कांग्रेस के आत्मसम्मान को चोटिल करता इंडिया गठबंधन

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डॉ रवि प्रभात

देश लोकतंत्र का महाकुंभ मनाने जा रहा है । आम चुनाव भारतीय लोकतंत्र के लिए महोत्सव की तरह हैं। सतत तीन-चार माह तक चलने वाले इस महामंथन से जनता के मन की अभिव्यक्ति होती है तथा लोकतांत्रिक सरकार का गठन होता है, जिस से देश के भविष्य की दशा दिशा निर्धारित होती है।

इस लोकतांत्रिक महाकुंभ के लिए सभी पक्ष अपनी पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरकर एक दूसरे के समक्ष भारी चुनौती प्रस्तुत करने की तैयारी में है । यद्यपि भारत में स्पष्ट तौर पर बहुदलीय व्यवस्था है पर मुख्य तौर पर यह चुनाव द्विकोणीय होने जा रहा है । केंद्र की राजनीति में नरेंद्र मोदी के उदय के बाद आम चुनाव के स्वभाव में जो सबसे बड़ा परिवर्तन आया है वह यही है कि अब बहुकोणीय, चतुष्कोणीय अथवा त्रिकोणीय संघर्ष के बजाय द्विकोणीय संघर्ष होने लगा है।

द्विकोणीय कहने का यह अभिप्राय बिल्कुल नहीं है कि यह चुनाव द्विदलीय मुकाबले में परिवर्तित हो गया है परंतु द्विकोणीय का अभिप्राय यह है कि प्रमुख तौर पर दो बड़े गठबंधन केंद्रीय सत्ता पर काबिज होने के लिए ताल ठोक रहे हैं।

एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन सत्ता का प्रमुख दावेदार है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन ।

2024 के आम चुनाव की धुरी यह दोनों गठबंधन ही हैं इसलिए चुनाव की रणभेरी बजने की पूर्व संध्या पर दोनों धूरियों की तैयारी एवं बलाबल पर दृष्टिपात आवश्यक है ।

जिससे यह भी समझने का अवसर मिलेगा कि आगामी चुनाव में कौन सा गठबंधन कहां खड़ा है ।

2014 से लगातार दो चुनावो में भाजपा स्वयं अपने बलबूते साधारण बहुमत प्राप्त करने में सफल रही है। इस बीच विपक्ष के तमाम नेता भ्रष्टाचार के मामलों में जेल गए तथा अनेकों पर जेल जाने की तलवार साफ-साफ लटकने लगी, ऐसे में पूरे विपक्ष में एक बेचैनी थी जिस बेचैनी के उदर से इंडिया गठबंधन की उत्पत्ति हुई।

साल भर पहले बड़े जोर शोर से देश के सभी विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कवायद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लालू यादव की प्रेरणा से आरंभ की थी जिसको जल्दी ही कांग्रेज़ ने अपने कब्जे में ले लिया , अब इंडिया गठबंधन की प्रमुख कर्ताधर्ता कांग्रेस ही है।

इस पूरी कवायद के चलते पूरे सत्ता काल में सहयोगी दलों को दरकिनार कर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी भी सक्रिय हुई तथा देश भर के छोटे-मोटे लेकिन संख्या की दृष्टि से महत्वपूर्ण 38 दलों का एनडीए का एक सम्मेलन आयोजित किया । 2019 के चुनाव के बाद पहली बार ऐसा लगा कि भाजपा भी अपने सहयोगी दलों को महत्व देना चाहती है।

यहां तक गठबंधन की कवायद एक मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने की दृष्टि से तथा माहौल बनाने तक ही सीमित थी , क्योंकि यह सर्वविदित है कि कागज पर गठबंधन को आकार देना तथा उसे जमीन पर उतारना इन दोनों में महान अंतर होता है ।

असली परीक्षा दोनों गठबंधनों की यही से शुरू होनी थी कि चुनाव आते-आते जमीन पर कौन सा गठबंधन किस स्वरूप में उतरेगा और वास्तविक अर्थों में चुनाव से बिल्कुल पहले कितनी मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल करने में सफल रहेगा ।

पहली बात एनडीए गठबंधन की करें तो 2019 के कालखंड के बाद एक समय ऐसा आया जब भाजपा के सबसे पुराने एवं महत्वपूर्ण सहयोगी गठबंधन छोड़कर चले गए जिसमें अकाली दल , शिवसेना , अन्ना द्रमुक पन्ना तथा जदयू प्रमुख थे । अब गठबंधन के नाम पर बड़े दलों में केवल रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी ही एनडीए में बची थी । लेकिन जैसे ही साल भर पहले इंडिया गठबंधन की कवायद आरंभ हुई तो भाजपा ने भी एनडीए के पेंच कसने का काम शुरू किया और आज देखे तो एनडीए का कुनबा लगातार बढ़ रहा है जो केवल कागजों में नहीं अभी तो धरातल पर भी दिखाई दे रहा है ।

