मनु और बुद्ध के स्त्री सम्बन्धी विचारों का तुलनात्मक अध्ययन

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मनु और महात्मा बुद्ध के विचार


मनु और बुद्ध के स्त्री सम्बन्धी विचारों का तुलनात्मक अध्ययन –
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महर्षि मनु कृत मनु स्मृति में–
यत्र नार्य्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्रऽफलाः क्रियाः। मनुस्मृति 3/56
अर्थात जिस समाज या परिवार में स्त्रियों का सम्मान होता है, वहां देवता अर्थात् दिव्यगुण और सुख़- समृद्धि निवास करते हैं और जहां इनका सम्मान नहीं होता, वहां अनादर करने वालों के सभी काम निष्फल हो जाते हैं।
पिता, भाई, पति या देवर को अपनी कन्या, बहन, स्त्री या भाभी को हमेशा यथायोग्य मधुर-भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रखना चाहिए और उन्हें किसी भी प्रकार का क्लेश नहीं पहुंचने देना चाहिए। -मनुस्मृति 3/55
जिस कुल में स्त्रियां अपने पति के गलत आचरण, अत्याचार या व्यभिचार आदि दोषों से पीड़ित रहती हैं। वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है और जिस कुल में स्त्री-जन पुरुषों के उत्तम आचरणों से प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सर्वदा बढ़ता रहता है। -मनुस्मृति 3/57
जो पुरुष, अपनी पत्नी को प्रसन्न नहीं रखता, उसका पूरा परिवार ही अप्रसन्न और शोकग्रस्त रहता है और यदि पत्नी प्रसन्न है तो सारा परिवार प्रसन्न रहता है। – मनुस्मृति 3/62
पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के बिना अपूर्ण हैं, अत: साधारण से साधारण धर्मकार्य का अनुष्ठान भी पति-पत्नी दोनों को मिलकर करना चाहिए।-मनुस्मृति 9/96
ऐश्वर्य की कामना करने हारे मनुष्यों को योग्य है कि सत्कार और उत्सव के समयों में भूषण वस्त्र और भोजनादि से स्त्रियों का नित्यप्रति सत्कार करें। मनुस्मृति
पुत्र-पुत्री एक समान। आजकल यह तथ्य हमें बहुत सुनने को मिलता है। मनु सबसे पहले वह संविधान निर्माता है जिन्होंने जिन्होंने पुत्र-पुत्री की समानता को घोषित करके उसे वैधानिक रुप दिया है- ‘‘पुत्रेण दुहिता समा’’ (मनुस्मृति 9/130) अर्थात्-पुत्री पुत्र के समान होती है।
पुत्र-पुत्री को पैतृक सम्पत्ति में समान अधिकार मनु ने माना है। मनु के अनुसार पुत्री भी पुत्र के समान पैतृक संपत्ति में भागी है। यह प्रकरण मनुस्मृति के 9/130 9/192 में वर्णित है।
आज समाज में बलात्कार, छेड़खानी आदि घटनाएं बहुत बढ़ गई है। मनु नारियों के प्रति किये अपराधों जैसे हत्या, अपहरण , बलात्कार आदि के लिए कठोर दंड, मृत्युदंड एवं देश निकाला आदि का प्रावधान करते है। सन्दर्भ मनुस्मृति 8/323,9/232,8/342
नारियों के जीवन में आनेवाली प्रत्येक छोटी-बडी कठिनाई का ध्यान रखते हुए मनु ने उनके निराकरण हेतु स्पष्ट निर्देश दिये है।
पुरुषों को निर्देश है कि वे माता, पत्नी और पुत्री के साथ झगडा न करें। मनुस्मृति 4/180 इन पर मिथ्या दोषारोपण करनेवालों, इनको निर्दोष होते हुए त्यागनेवालों, पत्नी के प्रति वैवाहिक दायित्व न निभानेवालों के लिए दण्ड का विधान है। मनुस्मृति 8/274, 389,9/4
मनु की एक विशेषता और है, वह यह कि वे नारी की असुरक्षित तथा अमर्यादित स्वतन्त्रता के पक्षधर नहीं हैं और न उन बातों का समर्थन करते हैं जो परिणाम में अहितकर हैं। इसीलिए उन्होंने स्त्रियों को चेतावनी देते हुए सचेत किया है कि वे स्वयं को पिता, पति, पुत्र आदि की सुरक्षा से अलग न करें, क्योंकि एकाकी रहने से दो कुलों की निन्दा होने की आशंका रहती है। मनुस्मृति 5/149, 9/5- 6 इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनु स्त्रियों की स्वतन्त्रता के विरोधी है| इसका निहितार्थ यह है कि नारी की सर्वप्रथम सामाजिक आवश्यकता है -सुरक्षा की। वह सुरक्षा उसे, चाहे शासन-कानून प्रदान करे अथवा कोई पुरुष या स्वयं का सामर्थ्य।
उपर्युक्त विश्‍लेषण से हमें यह स्पष्ट होता है कि मनुस्मृति की व्यवस्थाएं स्त्री विरोधी नहीं हैं। वे न्यायपूर्ण और पक्षपातरहित हैं। मनु ने कुछ भी ऐसा नहीं कहा जो निन्दा अथवा आपत्ति के योग्य हो।

