ओ३म् “हिन्दू जाति के रक्षक व उद्धारक महर्षि दयानन्द सरस्वती”

maharishi dayanand

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महर्षि दयानन्द एक पौराणिक पिता व परिवार में गुजरात प्रान्त के मौरवी जनपद के टंकारा नामक ग्राम में 12 फरवरी, सन् 1825 को जन्में थे। उनके पिता शिव भक्त थे। उनके परिवार के सभी सदस्य भी पौराणिक आस्थाओं में विश्वास रखने वाले जन्मना ब्राह्मण थे। स्वामी दयानन्द का बचपन का नाम मूलजी व मूलशंकर था। आपने बचपन से ही पिता व माता के धार्मिक क्रियाकलापों को देखकर उन्हीं का पालन किया था। सन् 1839 की शिवरात्रि को भी उन्होंने पिता की प्रेरणा पर शिवरात्रि का व्रत रखा और वह सभी क्रियायें व कार्य किये जिनका उल्लेख उनके पिता ने ‘शिव पुराण’ के अनुसार करने को कहा था। शिवरात्रि को रात्रि जागरण के समय भी मन्दिर के पुजारी और वहां जागरण करने आये सभी शिवभक्त निद्रालीन हो गये थे परन्तु 14 वर्ष का शिव के प्रति श्रद्धावान बालक मूलशंकर जागता रहा और शिवलिंग वा मूर्ति पर अपना ध्यान केन्द्रित किये विचारमग्न बैठा रहा। रात्रि को मन्दिर के भीतर बिलों से चूहे निकले और उन्होंने शिवलिंग की मूर्ति पर चढ़कर वहां भक्तों द्वारा अन्न व नैवेद्य आदि पदार्थों का भक्षण किया। स्वामी दयानन्द के बाल हृदय में ईश्वर से प्रेरणा हुई कि महाशक्तिशाली भगवान शिव इन क्षुद्र चूहों को अपने मस्तक से भगा क्यों नहीं रहे हैं। बहुत विचार करने के बाद उन्हें यह अनुभव हुआ कि शिव की यह मूर्ति शक्ति विहीन है। यह न तो अपनी रक्षा कर सकती है और अपने भक्तों की रक्षा करने का तो प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। उन्होंने अपने पिता पं. कर्षनजी तिवाड़ी को जगाया। पौराणिक ज्ञानी पिता तथा पुजारी आदि में से कोई भी उनकी शंकाओं का समाधान नहीं कर सका। शिवरात्रि की इस घटना ने ही बालक मूलशंकर को वेदों का पुनरुद्धारक, प्रचारक, भाष्यकार, ईश्वर-जीव-प्रकृति के सत्यस्वरूप का सफल अनुसंधानकर्ता, विश्व गुरु, सनातन वैदिक धर्म का रक्षक तथा अविद्यायुक्त मिथ्या मतों का समीक्षक सहित सत्य सनातन वेदमत का प्रचारक व इस कार्य को युगों-युगों तक जारी रखने के लिये आर्यसमाज का संस्थापक बनाया। यदि एक वाक्य में कहें तो ऋषि दयानन्द और उनका आर्यसमाज सत्य का पोषक और असत्य वा अविद्या का निवारक व संशोधक है।

स्वामी दयानन्द की इन महत्वपूर्ण कार्यों के कारण हिन्दुओं में एक सच्चे सुधारक व वेदोद्धारक की जो सच्ची छवि बननी चाहिये थी वह लोभी व अभिमानी लोगों ने बनने नहीं दी। ऋषि दयानन्द ने जो कार्य किया वह सृष्टिकर्ता ईश्वर की प्रेरणा व सत्य व असत्य की परीक्षा कर संसार के मानव वा प्राणीमात्र के हित के लिये किया था। स्वार्थी व अज्ञानियों को सत्य प्रिय नहीं होता, उन्हें अपना स्वार्थ व मिथ्या हित ही प्रिय होते हैं जिस कारण वह अपना व दूसरों का भी अपकार करते हैं। देश व समाज की भी इन कार्यों से हानि ही होती है। इसी कारण सभी अज्ञानी व स्वार्थी लोगों ने ऋषि दयानन्द के साथ अन्याय किया। इस पर भी अनेक मतों के सज्जन लोगों ने ऋषि दयानन्द के कार्यों का महत्व समझा और उनके प्रति सच्ची भावनायें व्यक्त की हैं। इस श्रृंखला में अनेक नाम हैं। हम योगी अरविन्द, वीर सावरकर, पं. मदनमोहन मालवीय, प्रो. मैक्समूलर, सन्त रोमा रोला आदि के नाम ले सकते हैं। अब पौराणिक मत क्या है इस पर भी विचार कर लेते हैं।

सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने मनुष्यों व अन्य सभी प्राणियों की अमैथुनी सृष्टि कर चार ऋषियों को अपना सत्य व निभ्र्रान्त ज्ञान ‘‘चार वेद” दिया था। यह चार वेद हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद। इसी ज्ञान को जानना व इसका आचरण करना ही संसार के सभी मनुष्यों का धर्म नहीं अपितु परम धर्म है। इस परमधर्म का पालन करने व कर्तव्य में शिथिलता के कारण ही संसार में अविद्या से युक्त मत-मतान्तरों की सृष्टि हुई है। जिस प्रकार से सन्तान के लिये पिता की सत्य आज्ञाओं का पालन करना अनिवार्य धर्म होता है उसी प्रकार से संसार के सभी प्राणियों के माता और पिता परमात्मा की सत्य आज्ञाओं का पालन भी सभी मनुष्यों का धर्म व कर्तव्य है। ईश्वर ने अपनी सभी आज्ञायें वेदों के माध्यम से हमें प्रदान की हैं। वेद की आज्ञायें ही सृष्टि के आरम्भ से महाभारतकाल पर्यन्त के 1.96 अरब वर्षों तक सभी मनुष्यों का धर्म रहीे हैं। महाभारत काल के बाद से अज्ञान के छा जाने से भारत और विश्व के सभी देशों में अविद्यायुक्त मतों का प्रचलन हुआ। भारत में सनातन वैदिक धर्म भी अज्ञान से प्रभावित हुआ। महाभारत के बाद वेद के शब्दों के अर्थों के अनर्थ किये गये। वेद यज्ञों को ‘‘अध्वर” अर्थात् ऐसा अनुष्ठान बताते हैं जिसमें हिंसा का कोई स्थान नहीं है तथापि हमारे वेद के सत्य अर्थों से विहिन धर्माचार्यों ने अपनी अज्ञानता से वेदों में हिंसा का व्यवहार किया। यज्ञों में पशुओं को मारकर उनके मांस की आहुतियां दिए जाने की परम्परा का आरम्भ भी देश में हुआ। वेद सब मनुष्यों की एक जाति ‘मनुष्य जाति’ बताता है। मनुष्य का सत्य अर्थ मननशील और चिन्तक होना है। वेद इन अर्थों की प्रेरणा करता है और कहता है कि मनुष्य तू मनुष्य बन, मनन व चिन्तन कर, वेद पढ़, सत्यासत्य का विवेचन कर।

महाभारत काल के बाद अज्ञानी मनुष्यों ने समाज में स्त्रियों व दलितों को विद्या के अधिकार से वंचित कर दिया। वेद में स्पष्ट विधान है कि ईश्वर की वेद विद्या के अध्ययन, सुनने, पढ़ने तथा प्रचार करने का सभी मनुष्यों को अधिकार है परन्तु हमारे अविद्यायुक्त जन्मना ब्राह्मणों ने स्त्री व शूद्रों का वेदाधिकार नहीं है, इस मिथ्या मान्यता का प्रचार किया। अतीत में जन्मना जातिवाद का किसी सनातनी मन्दिर व उनके प्रवचनकर्ता द्वारा विरोध नहीं देखा गया। इसी जन्मना जातिवाद के कारण हिन्दुओं की शक्ति क्षीण हुई। यदि हिन्दुओं में जन्मना जातिवाद न होता तो यह विश्व का सबसे अधिक शक्तिशाली संगठन होता और इतिहास में यवनों व अंग्रेजों ने जो यहां लूटपाट की, हमारे पूर्वजों के स्वत्व का हरण किया और हमें पराधीन बनाया, वह कदापि न होता। फलित ज्योतिष का भी शास्त्रों में कहीं विधान नहीं है। ज्योतिष सूर्य, चन्द्र आदि प्रकाशक व प्रकाश्य पिण्डों व उनकी गतियों के सत्य ज्ञान को कहते हैं। सूर्य, चन्द्र ग्रहण आदि के अध्ययन में इस विद्या का उपयोग किया जाता है। ज्योतिष व फलित ज्योतिष का मनुष्य के भाग्य से किसी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं है। वेदों के प्रकाण्ड विद्वान ऋषि दयानन्द फलित ज्योतिष को अविद्या मानते हैं। उन्होंने कभी इसका समर्थन नहीं किया। मनुष्य के सुख व दुःखों का आधार उनका प्रारब्ध व क्रियमाण कर्म होते हैं। हमारा प्रारब्ध, क्रियमाण कर्म और देश, काल, परिस्थितियां आदि ही हमारे सुख व दुःख का कारण होते हैं। फलित ज्योतिष व ग्रहों का मनुष्य के भाग्य व सुख, दुःख से कुछ भी लेना देना नहीं है। इस फलित ज्योतिष ने भी देश को पराजय देने व भारतीय मन्दिरों की लूट व आर्य-हिन्दू जाति को दासत्व प्रदान करने में सबसे अधिक भूमिका निभाई है। महर्षि दयानन्द ने इस अविद्या व कृत्य का खण्डन हिन्दुओं को इसके हानिकारक प्रभावों से बचाने के लिये किया है। संसार के देशों में जहां इस प्रकार के अन्धविश्वास नहीं हैं, उन देशों को हम भौतिक सुखों की दृष्टि से सबसे अधिक उन्नत व विकसित पाते हैं। आश्चर्य एवं खेद है कि आज भी भारत के लोग व उनके धर्मगुरु अपने अनुयायियों को इस अविद्या से मुक्त कराने के लिये प्रयत्नशील नहीं है। जिन लोगों को इससे आर्थिक लाभ पहुंच रहा है, वह तो इसका प्रचार करेंगे ही। हमारे देश के नियम भी इस प्रकार की अविद्या के विस्तार में सहायक हैं। वैदिक काल में ऐसा सम्भव नहीं था।

