जमातियों पर लिबरल गैंग की लंबी खामोशी बहुत कुछ बोल रही है

अजय कुमार

जब देश कोरोना वायरस जैसी भयानक आपदा से जूझ रहा है, ऐसे समय में कुछ इकाइयां ऐसी हैं जिन्हें यह ‘युद्ध’ फूटी आंख नहीं सुहा रहा है। कुछ लोग यह प्रमाणित करने में लगे हैं कि भारत इस वायरस से लड़ने के लिये पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा है।

उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासन द्वारा कई बार कहे जाने के बावजूद अब भी राज्य के कई हिस्सों में जमाती छिपे हुए हैं और इसकी सूचना नहीं दे रहे हैं। इस बात का एक और प्रमाण तब मिला जब प्रयागराज पुलिस ने एक मस्जिद के भीतर जमातियों के छिपे होने की खबर मिलने के बाद वहां से 30 जमातियों को गिरफ्तार कर किया, जिसमें कई विदेशी जमाती भी थे। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इन जमातियों को एक शिक्षाविद् ने ही मस्जिद में छिपाने की घटना को अंजाम दिया था। इससे यह साफ हो जाता है कि जमाती सिर्फ जाहिल ही नहीं हैं, इसमें पढ़े लिखे, उच्च संवैधानिक पदों पर विराजमान हस्तियों के अलावा सिनेमा, साहित्य, राजनीति, समाज सेवक का तमगा लगा कर घूमने वाले लोग भी शामिल हैं। यह वह वर्ग है जो मौके-बेमौके बरसाती मेंढक की तरह बाहर निकल कर टर्र-टर्र करता है फिर छिप जाता है। उच्च शिक्षा प्राप्त और समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त ऐसे लोग अपनी रूढ़िवादी मानसिकता बदल ही नहीं पा रहे हैं। यह ‘जमाती’ उन जाहिल जमातियों से देश के लिए ज्यादा बड़ा खतरा हैं जो अपनी जमाती सोच को छिपा कर भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति को चोट पहुंचा रहे हैं।

लिबरल समूह की लिस्ट में पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी, गीतकार जावेद अख्तर, फिल्मी कलाकार नसीरूद्दीन शाह, आमिर खान, शाहरूख खान, स्वरा भास्कर, अनुराग कश्यप, मशहूर शायर मुनव्वर राणा जैसे सैंकड़ों लोग शामिल हैं जो जब देश या देश की बहुसंख्यक आबादी पर हमला बोला जाता है तब तो अपना मुंह ‘सिल’ लेते हैं, लेकिन जब सरकार देश के गद्दारों, आतंकवादियों, भारत तेरे टुकड़े होंगे गैंग के लोगों के खिलाफ सख्ती करती है तो यह पूरे देश में मातम मनाने लगते हैं। ऐसा ही आजकल हो रहा है, जब देश को कोरोना महामारी से बचाने के लिए केन्द्र की मोदी और राज्यों की सरकारें खून पसीना बहा रही हैं तब कुछ लोग इन कोरोना वीरों के ऊपर थूक रहे हैं। उनके साथ मारपीट कर रहे हैं। पत्थर बरसा रहे हैं। मोदी-योगी को कोस रहे हैं, लेकिन कथित बुद्धिजीवी गैंग चुप्पी तोड़ने को तैया ही नहीं है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि जब देश कोरोना वायरस जैसी भयानक आपदा से जूझ रहा है, ऐसे समय में कुछ इकाइयां ऐसी हैं जिन्हें भारत का कोरोना वायरस के विरुद्ध छेड़ा गया यह ‘युद्ध’ फूटी आंख नहीं सुहा रहा है। कुछ लोग यह प्रमाणित करने में लगे हैं कि भारत इस वायरस से लड़ने के लिये पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा है। इनका कहना है कि सरकार लोगों की आंखों में धूल झोंक रही है। इसके अलावा कुछ को तो कोरोना में भी साम्प्रदायिकता नजर आ रही है। इस देश विरोधी गतिविधियों में कुछ हिन्दुस्तानी मीडिया समूह भी शामिल हैं। कुछ लेफ्ट लिबरल मीडिया तो कोरोना जैसी महामारी पर रिपोर्टिंग करते समय पत्रकारिता की सारी सीमायें ही लांघ गया है। मोदी विरोधी मीडिया इस समय जितनी भी न्यूज रिपोर्ट कर रहा है, सभी कयासों पर निर्धारित है। इन्हीं कयासों के सहारे जनमानस में पैनिक यानि घबराहट फैलाने की कोशिश की जा रही है। जैसे इस मीडिया द्वारा उड़ाया जा रहा है कि भारत में एक मिलियन से भी अधिक लोगों को कोरोना वायरस हो सकता है ? भारत में चूंकि बहुत कम टेस्टिंग हो रही है, इसीलिये ऐसे कई कोरोना वायरस के केसेज होंगे जिनकी जांच पड़ताल नहीं शुरू हुई है ? कैसे भारत में कोरोना वायरस का कम्यूनिटी ट्रांसमिशन यानि आम लोगों के बीच फैलना शुरू हो चुका है।