भाजपा ने उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोकदल से गठबंधन कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश समेत हरियाणा, राजस्थान के जाट समाज पर सकारात्मक असर डाला तथा किसानी राजनीति की धार भी अपनी तरफ मोड़ने का एक सफल प्रयास किया है । जिसकी बानगी वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन में साफ दिख रही है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश से अभी तक किसान आंदोलन की कोई लहर हमें दिखाइए नहीं दी।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा को अपने पाले में कर के कई सीटों पर अपनी राह आसान कर ली है। गौरतलब है कि यह दोनों घटक दल एक समय सपा के साथ थे तथा विधानसभा का चुनाव इन दोनों दलों ने सपा के साथ मिलकर बीजेपी के खिलाफ लड़ा था। उत्तर प्रदेश में अपना दल एवं निषाद पार्टी भी भाजपा के साथ एकजुट खड़ी हुई है , इस पूरे प्रयास से भाजपा उत्तर प्रदेश में भारी बढ़त बनाती हुई दिख रही है ।

बिहार में 2019 में 39 सीट जीतने वाली एनडीए के लिए बड़ी चुनौती उसे समय खड़ी हो गई जब जब भाजपा को छोड़कर जदयू इंडिया के साथ चला गया, चुनावी विश्लेषक एवं जमीनी समीकरण भी भाजपा को लोकसभा चुनाव में बड़े नुकसान की आशंका जताने लगे थे , परंतु एक विशेष घटनाक्रम में नीतीश कुमार इंडिया गठबंधन से बाहर आ गए और अब बिहार में एनडीए गठबंधन में जदयू, उपेंद्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी तथा चिराग पासवान बने हुए हैं और कहा जा रहा है कि मुकेश साहनी भी एनडीए घटक का हिस्सा बनेंगे। इस स्थिति में एनडीए गठबंधन बिहार में अब वापस उतना ही मजबूत नजर आ रहा है जितना मजबूत 2019 में था और जो बड़े नुकसान की आशंका जताई जा रही थी वह भी पूरी तरह से अब निराधार हो गई है।

इसी तरह महाराष्ट्र में भी शिवसेना के जाने के बाद एनडीए गठबंधन या भाजपा अलग-थलग पड़ती दिखाई दे रही थी , उसको भी शिवसेना एवं एनसीपी की टूट के बाद अब जमीन पर ठीक कर लिया गया है , ऐसी खबरें आ रही है कि राज ठाकरे की मनसे भी एनडीए का हिस्सा बन सकती है। इन परिस्थितियों में चुनावी विश्लेषक एनडीए गठबंधन को काफी मजबूत बता रहे हैं जबकि 2019 की परिस्थितियों में अर्थात विधानसभा चुनाव के बाद ऐसा लगने लगा था कि लोकसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन को 20 से ज्यादा सीटों का नुकसान केवल महाराष्ट्र में हो सकता है ।

एनडीए का गठबंधन यही नहीं अब तो आंध्र प्रदेश में भी एक बडा आकार लेता हुआ दिखाई दे रहा है जब पुरानी सहयोगी तेलुगू देशम पार्टी और पवन कल्याण की जनसेना एनडीए के छाते के नीचे आ गई । अब यह गठबंधन आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी की पार्टी पर बढ़त बनाते हुआ दिख रहा है और ऐसा प्रतीत होता है कि लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव में यह गठबंधन एक बड़ी बढ़त बना सकता है।

कर्नाटक के विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा में भाजपा के लिए परिस्थितियों अत्यंत कठिन दिखने लगी थी । विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बड़े अंतर से भाजपा को हराया था और सत्ता पर काबिज होने के बाद स्वाभाविक है कि लोकसभा चुनाव में उनको एक बड़ा लाभ मिल सकता था । लेकिन यहां भी एनडीए ने जनता दल सेक्युलर को एनडीए का हिस्सा बनकर सीटों के समीकरण को अपने पक्ष में करने में कोई कोताही नहीं बरती है। अभी भी उड़ीसा एवं पंजाब में अपने पुराने सहयोगियों के साथ एनडीए गठबंधन बातचीत कर रहा है जिसमें बीजू जनता दल तथा अकाली दल शामिल है , अगर यह गठबंधन भी सफलतापूर्वक आकार ले लेता है तो यह सुनिश्चित है कि उड़ीसा एवं पंजाब में भी एनडीए गठबंधन को अच्छी सफलता मिल सकती है ।दक्षिण भारत के दो-तीन राज्यों को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में एनडीए गठबंधन जमीन पर बेहद ताकतवर नजर आने लगा है ।

