वेद, महर्षि दयानंद और भारतीय संविधान-48

आओ देखें:भारत में ‘सजातीय’ कौन हैं
भारत की सांस्कृतिक परंपराओं को समझने जानने और मानने में हमने भारी चूक की है। फलस्वरूप देश में सामाजिक विसंगतियों ने जन्म लेकर अपनी जड़ता में हमें जकड़ लिया है। हमारे देश में बुद्घिजीवी और विधिशास्त्री भी हमारी बहुत सी प्राचीन मान्यताओं को समझने, जानने और मानने में असफल रहे हैं। बात यदि एक ही गांव के लड़के, लड़कियों के विवाहादि, की भी की जाए तो कुछ लोग इस विषय में लड़का, लड़की को केवल लड़का लड़की मानकर अति उत्साह में कह रहे हैं कि वे ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं। ऐसा कहने वाले लोग स्वयं को खुले विचारों वाला या आधुनिक सोच वाला कहकर चलते हैं। जबकि दूसरे वे लोग हैं जो इस बात पर सहमत नही हैं कि एक ही गांव के लड़के लड़की परस्पर विवाह बंधन में बंधें। ऐसी सोच वालों को लोग पिछड़ी सोच के रूढि़वादी और जड़तावादी बुद्घि के धनी मानते हैं।
यद्यपि भारत में विवाहादि की भी विभिन्न पद्घतियां प्रचलित हैं। कहीं कहीं किन्ही आंचलों में ऐसी प्रथा हो जाती है। परंतु ऐसे अपवादों को आप मुख्यधारा को प्रभावित या परिवर्तित करने के लिए एक व्यवस्था (नजीर Ruling) नही बता सकते। अपवाद अपवाद ही होते हैं और उन्हें अपवाद ही रहने दिया जाए तो ही अच्छा होता है।
इस प्रसंग में यह समझना आवश्यक है कि भारत में सजातीय कौन कौन लोग माने जाते हैं? सजातीय लोग प्राचीन काल में वो लोग माने जाते थे जो सगोत्रीय होते थे। उस अर्थ में सजात लोगों में एक ही रक्त संबंध से जन्मे लोगों में परस्पर विवाह निषिद्घ था। इस सजात शब्द से जाति या सजातीयता का उद्भव और विकास हुआ। जो आज एक जातिवादी विसंगति के रूप में हमारे बीच खड़ा है। इन सजात लोगों को अथर्ववेद (15/8/3) में ‘सबन्धून’ शब्द से महिमा मंडित किया गया है। सबन्धून शब्द से स्पष्ट है कि ये लोग परस्पर बंधु हैं। बस, ये बंधुता ही परस्पर विवाहादि के संबंधों पर प्रतिबंध लगाती थी। यही कारण था कि चाचा, ताऊ, मामा, फूफा, आदि में दूर के संबंधी भी परस्पर विवाहादि नही करते थे, और ना ही करते हैं। क्योंकि इनके बच्चे बचपन से ही एक दूसरे को परस्पर भाई बहन मानते थे, और मानते हैं? उस संबंध को बनाये रखना सामाजिक मर्यादा थी और मर्यादा है। लोग झूठी शान या झूठी प्रतिष्ठा की खातिर इन संबंधों में विवाह करने वाले बच्चों के विरूद्घ कठोर नही होते अपितु इस सामाजिक मर्यादा के टूटने से स्वयं को लज्जित अनुभव करते हैं।
हमारे यहां प्राचीन काल में जन नागरिक की संज्ञा थी। अंग्रेजी के सिटीजन में जन इसी ओर संकेत करता है। बहुत सारे जनों से मिलकर जनपद और बहुत से जनपदों से मिलकर महाजनपद (प्रांत) का निर्माण होता था। ये महाजनपद मिलकर राष्ट्र का निर्माण करते थे। इस प्रकार राष्ट्र जन का विशाल स्वरूप था जबकि जन राष्ट्र का लघु स्वरूप था। जनगण परस्पर एक बन्धुता से बंधे रहते थे। इस बंधुता को कुल, गोत्र, रक्त संबंध और अपने पूर्वजों के प्रति समान आदर का सब मिलाकर भाव अधिक बढ़ाते थे। आज भी हम देखें, यदि कोई व्यक्ति अपने गांव को छोड़कर किसी दूसरे गांव में जा बसे या किसी अन्य शहर में जा बसे तो लोग उस दूर जाकर बसने वाले के प्रति पीढिय़ों तक परस्पर स्नेह बंधन में बंधे रहते हैं। प्राचीन काल में तिब्बत से (उस समय त्रिविष्टप कहा जाता था) उतरकर आर्य लोग इधर, उधर भारत में फैल गये। उनका यह फैलाव (आवरण) ही इस देश को आर्यावत्र्त की संज्ञा दिलाने में सहायक बना। जब ये लोग फैले तो इनके मध्य परस्पर वही सदभाव और स्नेह रहा जो आज कहीं दूर दूर जाकर बसने वाले व्यक्ति के प्रति उसके मूल परिजनों का होता है। इसी भाव ने और अमूत्र्त भावना ने हममें एक राष्ट्र और राष्ट्रीयता का विकास किया। अत: यह बात निरर्थक है कि हमारे देश में प्राचीनकाल में राष्ट्र और राष्ट्रीता से लोग परिचित नही थे, और इन दोनों शब्दों से उनका परिचय अंग्रेजों ने कराया।
