यों पर बहुत बड़ी कृपा है। आचार्य धनंजय जी ने वार्षिकोत्सव में पधारे सभी विद्वानों एवं श्रोता अतिथियों का स्वागत एवं अभिनन्दन किया। आयोजन में उपस्थित स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी का उपदेश हुआ। उन्होंने कहा हमारा शरीर हमने या हमारे माता पिता आदि किसी ने नहीं बनाया है। हमारे शरीरों को बनाने वाला एक ईश्वर है। ईश्वर ही सब प्राणियों के शरीरों को बनाते हैं। मनुष्य न अपना न दूसरे किसी प्राणी का शरीर बना सकते हैं। पशु पक्षियों के पास भी अपनी सन्तानों को बनाने का ज्ञान व शक्ति नहीं है। परमात्मा ही इस सृष्टि तथा सब प्राणियों के शरीरों को बनाते हैं। परमात्मा हमारे पूर्वजन्मों में सदा हमारे साथ रहा है और सदैव साथ रहेगा। स्वामी जी ने माता-पिता के ऋणों पर प्रकाश डाला और कहा कि हमारा उनसे संबंध हमारे जन्म से आरम्भ होकर मृत्यु होने पर समाप्त हो जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि हमने अनादि काल से अब तक दारुण से दारुण दुःख भोगे हैं।

स्वामी जी के उपदेश के बाद यज्ञोपासना का सत्र समाप्त हुआ। इसके बाद ध्वजारोहण हुआ। ध्वजारोहण में सहस्रो व्यक्ति उपस्थित थे। मुख्य विद्वानों में स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती, स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती, डा. रघुवीर वेदालंकार, डा. सोमदेव शास्त्री, श्री रामपाल शास्त्री, पं. नरेशदत्त आर्य, डा. आचार्य यज्ञवीर राणा, आचार्य डा. धनजंय जी, डा. रवीन्द्रकुमार शास्त्री, डा. अजीत आर्य आदि विद्वान प्रमुख हैं। राष्ट्रीय प्रार्थना ‘ओ३म् आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो’ का मिलकर पाठ किया गया। स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी ने ध्वजारोहण किया। इसके बाद पं. नरेशदत्त आर्य जी ने ध्वजगीत जयति ओ३म् ध्वज व्योम विहारी गाया। इसके बाद स्वामी प्रणवानन्द जी ने श्रोताओं को सम्बोधित किया। स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी ने कहा कि ध्वजारोहण किये जाने का महत्व होता है। ध्वज हमें संकेत करता है कि हमें किस ओर बढ़ना है। ध्वज में गैरिक काषाय वस्त्र पर ओ३म् शब्द लिखा होता है। ओ३म् परमात्मा का नाम है। परमात्मा का यह नाम उत्तम एवं श्रेष्ठ है। ओ३म् के चारों ओर प्रकाश की किरणें ईश्वर की शक्तियों का प्रतीक हैं। ईश्वर सर्वव्यापक हैं, यह हमें निश्चय है। ध्वज का रंग वैराग्य की निशानी का प्रतीक है। स्वामी जी ने कहा कि संसार में अनन्त योनियां है। मनुष्य योनि सब योनियों में उत्तम एवं श्रेष्ठ है। स्वामी जी ने कहा कि उत्सव के आगामी कार्यक्रमों में विद्वानों के परमात्मा विषयक प्रवचनों से आपको इन विषयों का ज्ञान हो जायेगा। स्वामी जी ने कहा कि मनुष्य ऐसा प्राणी है जिसे सत्यासत्य का ज्ञान होता है और जो पूर्व किये कर्मों का फल भोगने सहित नये कर्मों को करता है।

ध्वजारोहण के बाद प्रातराश के लिये कुछ समय का विराम दिया गया। इसके बाद आर्य भजनोपदेशक पं. दधीचि जी ने ‘मन मेरे तू चल प्रभु की ओर’ भजन प्रस्तुत किया। भजन को प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किया गया जो श्रोताओं को प्रिय प्रतीत हुआ। इसके बाद गुरुकुल के स्नातक ब्रह्मचारी सौरभ ने एक भजन प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘ओंकार प्रभु नाम जपो, मन में ध्यान लगाकर सुबह और शाम जपो’। यह भजन भी श्रोताओं ने पसन्द किया। इन भजनों से वातारण में भक्ति रस घुल गया। भजन के बाद कार्यक्रम का संचालन करते हुए डा. अजीत आर्य जी ने कहा कि हम वैदिक संस्कृति के अनुयायी हैं जिसके अनुरूप सत्कर्मों को करके हम आगे बढ़ते हैं। उन्होंने कहा कि असत्य चमत्कारों में हमारा विश्वास नहीं है। इस सत्र का मुख्य आकर्षण ‘पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि’ विषय पर गोष्ठी का होना था। गोष्ठी के अध्यक्ष स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी को बनाया गया। गोष्ठी के आरम्भ में पं. नरेश दत्त आर्य जी का एक प्रभावशाली भजन हुआ जिसके बोल थे ‘उठ अब तो ईश्वर का गुणगान कर ले, प्रभु प्यारे प्रियतम का अब ध्यान धर ले।’