महाभारत काल के बाद लोगों के आलस्य व प्रमाद के कारण देश व विश्व में अविद्या का विस्तार हुआ। इसके परिणामस्वरूप अविद्वान धर्माचार्यों ने वेदविरुद्ध कर्मकाण्डों व परम्पराओं का प्रचलन किया। वेदों का अध्ययन-अध्यापन समाप्त हो गया। यज्ञों में पशु हिंसा का विरोध करने के लिये बौद्ध मत की स्थापना हुई। जैन मत भी अहिंसा पर आधारित मत है। इसका कारण भी यज्ञों में की जाने वाली अनुचित शास्त्र विरुद्ध हिंसा ही थी। बौद्ध व जैन मतों का प्रभाव बढ़ने पर इसको रोकने के लिये लोगों को अन्धविश्वासों में फंसाया गया। पुराणों का रचना काल बौद्ध व जैन मत, जो लगभग 2500 वर्ष पूर्व है, इसके बाद का है। पुराणों में सिद्धान्त व मान्यताओं की दृष्टि से समरसता न होकर परस्पर विरोध है। पुराणों में अश्लीलता भी पाई जाती है जिसका उल्लेख पं. मनसाराम आदि आर्य विद्वानों के ग्रन्थों में देखा जा सकता है। इसमें ज्ञान कम व कहानी-किस्से अधिक हैं जो अधिकांश अविश्वसनीय एवं अनैतिहासिक हैं जिससे इन ग्रन्थों की सामग्री को धर्म कदापि नहीं कह सकते। वेद और ऋषियों के वेदानुकूल ग्रन्थों के होते हुए कोई मनुष्यकृत पुस्तक धर्म का प्रामाणिक ग्रन्थ हो भी नहीं सकता। वही ग्रन्थ धर्म ग्रन्थ हो सकता है जिसकी शत-प्रतिशत मान्यतायें वेदों की शिक्षाओं व मान्यताओं के अनुरूप व अनुकूल हों। मूर्तिपूजा, अवतारवाद, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध, जन्मना जातिवाद, मनुष्य-मनुष्य में भेद वेदों से अपुष्ट व वेद विरुद्ध होने से त्याज्य हैं। यदि कोई इसका सेवन करता है तो वह धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष से दूर होता है।

