Devi-Durga-Maa-2दैवी उपासना का वार्षिक महापर्व नवरात्रि जगदम्बा की साधना के जरिये शक्ति संचय और दैवीय ऊर्जाओं के संग्रहण का अवसर है। सदियों से इस दौरान दुर्गा सप्तशती के पाठ, नवचण्डी, नवार्ण मंत्र, दश महाविद्या साधना और देवियों से जुड़ी विभिन्न प्रकार की साधनाओं से लेकर तंत्र-मंत्र और यंत्र सिद्धियां प्राप्त किए जाने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की उपासना का विधान रहा है।

लेकिन नवरात्रि के दिनों में अक्सर देखा यह जाता है कि हम अपने आपको महान तपस्वी और सिद्ध दैवी भक्त दर्शाने और मनवाने के लिए इतने सारे जतन और दिखावे करते हैं कि इससे दूसरे लोगों की उपासना में इतना अधिक व्यवधान आता है कि लोग इस पर्व को लेकर की जाने वाली गतिविधियों से तंग रहते हैं और उन लोगों को कोसने के लिए विवश होते हैं जो दैवी साधना के नाम पर धार्मिक आतंकवाद जैसी हरकतें करते हैं।

साधना कोई सी हो, इसमें कहीं भी दिखावा और पाखण्ड का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। वस्तुतः साधना का अर्थ ही है दैवी का सामीप्य और सान्निध्य पाने का अहसास करना। इसके लिए भक्त और भगवान के सिवा न कोई तीसरा व्यक्ति होना चाहिए और न ही किसी भी प्रकार का कोई संसाधन, उपकरण, शोरगुल या और कुछ।

साधना में दैवी और साधक के बीच का सीधा संबंध तभी संभव है जब हम एकान्तिक साधना करें और दैवी की कृपा अपने शरीर और भावों में महसूस करें। इस एकान्तिक साधना से ही दैवी कृपा प्राप्त होती है। साधना जब सार्वजनिक हो जाती है, गुप्त नहीं रह पाती, दिखावा होकर रह जाती है तब यह अपना प्रभाव खो देती है और ऎसे में दैवी उपासना के नाम पर हम जो कुछ बरसों से करते आए हैं उसका कोई खास असर सामने नहीं आ पा रहा है।

हमने नवरात्रि के नाम पर वर्षों तक साधना करते हुए कभी आत्म मूल्यांकन किया ही नहीं कि इस साधना का कोई परिणाम सामने क्यों नहीं आ पा रहा है। हमने नवरात्रि को मात्र औपचारिकता निर्वाह तक ही सीमित करके रख दिया है और यही कारण है कि हम जो कुछ कर रहे हैं उसका कोई विशेष प्रभाव न हम पर पड़ रहा है न समाज, परिवेश और देश में दिख रहा है।

खूब सारे दैवीभक्त आज भी हैं जो नवरात्रि के सभी नियमों का पालन करते हैं और विधि-विधान से दैवी पूजा, अनुष्ठान आदि करते हैं। ऎसे सच्चे दैवी भक्तों को दैवी मैया की कृपा प्राप्त होती है। इस कृपा को उनके जीवन में देखा भी जा सकता है। दैवी के गुण जिसमें दिखने लगें, वही वास्तविक दैवी भक्त है।

जो लोग दैवी मैया की उपासना करते हैं वे धीर-गंभीर, सदैव प्रसन्न, शांत्तचित्त, आत्ममस्त, दिव्य होते हैं तथा उन सभी प्रकार के आसुरी कर्मों से परे होते हैं जो एक सामान्य असुर के लक्षण बताए गए हैं। सच्चे दैवी भक्त किसी भी दुष्ट, व्यभिचारी, स्वाभिमानशून्य, भ्रष्ट, कमीशनबाज, रिश्वतखोर, स्त्री निंदक,राष्ट्रद्रोही, समाजकंटक और आसुरी वृत्तियों वाले लोगों को बर्दाश्त नहीं करते हैं बल्कि निरन्तर इस उपक्रम में लगे रहते हैं कि समाज को ऎसे असुरों से मुक्ति कैसे  दिलायी जाए। सच्चे दैवी उपासक स्ति्रयों के प्रति आदर-सम्मान रखने वाले होते हैं तथा सज्जनों के लिए हमेशा मददगार होते हैं।

जो लोग असुरों से किसी भी प्रकार का संपर्क रखते हैं, दस्यु मनोभाव और आसुरी वृत्तियों को जीवन में अपनाते हैं, वे लोग दैवी उपासक कभी नहीं हो सकते बल्कि दैवी उपासना के नाम पर ऎसे लोग नौटंकी, ढोंग और पाखण्ड ही कर रहे हैं।

दैवी मैया ने महिषासुर, चण्ड-मुण्ड, शुम्भ-निशुम्भ, भण्डासुर आदि राक्षसों का संहार किया और शांति स्थापित कर अपनी कृपा बरसायी। वर्तमान युग में हम ऎसे कितने सारे लोगों को देखते हैं जो सारे के सारे इन असुरों के ही कर्मों में रमे हुए हैं।