अब अगर बात करें दूसरे दावेदार अर्थात कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन की तो यह देखने में आता है कि गठबंधन के आरंभ की बैठकों में 26-27 महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय दल एक मंच पर इंडिया गठबंधन के बैनर तले इकट्ठे हुए थे परन्तु जैसे ही नेतृत्व करने के लिए झिझक रही कांग्रेस ने इसका नेतृत्व अपने हाथों में लिया तो इंडिया गठबंधन का कुनबा बनने से पहले ही बिखरने लगा । जनता में आरंभ से ही यह संदेश जाने लगा कि इंडिया गठबंधन तमाम अंतर विरोधों से घिरा हुआ है तथा इसका कल्पनिकता से आगे बढ़कर वास्तविक आकार लेना अत्यंत जटिल है ।

गठबंधन के प्रमुख नेताओं में शुमार ममता बनर्जी ने बंगाल में इंडिया गठबंधन को दुत्कार कर अलग चुनाव लड़ने का फैसला ले लिया है, दूसरे नेता शरद पवार अपनी राजनीतिक जीवन के सबसे बड़े संकट से जूझ रहे हैं । इंडिया गठबंधन की बैठक में उनके साथ जाने वाले प्रफुल्ल पटेल ने उनके ही भतीजे अजित पवार के साथ मिलकर एनसीपी पार्टी पर अपना कब्जा कर लिया है तथा यह दोनों एनडीए में शामिल हो गए हैं। शिवसेना की टूट के बाद एनसीपी का टूटना इंडिया गठबंधन के लिए बहुत बड़ा धक्का रहा है । अब प्रकाश आंबेडकर का बहुजन अघाड़ी भी महाराष्ट्र में बचे खुचे इंडिया गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर लगातार पेंच फंसा रहा है, जिससे वहां पर इंडिया गठबंधन को लेकर अभी तक असमंजस की स्थिति बनी हुई है ।

इस कड़ी में बिहार की बात करें तो इंडिया गठबंधन के शुरुआती चेहरे एवं कथित तौर पर प्रधानमंत्री पद के दावेदार रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वयं ही इंडिया गठबंधन को अलविदा कहकर एनडीए में शामिल हो गए और उन्होंने इंडिया गठबंधन की गाड़ी पर एक जबरदस्त ब्रेक लगा दिया । नीतीश के जाने का सबसे बड़ा नुकसान इंडिया गठबंधन को यह हुआ कि जो मनोवैज्ञानिक बढ़त लेने का प्रयास 2023 में इंडिया गठबंधन ने शुरू किया था वह पूर्णतः धराशाई होकर रसातल में चला गया तथा विपक्षी एकता के पैरोकार भी हताशा के शिकार हो गए ।

इंडिया गठबंधन को अगला झटका जयंत चौधरी ने दिया जब वह सपा का साथ छोड़कर एनडीए में शामिल हो गए , किसानी राजनीति के दम पर बढ़त लेने की इंडिया की मंशा धरी रह गयी।

इंडिया गठबंधन को अगला झटका जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस ने दिया जब उन्होंने पीडीपी को सीट देने से मना कर दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि इंडिया गठबंधन जिस स्वरुप में जमीन पर उतरना चाहता था वह उसे स्वरूप को धारण करने में नितांत असफल रहा ।

इंडिया गठबंधन के लिए राहत की खबर दिल्ली से आई जहां आम आदमी पार्टी के साथ उसका सफलतापूर्वक गठबंधन हुआ तथा दोनों दलों में चार और तीन सीटों पर लड़ने की सहमति बनी लेकिन इस गठबंधन की एवज में कांग्रेस को हरियाणा और गुजरात में से अपने हिस्से की सीटें आम आदमी पार्टी को देनी पड़ी जिसका नुकसान कांग्रेस को भविष्य में होने की पूरी संभावना है क्योंकि आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस का गठबंधन वैचारिक गठबंधन नहीं है, पंजाब में दोनों पार्टियों आमने-सामने हैं और एक दूसरे पर लगातार आक्रामक टिप्पणी कर रही हैं, इस हिसाब से पंजाब में भी इंडिया गठबंधन अब चुनाव में नहीं उतर पाएगा ।