वेद विरुद्ध मान्यताओं के अनुकरण व आचरण से मनुष्य जन्म व परजन्म दोनों उन्नत न होकर अवनत होते हैं। इन बातों का ही मुख्य रूप से महर्षि दयानन्द जी ने प्रचार किया। जो भी मनुष्य इन सिद्धान्तों का त्याग कर सत्य सनातन वैदिक सिद्धान्तों पर चलेगा उसका जीवन संवरने के साथ वह मोक्षगामी होगा। महर्षि दयानन्द की बातें साधारण व मलिन बुद्धि के लोगों को रुचिकर नहीं होती। उनके प्रचार का उनके समय व बाद के बुद्धिजीवियों में आशातीत प्रचार हुआ। इसी कारण आर्यसमाज को स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, महाशय राजपाल, लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द, रामप्रसाद बिस्मिल, पं. गणपति शर्मा, स्वामी अमर स्वामी, पं. गंगा प्रसाद उपाध्याय, महात्मा आनन्द स्वामी, स्वामी विद्यानन्द सरस्वती, पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु, पं. भगवद्दत्त जी, पं. युधिष्ठिर मीमांसक, पं. विश्वनाथ विद्यालंकार, आचार्य डाॅ. रामनाथ वेदालंकार, पं. शिवपूजनसिंह कुशवाह जी जैसे उच्च कोटि के विद्वान मिले। अनेक मतों के लोगों ने भी वैदिक धर्म के सिद्धान्तों से प्रभावित होकर इसे अपनाया है। जो लोग ऋषि दयानन्द के अनुयायी बने वह सब पहले 95 प्रतिशत से अधिक सनातन हिन्दू पौराणिक मतानुयायी ही थे। उन्होंने ऋषि दयानन्द की भावनाओं को समझा। उन्हें हिन्दुओं के लिए हितकार पाया और उसे स्वीकार किया तथा समाज सुधार व उत्थान के अनूठे प्रयास किये। आर्यसमाज ने सबसे बड़ा काम यह किया कि वेदों का प्रचार करके हिन्दुओं के धर्मान्तरण की गति पर रोक लगाई और इच्छुक विधमियों को आर्य हिन्दू मत में सम्मिलित किया। आर्यसमाज के कारण ही हिन्दुओं में जन्मना जातिवाद व परस्पर भेदभाव का विष कम हुआ तथा आज सर्वत्र गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित तथा माता-पिताओं द्वारा निर्धारित अन्तर्जातीय विवाह हो रहे हैं। पे्रम विवाह का प्रचलन भी बढ़ रहा है। संसार में सबसे ऊंची मूर्ति सरदार पटेल जी की है। इन्होंने देश की एकता व अखण्डता के लिये लगभग 550 रियासतों का भारत में विलय कर एक अद्वितीय इतिहास रचा है। उनके जैसा देशहितैशी राजनीतिज्ञ शायद विगत दो सौ वर्षों में नहीं हुआ। लोग उनके चरित्र की पूजा करते आ रहे हैं उनकी मूर्ति की नहीं। यही काम हमें अपने अन्य महापुरुषों राम, कृष्ण आदि के प्रति भी करना है। उनके चरित्र को अपनाना है। उनकी मूर्ति बनाकर फूल प्रसाद चढ़ाने से लाभ नहीं होगा अपितु उनके आदर्श जीवन को अपनाकर ही हम चरित्रवान् व श्रेष्ठ बन सकते हैं।

ऋषि दयानन्द हिन्दुओं के रक्षक एवं सुधारक थे। उन्होंने हिन्दू समाज की सभी बुराईयों को दूर करने का सर्वप्रथम प्रभावशाली कार्य किया। उन्होंने वेदों व उसके सत्य अर्थों का प्रकाश व उद्धार भी किया। ऋषि दयानन्द परमात्मा और उसके बनाये सभी मनुष्यों व प्राणियों को सच्चे हृदय से प्रेम करते थे। किसी भी मत, पन्थ व सम्प्रदाय व उनके अनुयायियों के प्रति उनमें लेशमात्र भी पक्षपात नहीं था। वह सबको सत्य धर्म का पालन कराकर मोक्ष मार्ग पर ले जाना चाहते थे और एक सुखी व शान्ति से युक्त विश्व का निर्माण करना चाहते थे। हम अनुमान करते हैं कि जब भी विश्व में सम्पूर्णता से शान्ति स्थापित होगी तो वह केवल वेद के सिद्धान्तों व महर्षि दयानन्द द्वारा सुझाये गये उपायों व प्रयासों से ही होगी। मनुष्य के जीवन तथा देश की उन्नति के लिए देश व संसार के सभी लोगों को ऋषि दयानन्द के जीवनचरित्र एवं उनके लिखे वैदिक ग्रन्थों सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिवनय, व्यवहारभानु, गोकरुणानिधि आदि को पढ़ना चाहिये। इसके साथ ही सभी को प्रातः व सायं ‘सन्ध्या’ एवं दैनिक अग्निहोत्र भी करना चाहिये। वेदाध्ययन एवं वेदाचरण को करके ही हिन्दूजाति की दुर्बलताओं को दूर कर उसे शक्तिशाली बनाया जा सकता है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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