मूलरूप में आर्य लोग पुरू, यदु, तुर्वशु, अनु और द्रहयु, इन पांचों शाखाओं में विभक्त होकर इधर उधर फैले। इन शाखाओं को वेद की शैली में ”पंचजना” कहा गया। कृष्ण जी का शंख पांचजन्य इसीलिए कहा जाता था कि वह संपूर्ण आर्यावत्र्त के प्रतिनिधि पुरूष थे। कदाचित प्राचीन काल में ऐसी प्रथा भी रही होगी कि जब किसी विवाद की स्थिति में लोग इन पांच शाखाओं के प्रमुखों को बुलाकर विवाद का निर्णय कर लिया करते होंगे। राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी पंचायतों (पांच शाखा पुरूषों के बैठने का स्थान) क्षेत्रीय स्तर पर पंच निर्णयों के रूप में प्रभावी हुआ। गांवों में लोग आज भी किसी पंचायत का निर्णय पांच शाखा प्रमुखों से ही कराते हैं।
इन पांचों शाखाओं में परस्पर विवाह संबंध थे। परंतु सगोत्र विवाह निषिद्घ थे। पाणिनि की अष्टा ध्यायी से हमें पता चलता है कि गोत्र कुल या परिवार की ही संज्ञा थी। इन गोत्रों के प्रमुखों को गोत्रापत्य या कुल मुख्य कहा जाता था। आज इन्हें हम भारतीय समाज में मुखिया के नाम से जानते हैं। ये मुखिया लोग परिवार की, समाज की और राष्ट्र की परंपराओं को समझने वाले और तदानुसार अपने परिवार को समाज और राष्ट्र की मुख्यधारा में चलाकर व्यवस्था में अपने परिवार को सहभागी बनाने वाले होते थे। परस्पर एक ही कुल परिवार के लोग स्वयं को वेद के सबंधून शब्द के अनुसार ‘गोत्री बंधु’ (गोती भाई) मानते थे। इससे बनती थी भारत की सामाजिक समरसता से भरपूर सामासिक संस्कृति।
अंग्रेजों ने भारत की इस सामासिक संस्कृति को विनष्ट करने का प्रयास किया। क्योंकि वह भारत को गहराई से समझने में तो असफल रहे ही थे साथ ही उन्हें भारत को दास बनाकर रखना था। इसलिए वह नही चाहते थे कि भारत में भारत के लोग स्वसंस्कृति और स्व इतिहास को समझें। इसलिए अंग्रेजों ने यहां नई नई अवधारणाएं स्थापित करनी आरंभ की अंग्रेजों ने भारत के जन शब्द की तुलना जर्मन भाषा के थिण्ड लैटिन के सिविटास तथा ग्रीक भाषा के पोलिस शब्द से की। भारत में उन्होंने जन को ट्राईब कहा। जिससे शैड्यूल ट्राईब जैसे शब्द की उत्पत्ति हो गयी। आज यह शब्द सब प्रकार से पिछड़े हुए व्यक्ति या व्यक्तियों के लिए प्रयुक्त हो रहा है। कहां से कहां आ गये हम? अत्यंत पवित्र शब्द को हमने किस प्रकार का स्वरूप दे डाला। इसे हम अपनी उन्नति कहें या अवन्नति?
भारत में जन शब्द थिण्ड, सिविटास, और पोलिस सबसे बढ़कर था। जन शब्द जहां प्रेम, स्नेह, सहयोग, सम्मैत्री और सहृदयता की भावना से ओतप्रोत था वहीं थिण्ड सिविटास और पोलिस जैसे शब्दों ने कबीलों का रूप लेकर परस्पर घृणा और शत्रुता को बढ़ावा दिया, भारत मेें कबीलाई संस्कृति नही थी अपितु यहां जन संस्कृति थी। पश्चिमी जगत का इतिहास कबीलाई संस्कृति का इतिहास है। इसीलिए कहां प्राचीन काल से लोगों में वर्ग संघर्ष की भावना मिलती है। जबकि भारत में वर्ग संघर्ष के स्थान पर परस्पर करूणा, सम्मैत्री और उदारता का भाव मिलता है। इसी से भारत की सामाजिक संस्कृति का निर्माण हुआ।
पश्चिमी धारणाओं और मान्यताओं का शिकार होकर हम अपनी जन संस्कृति का विध्वंस कर रहे हैं। भारत के संविधान ने हमें एक शब्द भारत की सामासिक संस्कृति का देकर भी भारत के समाज को अनुसूचित जाति, जनजाति, की अंग्रेजी मानसिकता में विभक्त कर दिया।
हमें इस ओर समय रहते ध्यान देना चाहिए। हम अपनी प्राचीन संस्कृति की पुर्नस्थापना के प्रति समर्पित हों तथा पुन: जन संस्कृति की स्थापना करें। संविधान की मूल भावना तो यही है।

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