हालात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जब एक रविवार को कोरोना से देश को बचाने वालों का सम्मान करने के लिए ताली बजाने और शंखनाद करने का आह्वान किया गया तो लिबरल गैंग इसमें भी सियासत तलाशने लगा। लेफ्ट लिबरल गैंग ने मजाक बनाया। तालियां बजने के कुछ देर बाद से ही सोशल मीडिया पर इस प्रकार की पोस्ट दिखाई देनें लगीं कि किस प्रकार तालियों और शंखनाद से जबर्दस्त वायु प्रदूषण हुआ, वगैरह, वगैरह! लिबरल गैंग के समर्थन वाली मीडिया ने तुरंत इस प्रकार की खबरों का प्रचार-प्रसार करना शुरू कर दिया कि कैसे ताली बजाना पर्याप्त नहीं, सरकार को लोगों की सुरक्षा के लिये बहुत कुछ करना होगा। मीडिया का एक छोटा-सा धड़ा यह मानने को तैयार ही नहीं है कि जब कोई भी देश स्वास्थ्य से जुड़ी किसी आपतकालीन स्थिति से गुजर रहा होता है, तो मीडिया संस्थाओं की भी कुछ गरिमा होती है कि वो सिर्फ तथ्यों के आधार पर जो घटित हो रहा है, उसी खबर को आगे बढ़ाएं।

खैर, बात पढ़े-लिखे जमातियों की हो रही है तो यहां इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर की कारस्तानी की चर्चा भी जरूरी है। गत दिवस प्रयागराज में 30 जमातियों को एक मस्जिद से गिरफ्तार करके क्वारंटीन किया गया तो लोग यह सुनकर हैरान हो गए कि क्वारंटीन किए गए जमातियों में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर साहब भी शामिल थे। प्रोफेसर साहब के साथ 16 विदेशी समेत कुल 30 जमाती शामिल थे। विदेशियों की गिरफ्तारी फॉरेनर्स एक्ट के तहत की गई, जबकि इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रोफेसर के खिलाफ जमातियों को गुप्त रूप से शहर में शरण दिलाने के आरोप में और महामारी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

बता दें इससे पहले प्रयागराज में ही शाहगंज के काटजू रोड के पास स्थित अब्दुल्लाह मस्जिद मुसाफिरखाने में इंडोनेशिया के सात नागरिकों समेत नौ लोग पकड़े गए थे। यह सभी दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में आयोजित तब्लीगी जमात के जलसे में शामिल हुए थे। इसी तरह करेली के हेरा मस्जिद में थाईलैंड के 9 नागरिकों समेत कुल 11 जमाती मिले थे। शाहगंज व करेली थाने में मुकदमा दर्ज कर इन सभी को क्वारंटीन कर दिया गया था। कुछ दिनों बाद पुलिस को सूचना मिली थी कि शिवकुटी के रसूलाबाद में रहने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर भी दिल्ली में आयोजित तब्लीगी जमात के जलसे में शामिल होकर लौटे और चुपचाप शहर में रह रहे हैं। इसके बाद उन्हें भी परिवार समेत क्वारंटीन कर दिया गया था। विदेशी जमातियों के साथ दिल्ली से लौटे उनके चार सहयोगियों और करेली की हेरा मस्जिद व शाहगंज में अब्दुल्ला मस्जिद मुसाफिरखाना के 9 अन्य लोगों को भी क्वारंटीन किया गया था।

लब्बोलुआब यह है कि एक तरफ जमाती और कुछ सिरफिरे धर्म की आड़ लेकर कोरोना की लड़ाई को कमजोर करने में लगे हैं तो दूसरी तरफ बात-बात पर हो-हल्ला मचाने वाला लिबरल गैंग जमातियों की हरकतों की तरफ से आंख-कान बंद किए हुए बैठा है, मानो उसे सांप सूंघ गया हो। संभवतः कभी सीएए के विरोध के नाम पर दिल्ली के शाहीन बाग से लेकर देशभर में ‘आग’ लगाने वाला गैंग इस समय चुप्पी साधे यह देख रहा होगा कि मोदी कैसे कोरोना महामारी से निपटेंगे। अगर कहीं भी कोई कमी दिखाई देती है तो यह गैंग सक्रिय हो जाएगा।

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