गोष्ठी को प्रथम डा. रघुवीर वेदालंकार जी ने सम्बोधित किया। डा. साहब ने धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की चर्चा की। उन्होंने कहा कि आज के समय में अर्थ और काम ही मुख्यतः हमारे सामने हैं। धर्म और मोक्ष को हमने काट दिया है। धर्म से अर्थ, काम और मोक्ष तीनों मिलते हैं। आचार्य जी ने कहा कि यदि राजा धार्मिक होगा तो वह प्रजा को धार्मिक बना सकता है पर आज यज्ञ करने वालों की आलोचना की जाती है। आलोचक कहते हैं कि यज्ञ करने वाले घृत को फूंक रहे हैं। आचार्य जी ने आगे कहा कि धर्म राज्य के आश्रय से चलता है। आज राजा ही धार्मिक नहीं है। आज प्रत्येक व्यक्ति राजा बना हुआ है। आज कुछ लोग चोरी करके अपना घर भरते हैं। जनता नेताओं के पीछे चलती है। आचार्य जी ने कहा कि धर्म को दबा दिया गया है। आचार्य जी का वक्तव्य काफी लम्बा है। समय की कमी के कारण हम उसे पूरा प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं। डा. रघुवीर जी के बाद डा. सोमदेव शास्त्री, मुम्बई का व्याख्यान हुआ जिसमें उन्होंने कहा कि हमें धर्म की रक्षा करनी चाहिये। लोगों ने धर्म के सत्यस्वरूप को भुला दिया है। आचार्य जी ने धर्मविरोधी उन कार्यों पर जिन्हें वर्तमान में धर्म माना जा रहा है, प्रकाश डाला जैसे पीपल के पेड़ के चक्कर लगाना आदि। उन्होंने कहा कि दूसरे व्यक्ति के हाथ का छुआ हुआ न खाना धर्म पालन नहीं होता। आचार्य जी ने कहा चोटी रखना, दाढ़ी रखना आदि बातें धर्म का लक्षण नहीं है। धर्म का कोई बाह्य चिन्ह नहीं होता है। आचार्य जी ने गोष्ठी के विषय पर व्यापक रूप से प्रकाश डाला जिससे श्रोताओं का मार्गदर्शन हुआ।

आयोजन में विदुषी साध्वी प्रज्ञा जी भी उपस्थित थीं। उन्होंने अपने सम्बोधन के आरम्भ में सबसे ओ३म् नाम का उच्चारण कराया। इसके बाद उन्होंने विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव मन्त्र के पाठ सहित इस मन्त्र का काव्यानुवाद भी बहुत ही मधुर एवं प्रभावशाली स्वरो में प्रस्तुत किया। साध्वी जी ने कहा कि धर्म वह है जिसे हम धारण करते हैं तथा जो हमें धारण करता है। उन्होंने कहा कि गुरुकुलीय पद्धति से हमारी संस्कृति लौट सकती है। गुलामी में हम जकड़े गये हैं जिससे समाज में अनेक विकृतियां आईं हैं। आचार्या जी ने मोक्ष का अर्थ दुःखों से छूटने को बताया। उन्होंने कहा कि सब प्राणी सुख चाहते हैं। उन्होंने कहा कि गुरुकुल ही मनुष्य को सत्यज्ञान देकर सत्य विद्याओं से युक्त करा सकते हैं। साध्वी जी ने राष्ट्र को दृणता से धारण करने को कहा। इसके बाद प्रसिद्ध भजनोपदेशक श्री कुलदीप आर्य जी का एक अत्यन्त मधुर एवं प्रभावशाली गीत हुआ। इस भजन को श्री कुलदीप जी ने अपने ओजस्वी स्वरों में प्रस्तुत किया जिससे सभी श्रोता भावविभोर हो गये। भजन में उनका साथ उनकी सहधर्मिणी बहिन कविता जी ने भी दिया। भजन के बोल थे ‘ईश्वर का गुणगान किया कर कष्ट और क्लेश मिटाने को। जीवन की ये नाव मिली है भवसागर तर जाने को।।’