हैरत की बात यह है कि ऎसे असुर लोग भी दैवी उपासना के नाटक करते हुए जगत और जीवों को उल्लू बना रहे हैं।  दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों से दैवी हमेशा रुष्ट और कुपित रहती है और ऎसे लोग दैवी उपासना करते हैं तब दैवी इन्हीं का संहार किसी न किसी प्रकार से कर देती है। खूब सारे भ्रष्ट, रिश्वतखोर और कमीशनबाज, परायी जमीन-जायदाद, पद और अधिकार हड़पने वाले, बेईमान लोग ऎसे हैं जो नवरात्रि में दैवी उपासना के नाम पर इतने सारे पाखण्ड दिखाते हैं कि इन्हें देख लगता है कि ये ही हैं जो दैवी के सर्वाधिक निकट हैं और दैवी कृपा के लूटेरे हैं।

आजकल दैवी साधना का जो स्वरूप दिखाई दे रहा है वह भ्रमित कर देने वाला तो है ही, प्रचार, तीव्र कानफोडू शोरगुल, चढ़ावा, भौतिक चकाचौंध और फैशन की भेंट चढ़ चुका है और यही कारण है कि एकान्तिक साधना गौण होती जा रही है।

एकान्तिक साधना करने के मार्ग में कई बाधाएं भी हैं। हर गली-मोहल्ले, गांव-शहरों में जगह-जगह गरबा चौक बन गए हैं, मन्दिरों में उत्सवी धूम बनी रहती है। जिसमें भक्तों के कण्ठों से स्तुतिगान और भजनों का समय तो काफी कम होता है, अधिकांश बार स्पीकर और लाउड़स्पीकरों की धमाल बनी रहती है जिसमें पुजारियों और भक्तों को करना कुछ नहीं है, सिर्फ बटन दबा दो, और घण्टों तक शोर मचता रहेगा। गरबा चौकों में से अधिकांश की हालत यह है कि गरबे रात्रि दस-ग्यारह बजे बाद शुरू होते हैं लेकिन लाउड़स्पीकरों से गरबों और भजनों तथा दैवी आराधना के स्वर फूल वोल्यूम में घण्टों पहले से ही दूर-दूर तक पसरने शुरू हो जाते हैं। और इस धमाल की वजह से न कोई दैवी साधना कर सकता है, न दैवी पूजा या ध्यान।

दैवी भक्ति के नाम पर धमाल करने वालों को इससे कोई सरोकार कभी नहीं होता कि उनकी वजह से कितने हजारों-लाखों दैवी भक्तों की एकान्तिक साधना बाधित होती है और शांत माहौल नहीं मिलता। हम लोग दैवी भक्ति के नाम पर सिर्फ शोर मचाना ही जानते हैं, यांत्रिक भक्ति ही कर पा रहे हैं और नवरात्रि के नाम पर जो कुछ कर रहे हैं उसमें और आसुरी वृक्ति में कहाँ कोई अन्तर रह गया है। असुर भी यही करते रहे हैं।

साधकों, भक्तों और ऋषियों के भजन-पूजन में व्यवधान और धमाल पैदा करने और सच्चे भक्तों को तंग करने में इन असुरों ने कहाँ कोई कसर बाकी रख छोड़ी थी। हमें याद करना होगा कि तकरीबन इन्हीं स्थितियों में अशांति और धमाल पैदा करने वाले असुरों के संहार के लिए दैवी मैया को अवतार लेना पड़ा था। धर्म और भक्ति के नाम पर हम जो कुछ आजकल कर रहे हैं उसने हमारे और असुरों के बीच के भेद को पूरी तरह समाप्त ही कर डाला है। ऎसे में दैवी मैया से बचकर रहें, कहीं हमारा ही संहार न कर डाले।

धर्म और भक्ति के नाम पर कुछ भी कर डालने की छूट का यह अर्थ नहीं कि हम धींगामस्ती और धमाल करते रहें और दूसरों का सुख-चैन एवं शांति छीन लें, उन्हें ऎसा मौका ही न दें कि वे शांति से देवी साधना और भजन-पूजन-ध्यान आदि कर सकें और नवरात्रि को शक्ति संचय व साधना पर्व के रूप में उपयोगी बना सकें। ऎसी भक्ति किस काम की जिसमें हम भक्ति के नाम पर नौटंकियों का शोर करते रहें और दूसरे लोग हमारे कर्मों से दुःखी और आप्त रहें, तथा धार्मिक विषय होने की वजह से कुछ कह भी न पाएं।

हम जो कुछ करें, उसमें औरों का ध्यान रखें। हम चंद लोग और धंधेबाज उत्सवी समूह ही महान और सिद्ध दैवी उपासक नहीं हैं, बहुत सारे लोग हैं जिन्हें साधना के लिए एकान्त और शांत माहौल चाहिए। जियो और जीने दो के सिद्धान्त पर चलें और सब मिलकर इस प्रकार साधना करें कि सभी की सम्मिलित दैवी कृपा दैवीय ऊर्जाओं के साथ समाज, क्षेत्र और देश के लिए उपयोगी हो सके।

खुद भी दैवी साधना का आनंद पाएं, दूसरों को भी साधना के लिए अनुकूल माहौल उपलब्ध कराएं, तभी दैवी प्रसन्न होगी, अन्यथा दैवी मैया को सब पता है, कौन कितने पानी में है, कौन सच्चा और कौन ठग भक्त है। फल भुगतने को तैयार रहियें।

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