राजहठ की तरह किसान हठ में बदलता किसान आंदोलन

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अशोक मधुप 

पंचायत किसानों की थी। कानून वापिस लेने के लिए थी, किंतु ऐसा लगा कि किसान नेताओं का उद्देश्य विपक्षी दलों की मदद करना ज्यादा है, साथ ही उनका उद्देश्य भाजपा सरकार को हराना है। किसान नेताओं की बात से साफ है कि वे तीनों कृषि कानून की वापसी से कम पर सहमत नहीं हैं।

कभी राजहठ मशहूर होता था। उसके आगे सारी हठ कम रहते थे। अब इसकी जगह किसान हठ ने ले ली है। उनके आंदोलन से साफ है कि जो हम कह रहे हैं, वह करो, नहीं तो तुम्हें हराएंगे। सुलह-समझौते की कोई गुंजाइश नहीं। मुजफ्फरनगर की किसान पंचायत का साफ संदेश आ गया कि या तो केंद्र सरकार तीनों कृषि कानून वापस ले अन्यथा वह 2024 में केंद्र सरकार के होने वाले चुनाव तक आंदोलन जारी रखेंगे। 2024 के चुनाव में भाजपा को हराने के लिए काम करेंगे। इससे कम पर वह न पहले तैयार थे, न अब तैयार हैं।

पंचायत में यह भी स्पष्ट किया गया कि आंदोलन तीनों कृषि कानूनों की वापसी तक रहेगा। वे 2024 तक आंदोलन चलाने को तैयार हैं। इसका सीधा मतलब है कि वे अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा के हराने के लिए काम करेंगे। इस पंचायत से यह बात साफ हो गई कि आंदोलन इस वर्ष में होने वाले प्रदेशों के चुनाव तक ही नहीं 2024 के चुनाव चुनाव तक जारी रहेगा। किसान नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर देश की जनता को धोखा देने का आरोप लगाते हुए कहा, “इनका धोखा नंबर एक है कि यहां पर रेल, हवाई जहाज और हवाई अड्डे बेचे जाएंगे। धोखा नंबर दो- बिजली बेचकर निजीकरण करेंगे, यह कहीं घोषणा पत्र में नहीं लिखा। जब वोट मांगे तो नहीं कहा कि बिजली भी बेचेंगे।” उन्होंने आरोप लगाया, “ये सड़क बेचेंगे और पूरी सड़कों पर टैक्स लगेगा और राष्ट्रीय राजमार्ग के पांच सौ मीटर तक कोई चाय की गुमटी भी नहीं लगा सकता। देखना ये क्‍या-क्‍या चीज बेच रहे हैं।”
पंचायत किसानों की थी। किसान कानून वापिस लेने के लिए थी, किंतु ऐसा लगा कि किसान नेताओं का उद्देश्य विपक्षी दलों की मदद करना ज्यादा है, साथ ही उनका उद्देश्य भाजपा सरकार को हराना है। किसान नेताओं की बात से साफ है कि वे तीनों कृषि कानून की वापसी से कम पर सहमत नहीं हैं। कानून वापस नहीं तो आंदोलन जारी रखेगा और अगले लोकसभा चुनाव तक आंदोलन चलेगा। केंद्र सरकार अपनी बात कह चुकी है कि लाए गए तीनों कानून वापिस नहीं होंगे। किसानों की हर आपत्ति सुनने और उनकी आपत्ति के निराकरण को वह तैयार है। कानून में संशोधन को तैयार है। इसका कई बार आश्वासन दे चुकी है। आंदोलनकारी तीनों किसान कानून वापसी से कम पर तैयार नहीं हैं। रविवार की पंचायत का भी यही स्पष्ट मत रहा।
मुजफ्फरनगर की पंचायत में पंजाब और हरियाणा के किसान ज्यादा नजर आए। सिख ज्यादा दिखाई दिए। जितना बड़ा प्रतिनिधित्व पश्चिम उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड का होना चाहिए था, उतना नहीं हो पाया।

आंदोलन तो किसानों का बताया जा रहा है पर इसमें मुस्लिम और दलित किसान बहुत कम संख्या में नजर आये। हालांकि अल्ल्लाहू अकबर के नारे भी लगे। पर ये नारे नेताओं ने लगाए। हिन्दू-मुस्लिम किसान एकता दिखाने को लगाए। इससे उन्हें कोई लेना-देना नहीं था कि मुस्लिम पंचायत में क्यों नहीं हैं?
देश के मुस्लिम केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकार से नाराज हैं, वह भाजपा को हराने वाले दल को वोट करना चाहते हैं। ये किसान पंचायत भी भाजपा के विरोध में थी। ये बताने को थी कि भाजपा किसान विरोधी है। ऐसे में इस पंचायत में मुस्लिम किसानों की बहुत कम हाजरी यह बताती है कि ये पंचायत सभी किसानों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रही थी। साथ ही मुस्लिम किसान इस आंदोलन की सच्चाई जानते हैं।

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