*क्यों खेलना भूल गया भारत*?

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लेखक आर्य सागर खारी

विज्ञान ,अर्थशास्त्र, साहित्य के क्षेत्र में जो प्रतिष्ठा स्वीडिश नोबल एकेडमी नोबेल पुरस्कार की है, खेलों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में वही शिरोमणि पदवी ओलंपिक खेलों को आज प्राप्त हैं।

पेरिस ओलंपिक 2024 अपने शुभारंभ समारोह से लेकर समापन समारोह की ओर अग्रसर हो गया है काउंटडाउन चल गया है लेकिन भारत विश्व का सर्वाधिक आबादी का देश जिसमें युवाओं की आबादी 35 फ़ीसदी से अधिक है जिसे सर्वाधिक युवा देश माना जाता है वह आज भी पदकों का दहाई का आंकड़ा नहीं छु पाया है। स्वर्ण पदक खाता खोलने के लिए तो वह आज भी संघर्ष कर रहा है।

कोई देश यदि खेलों में अग्रणी है तो यह इस बात का निश्चायक है कि उस देश के नागरिकों का शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही उत्तम होगा। स्वस्थ शरीर में ही, स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है ।

सभ्यता के आदिकाल से ही भारत में समृद्ध खेल संस्कृति रही है यहां कुमारों को आचार्य के कुल में खेल-खेल में युद्धक विद्या सिखाईं जाती थी। चाहे तलवारबाजी हो, पादाघात (किकबॉक्सिंग) मलखंभ ( जिम्नास्ट ) भालाबाजी (जैवलिन थ्रो) मुकद्दड उठाना( वेट लिफ्टिंग), नियुद्ध (रेसलिंग ) मुष्ठी प्रहार (बॉक्सिंग) जैसे सैकड़ो खेलों की संहिता, इनमें काम आने वाले उपकरण, उपकरणों का मानक, शारीरिक अहर्ता, तकनीकी बारीकियां धनुर्वेद के परंपरा से उपलब्ध ग्रन्थों में मिलती है यद्यपि दुर्भाग्य से अनेक आचार्यों के धनुर्वेद पर लिखे गए ग्रंथ पूरे पूरे परंपरा से नहीं मिलते।

इस कथन में कोई अतिशयोक्ति नहीं है भारत ने दुनिया को खेलना सिखाया । चाहे मनोरंजन की क्रीड़ा भूमि हो या रण की क्रीडा भूमि।

खेल विभूतियां को तरासने तलाश ने खेल संस्कृति को समृद्ध करने का मुख्य दामोदार प्राचीन भारत में आचार्य प्रवरों अर्थात शिक्षा व्यवस्था पर ही रहा है।

पश्चिमी देशों चीन आदि यदि आज खेलों में अग्रणी है तो वहां स्कूली व्यवस्था का इसमें सर्वाधिक योगदान है। स्पोर्ट यूनिवर्सिटी स्कूली खेल प्रतिभाओं को वहां तरासती हैं।

भारत में भी ऐसा ही प्रयास देश की संसद ने वर्ष 2009 में किया था शिक्षा के अधिकार कानून में एक प्रावधान जोड़ा गया था कोई भी विद्यालय हो चाहे सरकारी या प्राइवेट किसी भी बोर्ड का वह अधिक से अधिक 30 बच्चों के ऊपर अपने विद्यालय में शारीरिक शिक्षा खेलों का विशेषज्ञ एक प्रशिक्षक शिक्षक रखेगा।

प्रत्येक स्कूल के लिए प्लेग्राउंड का मानक तय किया गया है।

लेकिन दुर्भाग्य से शिक्षा के अधिकार कानून के इन उपबंधों को आज तक व्यापकता से सरकारी व निजी किसी भी स्कूली व्यवस्था में लागू नहीं कराया जा सका है प्रायः में देखता हूं दो दो हजार, तीन-तीन हजार बच्चे प्राइवेट फाइव स्टार स्कूलों में शिक्षा अर्जित कर रहे हैं लेकिन वहां भी महज एक या दो शारीरिक शिक्षा के शिक्षक शिक्षिक रखे जाते हैं।

स्कूलों में स्पोर्ट्स क्लासों के नाम पर खानापूर्ति बरती जाती है।

प्राचीन खेल या युद्ध विद्या के आचार्यों को राजव्यवस्था से पूरा संरक्षण मिलता था । कौटिल्य अर्थशास्त्र में उल्लेख मिलता है राजा की ओर से खेल के समान, खेल क्रिडा स्थल आदि की व्यवस्था गांव स्तर पर की जाती थी। खेल प्रशिक्षक व खिलाड़ी दोनों भरण पोषण होता था ।आज खेल आजीविका परक नहीं है यदि शिक्षा के अधिकार कानून के खेल से जुड़े मानकों को पूरी ईमानदारी कडाई से लागू कर दिया जाए तो देश में करोड़ों रोजगार खेलों से सर्जित किये जा सकते हैं । मानव अधिकारों के हितों की संरक्षण की तरह खेल व खिलाड़ी के हितों का संरक्षण के लिए अब अदद आयोग की भी आवश्यकता है जिसकी प्रति खेल संस्था खेल संघ व उनके पदाधिकारी जवाब देह हो।

लेखक आर्य सागर खारी

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