गोष्ठी में श्री इन्द्रजित् देव, यमुनानगर का भी सम्बोधन हुआ। उन्होंने शब्दों के क्रम के महत्व की चर्चा की। उन्होंने कहा कि आात्मिक उन्नति तभी हो सकती है कि जब मनुष्य कि पहले शारीरिक उन्नति की जाये। उन्होंने कहा कि सामाजिक उन्नति के लिये मनुष्य की शारीरिक एवं आत्मिक उन्नति होना आवश्यक है। इसके पक्ष में उन्होंने आर्यसमाज के नियम 6 को प्रस्तुत कर बताया कि इस नियम के अनुसार संसार का उपकार करना आर्यसमाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना। आचार्य इन्द्रजित् देव जी ने कहा कि मनुष्य जीवन का अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है। मोक्ष दुःखों से छूटने को कहते हैं। आचार्य जी ने धर्म के ज्ञान व उसके पालन को मनुष्य का कर्तव्य बताया। आचार्य जी ने कहा कि अहिंसा का अर्थ किसी को न मारना नहीं है अपितु इसका अर्थ दूसरे के प्रति वैर त्यागना है। उन्होंने कहा कि धर्म का प्रचार करने के लिए अधर्म को पराभूत करना होता है। इसके लिये उन्होंने गीता से श्री कृष्ण और रामायण से श्री राम का उदाहरण दिया। मोक्ष में मनुष्य वा योगी को ब्रह्मानन्द का सुख प्राप्त होता है। इसी को प्राप्त करना सब मनुष्यों का कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि धन केवल जीवित रहने का एक साधन है। धन ही सब कुछ नहीं है। धर्म का महत्व धन से कहीं अधिक है। धन केवल धर्मपूर्वक कार्य करके ही अर्जित करना चाहिये। उन्होंने धर्म पालन से जुड़ी हैदराबाद की दिनांक 3-5-1948 की एक घटना प्रस्तुत की जिसमें धारासिद्ध के निवासी श्री कृष्णराव को अपने घर पर ओ३म् ध्वज लगाने के कारण गोली मार दी गई थी। इसके बाद उनकी पत्नी गोदावरी देवी जी ने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अपने पति की बन्दूक से उन पति को गोली मारने वालों पर भी गोली चलाई थी। आचार्य जी ने कहा कि मनुष्य को धर्म का पालन करते हुए अर्थ और काम का सेवन करना चाहिये। शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिये। ऐसा करके ही मोक्ष के निकट व उसे प्राप्त कर सकते हैं। इसके बाद स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी का अध्यक्षीय भाष्ण हुआ। इसी के साथ प्रातःकालीन सत्र समाप्त हो गया। आयोजन में देहरादून के निकटवर्ती एवं दूरस्थ राज्यों से भी बड़ी संख्या में धर्म प्रेमी ऋषिभक्त पधारे हुए हैं। सबके लिये निवास एवं भोजन की सुन्दर व्यवस्था की गई है।

उत्सव के प्रथम दिवस का द्वितीय सत्र अपरान्ह 3.30 बजे यज्ञोपासना से आरम्भ हुआ। यज्ञ के बाद कर्म फल मीमांसा विषय पर गोष्ठी हुई। इस गोष्ठी को अनेक विद्वानों ने सम्बोधित किया। इन विद्वानों में डा. अजीत आर्य जी और प्रसिद्ध विदुषी बहिन कल्पना आर्या जी भी सम्मिलित थी। आयोजन में भजनोपदेशकों के भजन भी हुए। रात्रि को संगीत संन्ध्या का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में अनेक भजनोपदेशकों ने भजन व गीत प्रस्तुत किये। इन भजनोपदेशकों में दधीची जी, श्री मुकेश कुमार शास्त्री, श्री दिनेश पथिक जी, श्री कुलदीप आर्य जी, श्री नरेशदत्त आर्य जी तथा श्री राजवीर जी सम्मिलित थे। रात्रि 9.45 बजे भजन सन्ध्या का कार्यक्रम समाप्त हुआ। उत्सव के दूसरे दिन का आयोजन दिनांक 4-6-2022 को प्रातः यज्ञोपासना से होगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:

meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano giriş
meritking giriş
meybet
hititbet giriş
hititbet giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
norabahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
pokerklas
pokerklas
vdcasino
pokerklas
pokerklas
betnano giriş
betasus giriş
pokerklas
pokerklas giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
hititbet
vdcasino giriş
pokerklas giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
maritbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpas giriş
betpas giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
norabahis giriş
norabahis
norabahis giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betpark
betpark
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino
vdcasino
meybet
meybet
harbiwin giriş
betnano giriş
norabahis
favorisen giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
meybet
norabahis giriş
norabahis giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
hazbet giriş
hazbet giriş
maritbet giriş
maritbet
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
hititbet
hititbet
vdcasino
vdcasino
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
vdcasino
vdcasino
betnano giriş
betoffice giriş
betoffice giriş
hititbet
hititbet
betpark giriş
betpark
betpark
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
hititbet giriş
kavbet giriş
kavbet
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vdcasino
vdcasino
timebet giriş
meybet giriş
timebet giriş
meybet giriş
bettilt
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
kavbet giriş
kavbet giriş
betpark giriş
bettilt