बौद्ध मत में नारी सम्बन्धी विचार ( साभार श्री कार्तिक अय्यर )
ये सब हमने बौद्ध मत के मान्य ग्रंथों से ही लिखा है राहुल सांकृत्यायन, कौसल्यायन आदि आदि ने जो लिखा, वो हमने नकल कर दिया। यदि इनमें बुराई हो, तो बुराई का दोष उन ग्रन्थों का है. प्रकाशक लेखक अनुवादक आदि सभी बौद्ध हैं.
१:- स्त्री वर्ग संतापी, ईर्ष्यालु, मूर्ख, मत्सरी और बुद्घिहीन है।
(अंगुत्तरनिकाय चक्कतुनिपात)
२:- स्त्रियां धूर्त, झूठी, कारस्थानी,अप्रामाणिक, गुप्त व्यवहार करने वाली है। ”
(जातककथा ६२/१९२)
३:-“भिक्षुओं! काले सांप में पांच दुर्गुण हैं। अस्वच्छता, दुर्गंध, बहुत सोने वाला, भयकारक और मित्रद्रोही (विश्वासघाती)। ये सारे दुर्गुण स्त्रियों में भी हैं। वे अस्वच्छ, दुर्गंधयुत, बहुत सोने वाली, भय देने वाली और विश्वासघाती है।”
(अंगु.पांचवा निपात, दीपचारिका वग्गो, पठण्हसुत्त ५/२३/९)
स्त्रियां नरकगामी हैं
१:- अधिकतर स्त्रियों को मैंने नरक में देखा है। उसके तीन कारण हैं जिससे स्त्रियां नरकगामी बनती हैं:-
-वो पूर्वाह्न काल में, सुबह, कृपण और मलिन चित्त की होती है।
-दोपहर में मत्सर युक्त होती हैं।
-रात को लोभ और काम युक्त चित्त की होती है।
(संयुक्त निकाय, मातुगामसंयुत्त, पेयाल्लवग्गो , तीहिधम्मोसुत्त ३५/१/४)
स्त्रियों को बुद्ध बनने का अधिकार नहीं है
१:- स्त्री कभी भी बुद्ध नहीं बन सकती।
(पाली जातक,अट्ठकथानिदान,निदानकथा १९)
वैदिक मान्यता में स्त्रियाँ ऋषियों के समान ऋषिका भी हैं.
२:- स्त्री बुद्ध नहीं बन सकती। केवल तभी बन सकती है जब पुरुष का जन्म ले ले। स्त्री चक्रवर्ती सम्राट भी नहीं बन सकती। केवल पुरुष ही राजा बन सकता है। केवल पुरुष ही शक्र, मार, ब्रह्मा बन सकता है।
(अंगुत्तरनिकाय, एककनिपात,असंभव वग्गो,द्वितीय वर्ग, १/१५/१)
बौद्ध धम्मसंघ में स्त्रियों की स्थिति
१:- स्त्री को संन्यास लेने की शर्त बताते हुये बुद्ध कहते हैं कि-
-भले ही भिक्षुणी सौ साल की ही क्यों न हो, अपने से छोटे उम्र के भिक्षु को नमस्कार करेगी। उसके आते ही उठ जायेगी।
-किसी भी स्थिति में स्त्री भिक्षु का अनादर न करे, न उसको अपशब्द कहे।
-भिक्षु को कोई भिक्षुणी कभी भी उपदेश न करे। भिक्षु ही भिक्षुणी को उपदेश दे सकता है।
(अंगुत्तरनिकाय, आठवां निपात, गोतमीवग्गो, गोतमीसुत्त)
२:- बुद्ध मना कर देते हैं कि भिक्षु अपने से बड़ी आयु की भिक्षुणी को नमस्कार करे, आदर करे।
(विनयपिटक, चुल्लवग्गो,भिक्षुणी स्कंधक पेज ५२८, राहुल सांकृत्यायन)
स्त्रियों की निंदा
१:- स्त्रियां पुरुष का मन विचलित करती हैं। स्त्री का गंध, आवाज, स्पर्श विचलित करता है। स्त्री मोह में डालती है।
(अंगुत्तरनिकाय एककनिपात रुपादिवर्ग १)
२:- जब भिक्षु भिक्षापात्र लेकर जाये, कोई कन्या या युवती दिखे तो कोई और भिक्षु उसके साथ होना चाहिये ।
(संयुक्तनिकाय २०-२०)
३:- स्त्री मार का बंधन है यानी बुरी शक्ति है। जिसके हाथ में तलवार हो, पिशाच हो, विष देने वाला हो, उससे बात कर लो, पर स्त्री से कभी मत बोलो।
(अंगुत्तरनिकाय पांचवानिपात,विवरणवग्गो मातापुत्तसुत्त ५/६/५)

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