झारखंड में हेमंत सोरेन के जेल जाने पर इंडिया गठबंधन कमजोर हुआ है ।

दक्षिण में तमिलनाडु में इंडिया गठबंधन सफलतापूर्वक बना है लेकिन केरल में वामपंथी पार्टियां और कांग्रेस आमने-सामने होंगे ।

इस पूरे विश्लेषण से यह स्पष्ट हो रहा है कि जिस मीडिया हाइप और शोर शराबे के साथ इंडिया गठबंधन का उदय हुआ व जितना बढ़ा चढ़ा कर इसके 2024 के चुनाव पर प्रभावों की भविष्यवाणी की गई वह चुनाव आते-आते वास्तविक धरातल पर धराशाई हो गई।

इसमें विशेष तौर पर जो कारण सामने आए वह कांग्रेस की संवादहीनता तथा कांग्रेस नेतृत्व की गैर गंभीरता कहीं जा रही है । नीतीश कुमार ने साफ तौर पर यह कहा कि जैसे ही तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव आए तो कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन की उपेक्षा कर दी और कोई मीटिंग नहीं की । वस्तुत: इन तीन राज्यों के चुनाव में कांग्रेस अच्छा परिणाम हासिल कर खुद को इंडिया गठबंधन में एक प्रभावी स्थिति में लाना चाहती थी जिससे कि छोटे दलों को प्रभावहीन करके इंडिया गठबंधन पर हावी हो जाए, लेकिन इन तीन राज्यों की हार ने इस गठबंधन को एक निराशा के अंधकार में धकेल दिया । क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षा भी इंडिया गठबंधन के बिखरने में कम जिम्मेदार नहीं कहीं जा सकती। ममता ने कांग्रेस के साथ बंगाल में बेहद अपमान पूर्ण व्यवहार किया , अखिलेश ने उत्तर प्रदेश में मनमाने ढंग से कांग्रेस को 12 सीट देने की एकतरफा घोषणा कर दी , जिस पर पानी डालने के लिए बाद में 17 सीटों पर समझौता हुआ परंतु उसमें भी कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं जैसे सलमान खुर्शीद को अपनी सीट समझौते में गंवानी पड़ी। इस हिसाब से उत्तर प्रदेश के समझौते को भी काँग्रेस के लिए सम्मानजनक नहीं कहा जा सकता ।

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में शुरुआत में कांग्रेस को एक सीट ऑफर की जो कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के लिए सार्वजनिक रूप से बेहद अपमान पूर्ण था, परंतु बाद में कड़े समझौते में दिल्ली में तीन सीट कांग्रेस को मिली लेकिन गुजरात और हरियाणा में तीन सीट आम आदमी पार्टी को देनी पड़ी , जिसका असर इन राज्यों में कांग्रेस की अपनी राजनीति पर साफ तौर पर दिखाई देगा ।

2024 के चुनाव की पूर्व संध्या पर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जहां एक तरफ भाजपा समर्थित एनडीए गठबंधन अर्थमैटिक और केमिस्ट्री दोनों क्षेत्रों में बेहद संतुलित समन्वित एवं सामंजस्य पूर्ण दिखाई दे रहा है वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस समर्थित इंडिया गठबंधन न तो अंकगणित के आधार पर ना ही रासायनिक दृष्टि के आधार पर सामंजस्य युक्त प्रतीत हो रहा है । जिन दलों के साथ इंडिया गठबंधन आगे बढ़ रहा है उनमें भी परस्पर तालमेल एवं विश्वास की कमी साफ तौर पर झलक रही है। ऐसे में इंडिया गठबंधन मनोवैज्ञानिक रूप से तो पीछे हो ही रहा है धरातल पर भी बहुत अधिक पिछड़ता जा रहा है। क्षेत्रीय दलों ने जिस प्रकार कांग्रेस को आंखें दिखाई हैं , जिस प्रकार कांग्रेस को धौंस दिखाई है इससे कांग्रेस के राष्ट्रीय पार्टी होने का जो सम्मान था उसे सम्मान को भी गहरा आघात पहुंचा है । कुछ लोगों का कहना यह भी है कि कहीं ना कहीं कांग्रेस ने आत्मसम्मान से समझौता कर इस बचे खुचे इंडिया गठबंधन को आकार देने का प्रयास किया है । विपक्षी एकता के पैरोकार एवं भाजपा विरोधी वोटरों में भी आशा एवं विश्वास का संचार करने में इंडिया गठबंधन असफल दिखाई दे रहा है । इस गठबंधन को विश्वास हासिल करने के लिए अभी और मशक्कत करनी होगी बाकी अंतिम निर्णय चुनाव में जनता अपने मन से करेगी।

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